हिन्दी के वरिष्ठ कवि, कुँवर नारायण न केवल भारतीय-कविता, बल्कि विश्व-कविता में अपना विशिष्ट स्थान रखते हैं। उनका काव्य विश्व की पैंतीस भाषाओं में अनूदित हो चुका है, जिनमें बारह पुस्तक रुप में प्रकाशित हैं। उनकी कविता भारतीय दर्शन में गहरे पगी होकर भी विश्व-कविता से सतत संवाद करती है। भारत की बहुलतावादी संस्कृति को गहरे स्वीकार भाव से ग्रहण करते हए भी वे अपनी काव्य-संवेदना को देश व भाषा की भौगोलिक सीमाओं से मुक्त रख पाए हैं। एक सार्वजनीन मानवीय अनुभव उनकी कविता में अपनी खास जगह बनाता है।
साझी सांस्कृतिक विरासत में अपनी छाप छोड़ने वाले इस कवि का जन्म १९ सितंबर १९२७ को हुआ। उनका बचपन अयोध्या एवं फैज़ाबाद में गुज़रा। कुछ दुर्भाग्यपूर्ण पारिवारिक स्थितियों ने उनके अपरिपक्व मन को गहरा आघात पहुँचाया। बहुत कम उम्र में ही उन्होंने मृत्यु को इतने करीब से देखा। कुछ ही वर्षों के अंतराल में क्षय रोग के प्रकोप से उन्हें अपनी माँ व प्यारी बहन को खो देना पड़ा, जिसने उनकी चेतना को बुरी तरह झकझोर दिया। गहरे दुःख और अवसाद के समय में वे अपने चाचा के साथ रहने लखनऊ आ गए। लखनऊ में संयुक्त परिवार के बीच मन की गाँठें खुलने लगीं।
१९४२ का माहौल.. समूचे भारत में ‘भारत छोड़ो’ की लहर चल रही थी.. राजनीतिक दृष्टि से यह गहरे तनाव व सामाजिक उथल-पुथल का समय था। तत्कालीन युवा पीढ़ी के बीच गाँधी जी का प्रभाव शिद्दत से महसूस किया जा रहा था। ऐसे समय में कुँवर नारायण का लखनऊ स्थित घर बहुत-से कांग्रेसी व समाजवादी नेताओं के मिलने का अड्डा बन गया था। उनके चाचा, कृष्ण नारायण ‘नेशनल हेराल्ड’ अखबार के प्रबंध निदेशक थे। इससे अँग्रेज़ी हुकूमत की खुफ़िया पुलिस उनके घर पर कड़ी नज़र रखती थी। इन सब बातों का कुँवर नारायण की कवि-चेतना पर स्थायी प्रभाव पड़ा।
जिन दो नेताओं ने कुँवर नारायण की दृष्टि को रूपाकार दिया, वे थे---आचार्य कृपलानी तथा आचार्य नरेंद्र देव---एक प्रखर गाँधीवादी तथा दूसरे समाजवादी एवं बुद्ध के अनुगत। इन दोनों नेताओं की छत्र- छाया ने कुँवर नारायण के चिंतन को नई धार दी। १९४७-४८ में उन्होंने आचार्य कृपलानी की देख-रेख में निकलने वाली पत्रिका ‘विजिल’ का कार्यभार संभाला। कविता की बारीकियों को समझने की कला उन्होंने यहीं अर्जित की, जिससे साहित्य में उनका रुझान गहरा होता गया। १९५१ में उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से अँग्रेज़ी साहित्य में एम.ए किया। उन दिनों लखनऊ का साहित्यिक व अकादमिक माहौल अत्यंत तेजस्विता एवं सक्रियता भरा था, जिसका प्रभाव यह हुआ कि उनका मन पारिवारिक व्यापार की अपेक्षा साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधियों में अधिक रमने लगा।
कुँवर नारायण के जीवन में यात्राओं का बहुत महत्त्व है। १९५५ में चेकोस्लोवाकिया, पोलैंड, सोवियत रूस तथा चीन की यात्रा को वे अपने जीवन में ऐतिहासिक महत्त्व देते हैं। मॉस्को से बीजिंग तक की रेलयात्रा के रोमांच को वे कभी नहीं भूल पाए। वे उसे अपने जीवन की दिशा निर्धारित करने वाला अनुभव मानते रहे। इस यात्रा के दौरान उनकी भेंट नाज़िम हिकमत तथा पाब्लो नेरुदा से हुई, जिस पर बाद में उन्होंने कविताएँ भी लिखीं। जीवन को समृद्ध करने वाली यात्राओं का दौर चलता रहा। १९८७ में उन्होंने स्वीडन में हुए लेखक सम्मेलन में भागीदारी की। १९९४ में इटली में रहकर, वेनिस विश्वविद्यालय में कई भाषण दिए। इसके बाद यूरोप तथा अमेरिका का विस्तृत भ्रमण एवं प्रवास, उन्हें पश्चिम की अकादमिक दुनिया के निकट लाया। १९९८-९९ में उन्होंने ऑक्सफोर्ड एवं कैंब्रिज में काफी समय बिताया। विश्व सिनेमा, संगीत और थिएटर में उनकी गहरी रुचि रही, जिसने उनकी साहित्यिक चेतना को अनेक स्तरों पर प्रभावित एवं परिष्कृत किया।
