Thursday, December 2, 2021

डॉ० पीतांबर दत्त बड़थ्वाल: दार्शनिक, शोधकर्ता, विश्लेषक और निबंधकार

 




हिंदी साहित्य के विकास में देवभूमि उत्तराखंड का विशेष स्थान है। उत्तराखंड तमाम तरह की बोलियों का क्षेत्र होने के बावजूद राष्ट्रभाषा हिंदी के विकास में हमेशा अपनी विशेष भूमिका निभाता रहा है। स्वतंत्र भारत के प्रथम डी.लिट. डॉ० पीतांबर दत्त बड़थ्वाल भी उत्तराखंड देवभूमि से ही परिचय रखते हैं। डॉ० बड़थ्वाल का जन्म १३ दिसंबर १९०१ में पौड़ी जनपद के ‘पाली’ ग्राम में हुआ। कई साहित्यकार उनका जन्म २ दिसंबर को मानते है। गढ़वाली साहित्यकारों में यह एक विवाद का प्रश्न बना हुआ था, कि उनका जन्म २ दिसंबर को हुआ या १३ दिसंबर को?  अंत में डॉ० भक्त दर्शन के एक पत्र के हवाले से, एक पंचाग के अनुसार, इनकी जन्म तिथि १३ दिसंबर, शुक्रवार, सन् १९०१ को निश्चित मानी गई। इसी तिथि को डॉ० गोविन्द चातक ने भी स्वीकार किया है। गाँववासी भी प्रतिवर्ष इसी दिन पीतांबर दत्त बड़थ्वाल का जन्मोत्सव मनाते हैं।

उनके पिता पं० गौरीदत्त बड़थ्वाल प्रतिष्ठित व्यक्ति और ज्योतिष तथा कर्मकांडी विद्वान थे। वे साहित्य प्रेमी तथा धार्मिक व्यक्ति थे। दुर्भाग्यवश ४० वर्ष की अल्पायु में ही उनकी मृत्यु हो गई। उनके मन में अपने बच्चों को शिक्षित, सभ्य और सुसंस्कृत बनाने की बहुत इच्छा थी। परन्तु होनी को कुछ और ही मंज़ूर था। उनकी मृत्यु के समय पीतांबर मात्र १० वर्ष के थे। उनका पालन पोषण उनके नि:संतान ताऊ मनीराम बड़थ्वाल ने किया।

पीतांंबर बचपन से ही विलक्षण प्रतिभा के धनी थे। पढ़ाई के प्रति उनका झुकाव उत्तरोत्तर बढ़ता ही गया। प्रारंभिक शिक्षा घर पर ही हुई। उनके प्रथम शिक्षक पौड़ी ग्राम के श्री शिवराम सिंह थे। फिर क्रमश: अंग्रेज़ी के श्री परमेश्वर सहाय नैथानी और हिन्दी, संस्कृत, व्याकरण, ज्योतिष के प्रकांड विद्वान पं० योगेन्द्र कृष्ण दुर्गादत्य शास्त्री रहे। हाईस्कूल की पढ़ाई के लिए वे मामा जी के सहयोग से लखनऊ गये। वहाँ उनकी भेंट अपने प्रथम गुरु पं० श्याम सुंदर खन्ना से हुई। हाईस्कूल व इंटरमीडिएट करने के उपरांत वे डी.ए.वी. कॉलेज में स्नातक के लिए प्रविष्ट हुए। इसी दौरान पिता तुल्य ताऊ का निधन हो गया। इस दुःख ने उन्हें इतना झकझोर दिया था, कि वे स्वयं भी अस्वस्थ रहने लगे जिससे उनकी पढ़ाई दो वर्ष बाधित रही। तत्पश्चात् उन्होंने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में स्नातक में प्रवेश लिया और यहीं से हिन्दी में स्नातकोत्तर किया। वहाँ उन्होंने डॉ० श्यामसुन्दर दास,  आचार्य रामचंद्र शुक्ल, अयोध्या सिंह उपाध्याय ’हरिऔध’,  लाला भागदीन जैसे गुरुओं की छत्रछाया में अव्वल स्थान में परीक्षा उत्तीर्ण की। उनके अद्भुत व्यक्तित्व एवं अध्ययन को देखकर गुरु श्याम सुन्दर दास जी ने उन्हें शोधकार्य हेतु अवैतनिक संचालक नियुक्त किया। यहीं शोध-संचालक के पद पर रहते हुए उन्होंने एल.एल.बी. की परीक्षा प्रथम क्षेणी में उत्तीर्ण की।

