Wednesday, August 31, 2022

अमृता प्रीतम : कलम की एक अमर प्रीत

 

अमृता प्रीतम - हमारे देश का वह नाम जिसे शायद ही कोई ऐसा हो जो न जानता हो। हाँ, जानने की वजहें अलग-अलग हो सकती हैं, मगर हर एक वजह उनके व्यक्तित्व का ही एक रंग होगी।
स्नेह से वंचित बचपन और प्रेम से वंचित युवावस्था अक्सर मनुष्य को कठोर बना देते हैं और उसकी कल्पनाओं का गला घोंट देते हैं। लेकिन ३१ अगस्त १९१९ को गुजरांवाला (अब पाकिस्तान में) में जन्मी अमृत कौर ने जीवन की कठोर आँधियों से कल्पनाओं के अपने दीपक को हमेशा बचाए रखा।
माँ को खोने के बाद पिता के स्नेह और प्रशंसा के लिए तरसती अमृत कौर ने ११ साल की उम्र में कलम उठाई और सोलह साल की उम्र में कविता-संकलन 'अमृत लहरें' के साथ पंजाबी और हिंदी साहित्यजगत को "अमृता प्रीतम" नाम का बहुमूल्य उपहार दिया। 
अमृता जी ने विभाजन के अँधेरों में लाहौर से देहरादून और फिर देहरादून से दिल्ली की यात्राएँ की। ऐसी ही एक यात्रा में अपने आस-पास के माहौल से विमुख होकर उन्होंने वारिस शाह से रौशनी की गुहार करते हुए 'अज्ज आखाँ वारिस शाह नूँ' लिखी। उनकी यह नज़्म भारत और पाकिस्तान दोनों देशों में प्रकाशित हुई और इस नज़्म ने अपना घर हर उस दिल में बना लिया, जिसने विभाजन की विभीषिका झेली थी। उसी दौरान फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की एक किताब की प्रस्तावना में अहमद नदीम क़ासमी ने लिखा था कि यह कविता उन्होंने तब पढ़ी थी, जब वे जेल में थे। जेल से बाहर आकर भी उन्होंने देखा कि लोग इस कविता को जेबों में रखते हैं, निकालकर पढ़ते हैं और रोते हैं।
फिर वर्ष १९५० में विभाजन की पृष्ठभूमि में लिखा उपन्यास 'पिंजर' प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास का प्रमुख किरदार 'पूरो' सरहद के दोनों तरफ़ बैठी उन औरतों की पक्की सहेली बन गया जिन्होंने सामाजिक और पारिवारिक प्रताड़ना एवं परित्यक्तता का सामना किया था और जीवन के इस अन्याय को अपना अस्तित्व मानकर अपमान की इस धूल को मस्तक से लगा लिया था।
अमृता जी उस वक़्त पंजाब के मशहूर लेखकों में गिनी जाती थीं, जिस वक़्त औरतों का लिखना और ख़ास तौर से इस बेबाकी से लिखना समाज में ग़लत माना जाता था। उनकी कलम समाज की अस्वीकृति से नहीं डरती। एक बार एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था, "जब पुरुष नारी की शक्ति को नकारता है, तब असल में वह अपनी स्वयं की अवचेतना को नकार रहा होता है"
अमृता जी का नारीवाद सिर्फ़ पुरुषों से बराबरी का नहीं था, बल्कि उनका नारीवाद, नारी की इच्छाओं और उसके अवचेतन मन की शक्ति का भी था। जिसका ज़िक्र आप 'सिर्फ़ औरत' नामक लेख में पा सकते हैं। वे लिखती हैं, "...पर ज़िंदगी में तीन वक़्त ऐसे आए हैं, मैंने अपने अंदर की 'सिर्फ़ औरत' को जी भरकर देखा है। उसका रूप इतना भरा-पूरा था कि मेरे अंदर के लेखक का अस्तित्व मेरे ध्यान से विस्मृत हो गया।"
उनकी कहानियों के अनेक स्त्री-पात्र अपनी आंतरिक शक्ति के बल से पाठकों के मन को जीत लेते हैं और ऐसी ही एक कहानी है, 'पिघलती चट्टान' जिसमें जब राजश्री नाम की पात्र आत्महत्या के लिए पर्वत के शिखर पर चढ़ती है और यह सोचते हुए पुनः जीने का संकल्प लेती है कि "पैरों के लिए एक यही रास्ता क्यों बना है।"
साहित्य में ईमानदारी बहुत ज़रूरी होती है। कोई भी लेखक स्वयं से बेईमानी कर कुछ भी ऐसा नहीं लिख सकता जो पाठकों के दिल तक पहुँचे। अमृता जी की कविताएँ और लेख उनकी अपने भीतर के लेखक से निभाई ईमानदारी का अक्स हैं। एक उदासी में वे लिखती हैं,
"अंबर के आले में सूरज जलाकर रख दूँ
पर मन की ऊँची ममटी पर दिया कैसे रखूँ"
और फिर सुख के एक क्षण में उसी 'सूरज' का इस्तेमाल कर कहती हैं,
"दिल के पानी में लहर उठी, लहर के पैरों से सफ़र बँधा हुआ
आज किरणें हमें बुलाने आईं, चलो अब सूरज के घर चलना है"
इस तरह के विरोधाभास से लिखना वह भी एक ही व्यक्ति-विशेष के लिए तभी मुमकिन है, जब कलम में ईमानदारी की स्याही भरी हो।
अमृता जी की रचनाओं में एक अजीब हौसला है, जो वक़्त को रोकने की हिम्मत रखता है। उनके शब्द बेहद रूहानी होते हैं और अक्सर उन्हें पढ़ना एक इबादत के समान होता है। यह तभी मुमकिन है जब काग़ज़ पर उतरे हुए शब्द मस्तिष्क से नहीं बल्कि दिल के किसी अक्षयपात्र से निकले हों।