पारिवारिक दृष्टि से १९६६ में उन्होंने भारती जी से विवाह किया। भारती जी ने कलकत्ता के प्रेसीडेंसी कॉलेज से अर्थशास्त्र में एम.ए किया था और कलकत्ता के ही एक कॉलेज में प्रोफ़ेसर थीं। उनके प्रगतिशील सामाजवादी विचारों ने बिलकुल निजी ढंग से कुँवर नारायण के चिंतन व लेखन पर अपना प्रभाव छोड़ा। अपूर्व नारायण उनके पुत्र हैं, जिन्होंने उनकी कविताओं के अंग्रेज़ी अनुवाद किये हैं जो No Other World तथा Witnesses of Remembrance शीर्षक से संकलित एवं प्रकाशित हैं।
लेखन में वैविध्य की दृष्टि से कुँवर नारायण का दायरा काफी बड़ा है। उतना ही विस्तृत उनका रचनाकाल भी है। उनका पहला काव्य-संग्रह ‘चक्रव्यूह’ १९५६ में आया और अंतिम काव्य-संग्रह ‘सब इतना असमाप्त’ उनकी मृत्यु के उपरांत २०१८ में प्रकाशित हुआ। उनके द्वारा किए गए विश्व साहित्य के अनुवाद ‘न सीमाएं न दूरियाँ’ के अंतर्गत संकलित हैं। इन सभी रचनाओं में कुँवर नारायण एक ऐसे कवि के रूप में सामने आते हैं, जिनकी गहरी चिंतनशील मनीषा व्यष्टि-समष्टि के गंभीर प्रश्नों को कविता की पंक्तियों में विभिन्न आयामों के साथ प्रस्तुत करती है। कवि इन समस्याओं के समाधान रागात्मक भावबोध एवं प्रखर वैचारिकता के एकात्म में तलाशता है।
किसी काम के सिलसिले में मुझे उनसे साक्षात मिलने और फिर मिलते रहने के अवसर मिले, जो मेरे जीवन के अविस्मरणीय अनुभव बन गए। चितरंजन पार्क की दौड़-धूप भरी कॉलोनी में एक शांत-सा मकान। कुँवर जी से मिलने आने वालों के लिए उनकी स्टडी ही बैठक का काम करती। बाहर के शोर से दूर एक खिड़की से खुलता आसमान और बरामदे में पसरे छोटे से बगीचे की घनी हरियाली। शायद घर के बाकी सामान की तरह उस खिड़की और हरियाली को ऐसे संजोया गया था कि शहर के बीचों-बीच होने का एहसास ही न होता। ठीक वैसी ही कुँवर जी की विराट उपस्थिति थी, बाहर के कोलाहल को अनदेखा करता शांत-चित्त और सौम्य मुस्कुराहट...
किसी साहित्यकार को उनके शब्दों के माध्यम से जानना और बात होती है लेकिन व्यक्तिगत रूप से जानना और बात होती है। कुँवर जी से मिलने के बाद ही यह जाना कि साहित्य और साहित्यकार के बीच पारदर्शी घनिष्ठता भी हो सकती है। कुँवर जी जैसा सोचते थे और जैसा अपने साहित्य में अभिव्यक्त करते थे, निजी जीवन में भी वे बिल्कुल वैसे ही थे।
उनके पास जाते ही एक अधीर समय में धैर्य जगने लगता है...गंभीरता और रागात्मकता का अतुलनीय समभाव। आत्मजयी में कवि ने नचिकेता को सवाल पूछने और अपने जवाब खुद ढूँढ़ने की जगह दी है। उसी तरह उनसे मिलने वाला हर व्यक्ति सवाल पूछने और अपने उत्तर खुद ढूँढ़ने का साहस कर सकता था। जिस तरह उनके लिए कविता मानवीयता का पर्याय है, उसी तरह जीवन भी मनुष्यत्व के परिष्कार की साधना है, जिसमें बर्बर महत्वाकांक्षाएँ नहीं, विनम्र अभिलाषाएँ हैं। कुँवर जी कहा करते थे कि किसी भी स्थिति से टकराने से बेहतर है उसे बदलने की कोशिश और उनके लिए बदलने की शुरुआत हमेशा स्वयं को बदलने से होती थी।
कभी-कभी उनसे राजनीतिक परिस्थितियों पर भी बात होती। उनकी दृष्टि में साहित्य, संस्कृति और भाषा ने हर बार सत्ता की निरंकुशता को चुनौती दी है। यदि कोई विकल्प संभव है तो साहित्य और कलाओं के माध्यम से ही संभव हो सकता है। कुँवर जी के विश्वास की यह दृढ़ता हैरान करती थी। यूँ तो उनकी कविताओं में द्वंद्व की खासी जगह है लेकिन उनके व्यक्तित्व में दुविधा और शंका कम दिखाई पड़ती।
वर्तमान, अतीत और भविष्य के बीच आवाजाही करते हुए कुँवर जी समय के महत्व को समझाते, जिसे उन्होंने लिखा भी है। उनके अनुसार कोई भी कलाकार या रचनाकार केवल अपने भौतिक समय में नहीं जीता, बल्कि वह प्रति-समय निर्मित करता है जो उसके भौतिक समय के समानांतर होता है। वे समय की अवधारणा को किसी क्षण पर अवरुद्ध करने की अपेक्षा, उसे काल की अनवरत धारा में, अपनी स्मृतियों और परंपराओं में पहचानने की कोशिश करते। जब भी वे इन विषयों पर बात करते तो उनके चेहरे के भाव और आँखों की गहराई देखते ही बनती। इस लोक में होकर भी कहीं बहुत दूर से बोलते हुए दिखाई पड़ते और फिर भी अपने इतने करीब…
- Narain, Kunwar. No Other World. (2010). (A. Narain, Trans.) New Delhi: Rupa & Co. ISBN: 9788129113733, 9788129113733.