उस काल की परंपराओं के अनुसार, मात्र १३ वर्ष की आयु में ही उनका विवाह सावित्री बड़थ्वाल से हो गया था। सावित्री देवी धीर, गंभीर एवं सुख-दुःख में सदैव साथ देने वाली महिला थीं। बड़थ्वाल जी की कुल 8 संतानें हुई।  बड़ी संतान पुत्री हुई, जो शारीरिक और मानसिक रूप से दुर्बल थी और मात्र ३२ वर्षों का जीवन लेकर लेकर आई थी। उसके बाद लगातार तीन पुत्रियाँ हुईं - सत्यभामा,  प्रसन्ना देवी, दमयन्ती; तथा चार पुत्र हुए  जो शारीरिक और मानसिक दुर्बलता के कारण असमय ही मृत्यु को प्राप्त हो गए। अपने जीवनकाल में अपनों की मृत्यु का कष्ट उन्हें आजीवन सालता रहा। चिंताएँ मानों उनके जीवन का अभिन्न अंग बन गई थीं, और उन्होंने हमेशा पारिवारिक और शारीरिक रूप से कष्ट में जीवन व्यतीत किया।

 अपने शुरूआती दिनों में पिता की आकस्मिक मृत्यु के पश्चात उन्होंने बहुत पीड़ा सही थी। लखनऊ आदि जगहों पर भूख से तंग आकर उन्हें कई बार भंडारे के भोजन पर आश्रित रहना पड़ा था। विश्वविद्यालय के तनावपूर्ण वातावरण और आर्थिक संकट के कारण वे कई बार बीमार भी पड़े।  कई तरह के उपचार से भी उन्हें स्वास्थ्य लाभ नहीं मिला और एक दीर्घकालीन बीमारी के कारण २४ जुलाई १९४४ को, मात्र ४३ वर्ष की आयु में, उनका निधन हो गया। इस अप्रत्याशित घटना से उनका परिवार एक बार फिर से असहाय एवं अनाथ हो गया था। उनकी माता और पत्नी को परिवार के भरण-पोषण हेतु कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ा।


डॉ० बड़थ्वाल दुबले पतले शरीर वाले, गाँधीवादी,  सादा जीवन- उच्च विचार के समर्थक, मितव्ययी, निर्भीक,  ईमानदार,  योगी,  व्यायाम-प्रिय,  स्वाभिमानी, पशु प्रेमी,  प्रकृति प्रेमी, व्यवहार कुशल, संभाषण कला में निपुण,  आदर्श अध्यापक, सुधारवादी,  भगवत भक्ति वाले व्यक्ति थे। बहुत कम उम्र में ही वे विश्वविद्यालय में प्राध्यापक नियुक्त हो गये थे। इस भूमिका को उन्होंने पूरे जोश और तत्परता से निभाया तथा उर्जा से भरपूर रहते हुए, विद्यार्थियों के कल्याण की कामना करते हुए, उन्हें नए वैचारिक लेखन के लिए प्रेरित करते रहे। वे साहित्यप्रिय होने के साथ-साथ सामाजिक सुधारवादी भी थे। उन्होंने अपने जन्म स्थान में भी कई सामाजिक सुधार के कार्य किये। 

 १९२२ से १९२४ तक उन्होंने बुरा समय देखा, क्योंकि इनके ह्रदय-सम्राट पिता का असमय निधन हुआ था।  इसी समय वे  ‘अम्बर’  उपनाम से कविताएँ लिखने लगे। साथ ही, ‘व्योमचन्द्र’ एवं ‘विलोचन’ उपनामों से गद्य भी लिख रहे थे।  उन्होंने पुस्तकाकार रूप से लेकर मात्र एक पन्ने तक का साहित्य रचा है और उनका प्रत्येक कार्य अपनी अलग पहचान रखता है। भाषा या शैली की दृष्टि से ही नहीं बल्कि भाव और विचार-चिंतन की दृष्टि से भी उनके साहित्य की आत्मा ठोस व सशक्त है। साहित्य रचना में उनका प्रयोजन न तो आर्थिक लाभ ही था और न ही प्रत्यक्ष यश की प्राप्ति। वास्तविक अर्थों में साहित्य की सेवा करना ही उनका प्रयोजन था, इसलिए उनका साहित्य उच्चकोटि का बन पड़ा।

 डॉ० बड़थ्वाल का संपूर्ण जीवन अनुसंधान पर आधारित रहा। इसी से उन्होंने साहित्य के उन पहलुओं को प्रकाशित करने की कोशिश की, जिसे किसी ने नहीं छुआ था। निर्गुण की विराट व्यापकता के संदर्भ में उन्होंने संपूर्ण भारत के समस्त प्रदेशों में प्रचलित मान्यताओं के बारे में जो शोध कार्य प्रस्तुत किया, उसमें पाँच सौ वर्षों के संत साहित्य का गहन अध्ययन और विवेचन है। उन्होंने हिन्दी साहित्य के वीरगाथाकालीन साहित्य की पूर्ववर्ती तथा परवर्ती रचनाएँ  एकत्रित कीं, जिसमें योगियों,  नाथों, सिद्धों, साधु-संतों और फक्कड़ों के साहित्य की लगभग हजार वर्षों की विपुल सामग्रियाँ हैं।  