ईमानदारी के साथ-साथ अमृता जी के लेखन में ख़्यालों और ख़्वाहिशों की आज़ादी का उदाहरण भी मिलता है,
"उमर की सिगरेट जल गई
मेरे इश्क़ की महक
कुछ तेरी साँसों में
कुछ हवा में मिल गई
देखो यह आखिरी टुकड़ा है
ऊँगलियों में से छोड़ दो
कहीं मेरे इश्क़ की आँच
तुम्हारी ऊँगली ना छू ले"
एक और कविता में वे कल्पना करती हैं,
"एक कटोरी धूप को मैं एक
घूँट में ही पी लूँ
और एक टुकड़ा धूप का मैं
अपनी कोख में रख लूँ"
अमृता जी ने जैसे अपनी निजी ज़िंदगी में किसी परदे की ज़रुरत नहीं समझी उसी तरह उन्होंने अपने लेखन में भी किसी सामाजिक स्वीकृति की आस नहीं रखी। उनकी रचनाओं को एक लंबे वक़्त तक पढ़ने के बाद यूँ लगता है जैसे कि उनकी सारी कविताएँ, लेख, कहानियाँ आदि गंगा नदी की भाँति बहुत तेज़ बहाव लिए सदियों से बहती जा रही हों और हर सदी में पाठकगण शब्दों की उस गंगा के किनारे बैठे तृप्त होते रहे हों।
अमृता जी के शब्दों में एक ताक़त है जो पाठकों को उनसे बाँध देती है। हर पढ़ने वाले के भीतर जो कुछ भी टूटा-फूटा, बिखरा हुआ है, वह सँवरने लगता है। उनका लेखन सिर्फ़ कहानियों और किरदारों में सिमट कर नहीं रहता बल्कि इन सबसे ऊपर उठकर एक चिंतन बन जाता है, आत्मबोध का मार्ग बन जाता है।
उनकी किताब 'मन मिर्ज़ा तन साहिबाँ' अक्षरों के साए में उनके अवचेतन मन का अक्स है जो शब्दों के ज़रिए पढ़ने वालों की आत्मा तक पहुँचता है और एक ध्रुव तारा बन हमेशा उनकी चेतना के आसमान में चमकता रहता है।
अच्छे लेखकों की एक विशेषता यह होती है कि वे ख़ुद को ज़्यादा गंभीर रूप से नहीं लेते। अमृता जी भी ऐसी ही लेखिका थीं। जब मशहूर लेखक खुशवंत सिंह ने अमृता जी से उनकी और साहिर लुधियानवी की कहानी पूछी तो सारी कहानी जान लेने के बाद मायूस होकर बोले कि यह इतनी छोटी कहानी है कि इसे तो एक रसीदी टिकट पर लिखा जा सकता है।
वर्षों बाद जब उन्होंने अपनी आत्मकथा लिखी तो खुशवंत सिंह के उपहास का जवाब देते हुए उसका नाम 'रसीदी टिकट' रखा। 'रसीदी टिकट' सिर्फ़ एक आत्मकथा नहीं है, बल्कि साहित्य का एक ऐसा करिश्मा है, जो हर पढ़ने वाले को अपने आग़ोश में ले लेता है और शब्दों की एक ऐसी मधुर थपकी देता है कि मनुष्य जीवन में इस से बेहतर नींद शायद ही संभव हो!
"ज़िंदगी तुम्हारे उसी गुण का इम्तहान लेती है जो तुम्हारे भीतर मौजूद है - मेरे अंदर इश्क़ था।" इन पंक्तियों का सच 'रसीदी टिकट' है। अमृता जी ने अपनी आत्मकथा को पूर्ण रूप से इश्क़ के ताने-बाने से ही बुना है। पढ़ने वाले को करीब १५० पन्नों की इस जीवनी में ना सिर्फ़ रूहानी मोहब्बत की झलक मिलेगी बल्कि आध्यात्मिक ज्योति के भी दर्शन होंगे। इस आत्मकथा में अनेकानेक ऐसे क़िस्से-कहानियाँ हैं जो रूह की गहराइयों में उतरना भी जानते हैं और होंठों पर प्रार्थनाओं की तरह बसना भी जानते हैं। इस एक पुस्तक में साहित्य के सारे रंग हैं, मोहब्बत की कभी न ख़त्म होने वाली दास्ताँ है, चेतन व अवचेतन मन के हज़ारों भेद हैं, ज़िंदगी के उतार-चढ़ाव हैं, एक लेखक की ईमानदारी है, एक औरत के चरित्र का बल है, एक माँ के सृजन की शक्ति है और सबसे ऊपर इस एक पुस्तक में अप्रवीण एवं प्रवीण दोनों तरह के लेखकों के लिए कलम के जादू को कैसे बिखेरा  जाए और सदियों तक कैसे उसे बरक़रार रखा जाए के उदाहरण हैं।
वैसे तो लेखकों के जीवन में कोई अंतिम रचना नहीं होती, वे तो विचारों के सागर में डूबकर बेशक़ीमती मोती ढूँढकर लाते ही रहते हैं। मगर ये मोती कभी स्याही बनकर काग़ज़ पर उतरते हैं तो कभी बस एक ख़याल बन लेखक के ज़हन में बसे रह जाते हैं।
अमृता जी ने इन मोतियों को काग़ज़ पर आख़िरी बार वर्ष २००२ में तब उतारा जब उन्होंने 'मैं तैनु फिर मिलांगी' लिखी। इस कविता संग्रह की ताज़गी आने वाली कई पीढ़ियों को सदियों तक प्रफुल्लित करती रहेगी। प्रस्तुत है इस कविता का एक अंश (पंजाबी से हिंदी में अनूदित)-
"पर यादों के धागे
कायनात के लम्हों की तरह होते हैं
मैं उन लम्हों को चुनूँगी
उन धागों को समेट लूँगी
मैं तुझे फिर मिलूँगी
कहाँ कैसे पता नहीं
मैं तुझे फिर मिलूँगी"
अमृता जी ३१ अक्टूबर, २००५ को इस संसार के हर कण में समाहित हो गईं और उनकी क़लम एक ऐसा ध्रुव तारा बन गई, जो आज भी अनगिनत लेखकों को राह दिखता है और यह याद दिलाता है कि साहित्यिक समाज के माथे के बल भुगतना एक सच्चे रचनाकार की ख़ूबसूरत क़िस्मत होती है।