- Narain, Kunwar. The Play of Dolls: Stories. (2020). (J. Vater & A. Narain Trans.) New Delhi: Penguin Modern Classic. ISBN: 9780143446958, 0143446959.
- Narain, Kunwar. Witness of Remembrance: Selected Newer Poems. (2021). (A. Narain, Trans.) New Delhi: EKA Publishers. ISBN: 9789390679027.
- निश्चल, ओम. (सं). (2018). अन्वय (साहित्य के परिसर में कुँवर नारायण). नई दिल्ली, दिल्ली, India: राजकमल प्रकाशन. ISBN: 978-9388183482.
- निश्चल, ओम. (सं). (2018). अन्विति (साहित्य के परिसर में कुँवर नारायण). नई दिल्ली: राजकमल प्रकाशन. ISBN: 978-9388183499.
- मिश्र, यातीन्द्र. (सं). (2010). कुँवर नारायण उपस्थिति. नई दिल्ली: वाणी प्रकाशन. ISBN: 9788170551751.
- मिश्र, यातीन्द्र. (सं). (2012). कुँवर नारायण संसार. नई दिल्ली: वाणी प्रकाशन. ISBN: 8170551765.
- सेठी, रेखा. (सं). (2019). मैं कहीं और भी होता हूँ. पंचकुला, हरियाणा: आधार प्रकाशन. ISBN: 9789387555242.
- सेठी, रेखा. (n.d.). कुँवर नारायण का काव्य कथ्य. दिल्ली. Retrieved October 14, 2021, from https://epgp.inflibnet.ac.in/Home/ViewSubject?catid=18
- सेठी, रेखा. (n.d.). कुँवर नारायण की कविताओं का पाठ विश्लेषण. Retrieved October 14, 2021, from https://epgp.inflibnet.ac.in/Home/ViewSubject?catid=18
रेखा जी, कुँवर नारायण जी के व्यक्तित्व, कृतित्व व उनके विचारों पर विस्तार से प्रकाश डालने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद। आलेख प्रवाहमय व बहुत रोचक है। पढ़कर मज़ा आया। आपको बधाई।
ReplyDeleteरेखा जी, कुंवर नारायण जी के जीवन के विभिन्न उतार-चढ़ावों और उनके व्यक्तित्व को ढालने वाले पहलुओं से लेकर उनकी पूरी साहित्यिक यात्रा को बखूबी इस सुंदर आलेख में उकेरने के लिए बहुत बधाई और शुक्रिया। आपकी कवि से निजी मुलाक़ातें और प्राप्त अनुभव इसे बहुमूल्य बनाते हैं।
ReplyDeleteरेखा जी को हार्दिक बधाई। कुंवर नारायण जी के जीवन एवं साहित्यिक यात्रा के विभिन्न पहलुओं को वर्णित करता बहुत रोचक लेख बना है।
ReplyDeleteआपके निजी अनुभवों से लेख में नई ऊर्जा आ गई है, बहुत बहुत बधाई
ReplyDeleteबहुत गहन आलेख। आपने बड़ी सूक्ष्मता से अध्ययन और विश्लेषण कर कवि के विराट को हमारे समक्ष प्रस्तुत किया। बहुत आभार
ReplyDeleteसभी साथियों का आभार जिन्होंने पढ़ा और सराहा।
ReplyDeleteरेखाजी, इतने प्रभावशाली और विवरणात्मक लेख के लिए सादर आभार
ReplyDeleteबेहतरीन प्रस्तुति 👌👌
ReplyDeleteरेखा जी , आपने एक ही लेख में कुंवर नारायण जी का पूरा जीवन चित्र खींच दिया । उनके साहित्य सृजन को भी विस्तार से समझाया । सुंदर लेख।
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