उन्होंने अंग्रेज़ी निबंध भी लिखे, लेकिन अस्वस्थता के कारण प्रकाशित नहीं कर पाये। उनके निधन के बाद डॉ० संपूर्णानंद तथा डॉ० भगीरथ मिश्र ने क्रमश: ‘योग प्रवाह’ और ‘मकरंद’ नाम से प्रकाशित किया। हिंदी के प्रति प्रेम एवं आस्था के साथ हिंदी की सेवा में संलग्न कानपुर में रहते हुए भी अपने जन्मस्थान, पौड़ी की पहाड़ियों के प्रति उनका प्रेम सदा बना रहा। उन्होंने यहीं से ‘हिलमैन’ पत्र निकाला और श्रीनगर गढ़वाल से बहुत छोटी उम्र में ही हस्तलिखित पत्रिका ‘मनोरंजनी’ का संपादन किया। खराब स्वास्थ्य के कारण अध्ययन/मनन करके उन्होंने प्राणायाम, विज्ञान, कला और ध्यान हो,  आत्मचकित्सा जैसी पुस्तकें भी निकाली।

 डॉ० बड़थ्वाल अनेक भारतीय भाषाओं जैसे संस्कृत, अपभ्रंश, गुजराती, राजस्थानी, गढ़वाली, अरबी-फारसी आदि के जानकार थे। उन्होंने इन भाषाओं के व्यावहारिक प्रयोगों पर न केवल विचार किया, अपितु उन पर अनुसंधानात्मक लेखों के द्वारा इन भाषाओं के शब्दों, वाक्यों, व्याकरणिक प्रयोगों आदि पर भी लेखनी चलाई। ’कणेरी पाव’ ’गंगाबाई’ और ’हिंदी साहित्य में उपासना का स्वरूप’ आदि अनेक निबंधों में इनकी उत्कृष्ट लेखन कला दिखाई देती है। इनके ग्रंथ और निबंध आलोचनात्मक, शोधपूर्ण और ऐतिहासिक विवेचनों से भरे हुए हैं। उन्होंने साहित्य की अनेक विधाओं पर लेखनी चलाई और सफलता प्राप्त की। हिंदी साहित्य में उनके लेखन का महत्वपूर्ण स्थान है। 

निष्कर्षत: यह कहा जा सकता है, कि डॉ० पीतांबरदत्त बड़थ्वाल दार्शनिक, शोधकर्ता, विश्लेषक और निबंधकार थे। उन्होंने मध्ययुगीन सिद्धों और नाथों की वाणी को खोजने और उनके विश्लेषण का अद्वितीय कार्य किया था। उन्होंने साहित्य में कई नई मान्यताएँ स्थापित कीं और लेखन की नई प्रणालियाँ चलाईं, जिनका अनुसरण उनके परवर्ती साहित्यकारों ने भी किया और जिससे हिंदी साहित्य समृद्ध हुआ।  

विशेष : उत्तराखंड में पीतांबरदत्त बड़थ्वाल भाषा संस्थान है, जहाँ विभिन्न तरह के भाषा साहित्य पर कार्यक्रम आयोजित किये जाते है तथा भाषा प्रोत्साहन के लिए कार्य होते रहते है। यह राज्य सरकार के संरक्षण के अंतर्गत आता है। 

पीतांबर दत्त बड़थ्वाल : जीवन परिचय

जन्म 

१३ दिसंबर १९०१ 

निधन 

२४  जुलाई १९४४

जन्मभूमि/ कर्मभूमि 

पाली- ग्राम, पौड़ी जिला, उत्तराखंड

बनारस हिन्दू विश्व विद्यालय, वाराणसी

पिता 

श्री गौरीदत्त बड़थ्वाल

पत्नी 

श्रीमती सावित्री देवी

शिक्षा एवं शोध

एम० ए०  

बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, १९२८(हिन्दी) प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण

पीएच.डी.