अमृता प्रीतम : जीवन परिचय

जन्म

३१ अगस्त १९१९, गुजरांवाला (पंजाब, अविभाजित भारत)

निधन

३१ अक्टूबर, २००५

माता

राज कौर

पिता

करतार सिंह

पति

प्रीतम सिंह

संतान

कांधला (पुत्री), नवराज क्वात्रा (पुत्र)

साहित्यिक रचनाएँ

उपन्यास

  • डॉक्टर देव 

  • पिंजर 

  • कोरे काग़ज़ 

  • उनचास दिन 

  • रंग दी पट्टा 

  • दिल्ली की गलियाँ 

  • कच्ची सड़क

  • यात्री 

  • जिलावतन

  • धरती सागर ते सीपियाँ 

  • अग दा बूटा 

  • दूसरी मंज़िल

  • तेहरवाँ सूरज 

  • हरदत्त का जिंदगीनामा

काव्य

  • हीरे दी कनी 

  • लातियाँ दी छोकरी 

  • इक शहर दी मौत 

  • तीसरी औरत 

  • किरमिची लकीरें

  • काला गुलाब 

  • इकी पत्तियाँ दा गुलाब 

  • केड़ी ज़िंदगी केड़ा साहित्य 

  • मुहब्बतनामा

  • कड़ी धुप्प दा सफ़र 

  • अज्ज दे काफ़िर

आत्मकथा

  • रसीदी टिकट (१९७६)