“हिंदी काव्य में निर्गुणवाद” (१९३१ में शोध-पत्र जमा)

१९३३ में दीक्षांत समारोह में डी.लिट. की उपाधि  

हिंदी में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त करने वाले स्वतंत्र भारत के पहले व्यक्ति; द निर्गुण स्कूल ऑफ़ हिन्दी पोयट्री - अंग्रेज़ी में शोध प्रबंध

डिप्लोमा 

१९२९ में एल.एल.बी. की परीक्षा उत्तीर्ण

गुरु 

पं.रामचंद्र शुक्ल और बाबू श्याम सुन्दर दास 

साहित्यिक रचनाएँ

रचनाएँ  

गोरखबानी, रामानन्द की हिन्दी रचनाएँ, सूरदास, हिन्दी काव्य में निर्गुण संप्रदाय, योग प्रवाह, मकरंद, संक्षिप्त रामचंद्रिका तथा हस्तलिखित ग्रंथों  का चौदहवाँ, पन्द्रहवाँ तथा त्रैमासिक विवरण ग्रंथ

“गोस्वामी तुलसीदास तथा रूपक रहस्य” गुरु बाबू श्याम सुन्दर दास के साथ संयुक्त  लेखन

लोक साहित्य 

गढ़वाल में गोरखा शासन, पंवाडे या गढ़वाल की वीर गाथाएँ

पुरस्कार व सम्मान

हिंदी साहित्य के विषय में ‘डॉक्टरेट’ की उपाधि पाने वाले प्रथम भारतीय व्यक्ति 

एम. ए. परीक्षा में ‘छायावाद’ पर विद्वतापूर्ण निबंध लिखने पर पुरस्कार स्वरूप हिंदी विभाग के अंतर्गत शोध कार्य पर नियुक्त  

काशी–नागरी–प्रचारिणी सभा के अनुसंधान-विभाग का अवैतनिक संचालक (ऑनरेरी सुपरिटेन्डेन्ट, सर्च ऑफ़ हिन्दी मैनुसक्रिप्ट्रस) नियुक्त 

सन्दर्भ 

१. गढ़वाल दी दिवंगत विभूतियां पृ.स. २३८  

२. डॉ० बड़थ्वाल स्मारक ट्रस्ट परिचय, पुस्तिका पृ.स. ०९ 

३. डॉ० बड़थ्वाल स्मारक ट्रस्ट परिचय, पुस्तिका पृ.स. ३७ 

४. सत्यपथ - डॉ० बड़थ्वाल स्मृति अंक १९७६ पृ.स. १५  

 

लेखक परिचय

डॉ० रेखा सिंह: असिस्टेंट प्रोफेसर (हिंदी विभाग, राष्ट्रीय महाविद्यालय, गढ़वाल, उत्तराखंड, भारत)

शोधपत्र – २० राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय  लघु कहानियाँ, शोध प्रबंध प्रकाशानार्थ 

पुरस्कार – भाषा सहोदरी सम्मान, साहित्य संचय सम्मान 

ईमेल : rekhasunil22010@gmail.com ; Mob : 9634975539

 

Wednesday, December 1, 2021

बाल-काव्य शिरोमणि : श्री द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

                                                                  



१९७० के दशक के अंतिम चरण में, जब मैं पहली या दूसरी कक्षा में रही होऊँगी, घर पर छोटी बुआ मोहल्ले के कुछ बच्चों को पढ़ाती थीं। उनकी पाठ्य पुस्तकों के कुछ गीत बड़े मधुर थे। वे बोलकर याद करते और आसपास खेलते हुए मुझे अनायास याद हो जाते। उनमें से एक जो अब तक मेरी स्मृतियों  में गूँजता है -----


                                 वीर तुम बढ़े चलो धीर तुम बढ़े चलो,  

                                 हाथ में ध्वजा रहे, बाल दल सजा रहे  

               ध्वज कभी झुके नहीं, दल कभी रुके नहीं  

                                              वीर तुम बढ़े चलो --------’ 

 

बड़े होकर पता चला कि उन पंक्तियों को लिखने वाले श्रेष्ठ कवि थे "द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी"। उनका लिखा एक अन्य कालजयी गीत जिसे खेल-खेल में गाते हुए हर बच्चा बड़ा हुआ है ----- 


‘हम सब सुमन एक उपवन के
रंग-रंग के रूप हमारे
अलग -अलग है क्यारी
लेकिन हम सबसे मिलकर ही
इस उपवन की शोभा सारी’

 

वस्तुतः वह समय ऐसा था, कि हर बच्चे की जिह्वा पर ये गीत रहते थे। उस काल-खंड में ऐसे अनेक गीतों के मुखड़े जन जागरण और सांप्रदायिक सद्भाव के विज्ञापन के रूप में प्रसारित किए गए और सराहे गए। बालगीत 'हम सब सुमन एक उपवन के’ की पहली पंक्ति को तो एक समय उत्तर प्रदेश सरकार ने कौमी एकता का बोध जगाने वाली विज्ञापन पंक्ति के रूप में प्रयोग  किया।  


उनके कितने ही गीत ऐसे हैं, जिन्हें कम से कम तीन पीढ़ियों ने बचपन में पढ़ा और गुनगुनाया है। 

जैसे ------ 


यदि होता किन्नर नरेश मैं राजमहल में रहता
सोने का सिंहासन होता सिर पर मुकुट चमकता

अथवा

'सूरज निकला चिड़ियाँ बोलीं, 
कलियों ने भी आँखें खोलीं ‘


श्री द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी - एक ऐसे साहित्यकार, जिन्होंने कालजयी साहित्य की रचना तो की ही, अनुपम बाल साहित्य का सृजन भी किया। बाल साहित्य का सृजन वही साहित्यकार कर सकता है, जो अपनी विद्वत्ता,अनुभव की गहनता और लेखन की दक्षता को बालमन की सहजता और सरलता में डुबो दे। इसके लिए स्वयं बच्चों जैसा मन और मस्तिष्क बनाना होता है। श्री द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी जी में यह सभी गुण विद्यमान थे। 

 

१ दिसम्बर, १९१६ को आगरा (उ.प्र.) के रोहता गाँव में जन्मे श्री द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी बाल्यकाल से ही अत्यंत मेधावी थे। उनकी शिक्षा आगरा में हुई।  बच्चों के लिए लिखे जाने वाले गद्य और पद्य साहित्य में कठिन शब्दों और भावों को देखकर उन्हें बहुत पीड़ा होती थी। उनका मानना था, कि कठिन शब्दावली के कारण बच्चे उन गीतों को याद नहीं कर पाते। उनका मत था कि यदि बच्चों को अच्छे और सरल भावपूर्ण गीत दिए जाएँ, तो वे अवांछनीय फिल्मी गीत नहीं गाऐंगे। अतः उन्होंने स्वयं ही इस क्षेत्र में उतरकर श्रेष्ठ साहित्य के सृजन को अपने जीवन का लक्ष्य बनाया। शिक्षा परिषद व शिक्षा विभाग से जुड़े होने के नाते उन्होंने यह बीड़ा उठाया कि ४ से १४  साल के बच्चों के लिए ऐसे गीत लिखे जाएँ, जो उनमें संस्कार पैदा करें| साथ ही वे छंद व कथ्य की दृष्टि से उत्तम हों। उन्होंने अपने समय के श्रेष्ठ कवियों की रचनाएँ पाठ्यक्रम में रखवाईं, ताकि बच्चों का मानसिक स्तर उन्नत हो। 


उन्हें पढ़ने और पढ़ाने का बड़ा चाव था। पढ़ने के लिए वह इंग्लैण्ड भी गये, पर आजीविका के लिए उन्होंने भारत में शिक्षा क्षेत्र को चुना। अनेक महत्वपूर्ण पदों पर काम करते हुए वह शिक्षा निदेशक और निदेशक (साक्षरता निकेतन) जैसे पदों पर पहुँचे। वह उत्तर प्रदेश सरकार में शिक्षा सचिव के पद पर भी रहे। उनके कई कालजयी गीत आज भी हिंदी के पाठ्यक्रम में हैं और बच्चे उन्हें बड़ी रुचि से पढ़ते हैं। 


शिक्षा और कविता को समर्पित द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी का जीवन बहुत ही चित्ताकर्षक और रोचक है। उनकी पुस्तक ‘हम सब सुमन एक उपवन के’ का अनुवाद उर्दू भाषा में, 'हम सब फूल एक गुलशन के' शीर्षक से हुआ।  इस पुस्तक के एक गीत ‘हम सब सुमन एक उपवन के’ को उत्तर प्रदेश सूचना विभाग ने अपनी होर्डिगों में प्राय: सभी ज़िलों में प्रचारित किया। बाल-साहित्य समीक्षक कृष्ण विनायक फड़के इस गीत से इतना प्रभावित हुए, कि उन्होंने अपनी वसीयत में ही लिख दिया, कि उनकी शवयात्रा में ‘राम नाम सत्य है’ के बदले बच्चे मिलकर यह गीत गाएँ, तो उनकी आत्मा को बहुत शांति मिलेगी। फड़के जी का मानना था, कि अंतिम समय भी पारस्परिक एकता का संदेश दिया जाना चाहिए। वह दृश्य सर्वथा अभिनव और अपूर्व था, जिसमें एक शवयात्रा ऐसी निकली जिसमें बच्चे मधुर धुन से गाते हुए चल रहे थे-----'हम सब सुमन एक उपवन के'। किसी गीत को इतना बड़ा सम्मान, माहेश्वरी जी की बालभावना के प्रति आदर भाव ही था। माहेश्वरी जी ने बाल साहित्य पर २६  पुस्तकें लिखीं। इसके अतिरिक्त पाँच पुस्तकें नवसाक्षरों के लिए लिखीं। 