सम्मान व पुरस्कार

  • साहित्य अकादमी पुरस्कार(१९५६)

  • पद्मश्री(१९६९)

  • भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार(१९८२)

  • बल्गारिया वैरोव पुरस्कार(१९८८)

  • शताब्दी सम्मान(२०००)

  • पद्म विभूषण(२००४)

  • गुगल डुडल(२०१९)

https://lh5.googleusercontent.com/pNlkLHeNIhkumtPnTCfUOYNpcMFLdZ6HexQ5d6RhqPIikuw8gsQHfHA5Se17H-KWaBmohp-_r4nEIc02P_T2ItApx2VXKe6vfF0zFgZuFpTqc6L9A56sIpgXwTWtBmMU3XeKvJLbMJMGdbF1ybJMVgTzBAl7S3aj9N2Ip3J2uee1PUXFeKsQQ0TDCw

संदर्भ

  • रसीदी टिकट - अमृता प्रीतम

  • विभिन्न पत्रों में छपे लेख व साक्षात्कार

लेखक परिचय

शिवानी भार्गव

एक सुहृदय पाठक हैं जिन्हें पसंद हैं हिंदी की सरलता, उर्दू की नज़ाकत, नृत्य की थिरकन, सैर का आवारापन।

Tuesday, August 30, 2022

भगवती चरण वर्मा: साहित्य जगत में लोक-भाषा के संवाहक

 


मानवीय स्वभाव और संवेदनाओं का कारुणिक वर्णन करने में सिद्धहस्त भगवती चरण वर्मा आधुनिक हिंदी-साहित्य में मील के पत्थर हैं, जहाँ से हिंदी कथा-साहित्य की विकास की अनेक धाराएं फूटती हैं। मनुष्य का बौद्धिक एवं सामाजिक विकास उसके परिवार, शिक्षा-दीक्षा, आर्थिक और सामाजिक परिस्थिति पर निर्भर करता है; इस दृष्टि से भगवती चरण वर्मा के व्यक्तित्त्व और कृतित्त्व में अनेक निर्माणकारी तत्त्व रहे हैं।

हिंदी-साहित्य के मूर्धन्य हस्ताक्षर भगवती चरण वर्मा का जन्म ३० अगस्त १९०३ में उन्नाव जिले के फीपुर में हुआ था। छोटी उम्र में ही पिता का साया सिर से उठ जाने के कारण उन्हें बचपन में अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ा। धीर-गंभीर बालक भगवती ने हार नहीं मानी और जीवन में परिस्थिति अनुसार अनेक काम किये वयस्क होने के पश्चात प्रतिभा संपन्न भगवती बाबू ने कलम उठायी तथा स्वतंत्र लेखन किया। आपने बी.ए.एल.एल.बी. की शिक्षा प्राप्त कर साहित्य की विभिन्न विधाओं में सर्जना की है। बहुमुखी प्रतिभा के धनी भगवती चरण वर्मा का साहित्य में पदार्पण हिंदी-कविता के माध्यम से  हुआ था। छायावादी युग में अनुभूति और भाव प्रवणता की अभिव्यक्तियों के दौर में आपकी संवेदनाएं नित नयी सर्जनाएं कर रही थीं। आपकी रचनाएं युगीन विसंगतियों पर प्रहार कर नव-युग के सृजन की, जीवन के प्रति आशा और उम्मीद जगाती हैं-

कल सहसा यह संदेश मिला

सूने-से युग के बाद मुझे

कुछ रोकर कुछ क्रोधित होकर

तुम कर लेती हो याद मुझे

 

गिरने की गति में मिलकर

गतिमय होकर गतिहीन हुआ

एकाकीपन से आया था

अब सूनेपन में लीन हुआ।

 

यह ममता का वरदान सुमुखी है

अब केवल अपवाद मुझे

मैं तो अपने को भूल रहा

तुम कर लेती हो याद मुझे

 

पुलकित सपनों का क्रय करने

मैं आया अपने प्राणों से

लेकर अपनी कोमलताओं को

मैं टकराया पाषाणों से।...