उन्होंने अनेक काव्य संग्रह और खंड काव्यों की भी रचना की। बच्चों के कवि सम्मेलन का प्रारंभ और प्रवर्तन करने वालों के रूप में द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी का योगदान अविस्मरणीय है। माहेश्वरी जी की कई कविताएँ केरल, गुजरात, महाराष्ट्र, बिहार, प. बंगाल, मध्य प्रदेश, दिल्ली, उत्तर प्रदेश आदि कई राज्यों के स्कूली पाठ्यक्रमों में तथा ‘राष्ट्रीय तथा शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद’ (एन.सी.ई.आर.टी.), नई दिल्ली के हिंदी भाषा एवं साहित्य के पाठ्यक्रम में सम्मिलित हैं।  


उ.प्र. के शिक्षा सचिव के रूप में उन्होंने शिक्षा के व्यापक प्रसार और स्तर के उन्नयन के लिए अनथक प्रयास किए। उन्होंने कई कवियों के जीवन पर वृत्त चित्र बनाकर उन्हें याद करते रहने के उपक्रम दिए। सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' जैसे महाकवि पर उन्होंने बड़े जतन से वृत्त चित्र बनाया। यह एक कठिन कार्य था, लेकिन उसे उन्होंने पूरा किया। बड़ों के प्रति आदर-सम्मान का भाव माहेश्वरी जी जितना रखते थे, उतना ही प्रेम उदीयमान साहित्यकारों को भी देते थे। उन्होंने आगरा को अपना काव्यक्षेत्र बनाया। केंद्रीय हिंदी संस्थान को वह एक तीर्थस्थल मानते थे। इसमें प्राय: भारतीय और विदेशी हिंदी छात्रों को हिंदी भाषा और साहित्य का ज्ञान दिलाने में माहेश्वरी जी का अवदान हमेशा याद किया जाएगा। उनके लिए कहा जाता है, कि वह गृहस्थ संत थे। 

 

द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी ‘बाल गीतायन’ को रचकर बच्चों के गांधी के नाम से मशहूर हो गए। ‘बाल गीतायन’ में उन्होंने बच्चों को १७६ कविताओं का तोहफा दिया था। उनकी कविताएँ आज भी बच्चों के स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल हैं। उनकी हर रचना से बाल मन आज भी प्रेरित होता है। उनकी अन्य रचनाएँ देश प्रेम, वीरता, प्रकृति आदि पर आधारित हैं। आपकी पहली पुस्तक १९४६ में प्रकाशित हुई। उनकी 'क्रौंच-वध’ व ‘सत्य की जीत’ खंड काव्यों सहित अनेक कविताएँ विभिन्न स्तरों पर शैक्षिक पाठ्यक्रमों मे शामिल हैं। उनकी पुस्तक बाल गीतायन एक ऐसी अनूठी पुस्तक है, जिसकी प्रत्येक कविता चित्रित है; और सभी कविताएँ वय क्रमानुसार सम्मिलित हैं। इस प्रकार की अनूठी पुस्तक इससे पहले और नहीं थी। हिंदी के विख्यात साहित्यकार भगवतीचरण वर्मा जी ने इसे राष्ट्रीय निधि की संज्ञा दी थी।  


माहेश्वरी जी को उनके साहित्यिक अवदान के लिए अनेक पुरस्कार मिले। १९७७ में आपको उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान, लखनऊ द्वारा बाल साहित्य का सर्वोच्च पुरस्कार प्राप्त हुआ। साथ ही हिंदी भाषा व साहित्य की विशिष्ट सेवा के लिए भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई के कर-कमलों से एक भव्य समारोह में ताम्र-पत्र और उत्तरीय प्रदान किए गए। इसके अतिरिक्त विभिन्न अवसरों पर आपको अनेक सरकारी संस्थानों, मंत्रीगणों द्वारा सम्मानित किया गया। राष्ट्रकवि सोहनलाल द्विवेदी जी ने भी उनकी पुस्तकों की मुक्त कंठ से सराहना की।इलाहाबाद में ही माहेश्वरी जी ने 'गुंजन' नामक संस्था भी बनाई, जिसकी गोष्ठियाँ हिंदी साहित्य सम्मेलन के कक्ष में समय-समय पर होती रहती थीं। 


माहेश्वरी जी के काव्य कृतित्व पर विश्वविद्यालय स्तर पर पी-एच.डी, एम.ए, तथा एम.एड के विद्यार्थियों द्वारा कई शोध प्रबंध लिखे गए हैं और लिखे जा रहे हैं। उनके दिवंगत होने के पश्चात भी उनकी रचनाओं का प्रकाशन रुका नहीं। अपनी आत्मकथा ‘सीधी राह चलता रहा’, जिसे उन्होंने मृत्यु के दो घंटे पहले पूर्ण की थी, उनके मरणोपरांत प्रकाशित हुई और सराही गयी। इसके अतिरिक्त स्वर्गीय माहेश्वरी की ‘साहित्य सर्जना’,’मेरी कविता का हर बोल तुम्हारा है’ (स्वर्गीय माहेश्वरी साहित्य पर आलेख संग्रह) तथा ‘रेनबो’-बाल कविताओं का अंग्रेजी में अनुवाद प्रकाशित हुए। 


उल्लेखनीय है कि मौजूदा प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने विज्ञान भवन, नई दिल्ली में युवा कांग्रेस को संबोधित करते हुए स्वर्गीय माहेश्वरी की कविता का हवाला दिया। प्रसिद्ध गायिका उषा उत्थुप ने भी संसद के सेंट्रल हॉल में प्रधान मंत्री और मंत्रियों की विशिष्ट उपस्थिति में उनकी कविता गाई। द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी जी की रचनाएँ न केवल बालकों और आमजन की, अपितु देश के हर वर्ग की प्रेरणा का स्त्रोत थीं, हैं एवं सदैव रहेंगी। युगों-युगों तक हमारा मार्ग प्रशस्त करने वाली इन कृतियों के रचनाकार को कोटिश: नमन। 


द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी : जीवन परिचय 

जन्म

१ दिसम्बर १९१६, रोहता आगरा

मृत्यु

२९ अगस्त १९९८

कर्मभूमि

उत्तर प्रदेश (शिक्षा सचिव )

पिता

 स्व. प्रेमसुख माहेश्वरी

माता

 स्व. सरयू देवी

शिक्षा एवं शोध

एम. ए.

साहित्यिक सफर




काव्य संग्रह




आत्मकथा

दीपक

ज्योति किरण

फूल और शूल

शूल की सेज

शंख और बाँसुरी

गीत गंगा


सीधी राह चलता चल

खंड काव्य

सत्य की जीत

क्रौंच वध

बाल साहित्य की पुस्तकें

२६, बाल गीतायन, वीर तुम बढे चलो,

हम सब सुमन एक उपवन के,

सोने की कुल्‍हाड़ी, कातो और गाओ,

सूरज सा चमकूँ मैं, माखन मिश्री,

हाथी घोड़ा पालकी, अंजन खंजन,

सीढ़ी सीढ़ी चढ़ते हैं, हम हैं सूरज,

चाँद सितारे, हाथी आता झूम के,

बालगीतायन, चाँदी की डोरी,

ना मोती ना मुसकान

कथा संग्रह

३ 

नवसाक्षरों के लिए पुस्तकें

५

ग्रंथावली

३ भागों में 

पुरस्कार व सम्मान

उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान, लखनऊ द्वारा बाल साहित्य का सर्वोच्च पुरस्कार, १९७७ 

 बाल साहित्य भारती पुरस्कार, १९९२


संदर्भ -  



लेखक परिचय:

भावना सक्सैना दिल्ली विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी व हिंदी में स्नातकोत्तर हैं तथा स्वर्ण पदक प्राप्त हैं। 28 वर्ष से अधिक का शिक्षण, अनुवाद और लेखन का अनुभव है। इनकी चार पुस्तकें प्रकाशित हैं जिनमें एक पुस्तक सूरीनाम में हिंदुस्तानी दिल्ली विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम है। एक कहानी संग्रह ‘नीली तितली’ व एक हाइकु संग्रह ‘काँच-सा मन’ है। हाल ही में राष्ट्रीय पुस्तक न्यास से सरनामी हिंदी-हिंदी का विश्व फलक प्रकाशित। संप्रति  भारत सरकार के राजभाषा विभाग में कार्यरत हैं।

ईमेल – bhawnasaxena@hotmail.com


  


नवम्बर माह के आलेख


नवंबर माह के आलेख 

Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat
  1प्रभा खेतान: नारी विमर्श की सशक्त आवाज़ 2कबीर - कल आज और कल के कवि 3समन्वय के विराट लोकनायक - तुलसीदास 4भले मानुष भाषावैज्ञानिक डॉ॰भोलानाथ तिवारी 5आमजनों के प्रखर प्रणेता: जनकवि बाबा नागार्जुन 6छायावाद के प्रवर्तक : पं. मुकुटधर पाण्डेय
7"सौ जासूस मरते हैं तब एक कवि पैदा होता है" - चंद्रकांत देवताले 8जॉन एलिया: एक पाकिस्तानी शायर जिसके दिल में हमेशा रहा हिन्दुस्तान 9“ कविता भाषा में आदमी होने की तमीज है...''- सुदामा पाण्डेय `धूमिल' 10लोक और आधुनिक साहित्य के सेतु : बिज्जी 11अनूठा साहित्यकार, बेमिसाल संपादक – रवीन्द्र कालिया 12हिंदी के आदि कवि : अमीर ख़ुसरो 13मुक्तिबोध- पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है?
14पराधीन भारत की वेदना के सक्षम प्रवक्ता और कटु आलोचक बालमुकुंद गुप्त 15कुँवर नारायण : मानवीय स्वरों की सहज उपस्थिति 16अकबर इलाहाबादी : तंज़ और इश्क़ का बेहतरीन शायर 17दलित विमर्श के पुरोधा: ओमप्रकाश वाल्‍मीकि 18मृदुला सिन्हा - लोक साहित्य को जीवन का आधार मानने वाली साहित्यकार 19विवेकी राय : ग्रामीण संस्कृति को समर्पित साहित्य साधक 20इश्क़ और इन्क़िलाब को साधता शायर - फै़ज़
21ज़िंदगी @ ८५ बनाम ज्ञानरंजन 22नरेश मेहता : आस्था और उदात्त प्रेम के रचनाकार 23किस्सों की अक्षय पोटली की स्वामिनी: अलका सरावगी 24परवीन शाकिर – ‘हँसती थी और काजल भीगता था साथ-साथ’ 25लोकभाषा और जनसंस्कृति के प्रणेता: महाकवि विद्यापति 26आधुनिकता और दर्शन के अनूठे हस्ताक्षर - कैलाश वाजपेयी 27साहित्य जगत का मील का पत्थर: हरिवंश राय बच्चन
28भुवनेश्वर: सवालों से घिरा व्यक्तित्व और जटिल जवाब 29अली सरदार जाफ़री: एक संवेदनशील साहित्यकार 30मैत्रेयी पुष्पा: नारी के लोकतांत्रिक मूल्यों की सशक्त आवाज़        

नवंबर माह के आलेख 

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कलेंडर जनवरी

Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat
            1वह आदमी उतर गया हृदय में मनुष्य की तरह - विनोद कुमार शुक्ल
2अंतः जगत के शब्द-शिल्पी : जैनेंद्र कुमार 3हिंदी साहित्य के सूर्य - सूरदास 4“कल जिस राह चलेगा जग मैं उसका पहला प्रात हूँ” - गोपालदास नीरज 5काशीनाथ सिंह : काशी का अस्सी या अस्सी का काशी 6पौराणिकता के आधुनिक चितेरे : नरेंद्र कोहली 7समाज की विडंबनाओं का साहित्यकार : उदय प्रकाश 8भारतीय कथा साहित्य का जगमगाता नक्षत्र : आशापूर्णा देवी
9ऐतिहासिक कथाओं के चितेरे लेखक - श्री वृंदावनलाल वर्मा 10आलोचना के लोचन – मधुरेश 11आधुनिक खड़ीबोली के प्रथम कवि और प्रवर्तक : पं० श्रीधर पाठक 12यथार्थवाद के अविस्मरणीय हस्ताक्षर : दूधनाथ सिंह 13बहुत नाम हैं, एक शमशेर भी है 14एक लहर, एक चट्टान, एक आंदोलन : महाश्वेता देवी 15सामाजिक सरोकारों का शायर - कैफ़ी आज़मी
16अभी मृत्यु से दाँव लगाकर समय जीत जाने का क्षण है - अशोक वाजपेयी 17लेखन सम्राट : रांगेय राघव 18हिंदी बालसाहित्य के लोकप्रिय कवि निरंकार देव सेवक 19कोश कला के आचार्य - रामचंद्र वर्मा 20अल्फ़ाज़ के तानों-बानों से ख़्वाब बुनने वाला फ़नकार: जावेद अख़्तर 21हिंदी साहित्य के पितामह - आचार्य शिवपूजन सहाय 22आदि गुरु शंकराचार्य - केरल की कलाड़ी से केदार तक
23हिंदी साहित्य के गौरव स्तंभ : पं० लोचन प्रसाद पांडेय 24हिंदी के देवव्रत - आचार्य चंद्रबलि पांडेय 25काल चिंतन के चिंतक - राजेंद्र अवस्थी 26डाकू से कविवर बनने की अद्भुत गाथा : आदिकवि वाल्मीकि 27कमलेश्वर : हिंदी  साहित्य के दमकते सितारे  28डॉ० विद्यानिवास मिश्र-एक साहित्यिक युग पुरुष 29ममता कालिया : एक साँस में लिखने की आदत!
30साहित्य के अमर दीपस्तंभ : श्री जयशंकर प्रसाद 31ग्रामीण संस्कृति के चितेरे अद्भुत कहानीकार : मिथिलेश्वर          

आचार्य नरेंद्रदेव : भारत में समाजवाद के पितामह

"समाजवाद का सवाल केवल रोटी का सवाल नहीं है। समाजवाद मानव स्वतंत्रता की कुंजी है। समाजवाद ही एक सुखी समाज में संपूर्ण स्वतंत्र मनुष्यत्व...