प्रारंभिक रूप से छायावादी कवि होने के चलते भगवती बाबू इस काव्य-स्नेह को जीवन पर्यन्त स्वयं से विलग नहीं कर पाए। काव्य से उनका आंतरिक प्रेम कुछ इस तरह उमड़ता दिखता है-

तुम मृगनयनी तुम पिकबयनी
तुम छवि की परिणीता-सी
अपनी बेसुध मादकता में
भूली-सी, भयभीता-सी
 
तुम उल्लास से भरी आई हो
तुम उच्छवास भरी
तुम क्या जानो मेरे उर में
कितने युग की प्यास भरी!... 

उनके अनेक आत्मस्वीकृतियों के शब्दों में यह स्पष्ट रूप से सिद्ध होता है कि उपन्यासकार होने को लेकर आग्रही रहने वाले भगवती चरण वर्मा की आंतरिक सुगंध एक कवि की रही। उनकी कविताओं की संख्यात्मकता भले ही इस कथन की पुष्टि न करे, लेकिन आत्म-साक्ष्य की बात करें तो यह सही लगता है।

अपने समय-बोध से प्रेरणा ग्रहण करने वाले इस फक्कड रचनाकार की प्रारंभिक रचनाएं स्वाभाविक रूप से देश-प्रेम की भावनाओं से ओत-प्रोत रही। छायावाद के प्रारंभिक स्पर्श के पश्चात उसकी रहस्यवादी और आध्यात्मिक प्रकार की प्रवृत्तियों से आपके व्यक्तित्त्व का मेल बैठ पाना संभव नही था। यह सही है कि उन्हें  महादेवी वर्मा और रामकुमार वर्मा के साथ लघुत्रयी के रूप में जोड़ा गया, लेकिन अपनी कविताओं से  वे अपना अलग मुकाम बनाने में सफल रहे

उस ओर क्षितिज के कुछ आगे कुछ पांच कोस की दूरी पर

भू की छाती पर फोड़ों से हैं उठे हुए कुछ कच्चे घर

पशु बनकर पिस रहे जहाँ, नारियां जन रहीं हैं ग़ुलाम

पैदा होना फिर मर जाना, बस यह लोगों का एक काम

धन की दानवता से पीड़ित कुछ फटा हुआ कुछ कर्कश स्वर
चरमर चरमर चूं चरर मरर जा रही चली भैंसागाड़ी ... 

उपरोक्त पंक्तियां उनकी सोच और रचनाधर्मिता के उद्देश्य और विचारधारा को रेखांकित करती हैं, जिसके अनुसार वे भौतिक-जीवन के सजीव व सामाजिक चित्रण करने में कुशल रहे। वे कविता में गति और लय को हमेशा प्राधान्य देते रहे। यदि हम गीत में गेयता की बात करें, शब्दों के सही वजन और उनके सस्वर पाठ में कविता के शब्दों के साथ यदि स्वर, लय के साथ मिलता हो तो इसकी रंजकता में, सार्थकता में वृद्धि होती है। भगवती बाबू की अनेक रचनाएं इस कसौटी पर खरी उतरती हैं 

जीवन-सरिता की लहर-लहर
मिटने को बनती यहाँ प्रिये
संयोग क्षणिक, फिर क्या जाने
हम कहाँ और तुम कहाँ प्रिये
पल भर तो साथ-साथ बह लें
कुछ सुन लें कुछ अपनी कह लें
आओ कुछ ले लें औ' दे लें।

 नियतिवाद में विश्वास रखने वाले भगवतीचरण वर्मा भौगोलिक रू से भी एक स्थान से दूसरे स्थान पर आते-जाते रहे और यही विचार उन्हें विधाओं के मध्य भी सहजता से एक यात्रिक के रू में स्थापित करता रहा। वे कवि से कहानीकार, उपन्यासकार हो चले और अपनी इस स्थिति का वर्णन आपने इन शब्दों में किया-

हम तो रमते-राम सदा के, दोस्त हमारा गाँव न पूछो
एक यंत्र-सा जो कि नियति के हाथों से संचालित होता
कुछ ऐसा अस्तित्त्व हमारा, दोस्त हमारा काम न पूछो

अथवा

             उल्लास और उच्छ्वास तुम्हारे ही अवयव
             तुमने मरीचिका और तृषा का सृजन किया
             अभिशाप बनाकर तुमने मेरी सत्ता को
             मुझको पग-पग पर मिटने का वरदान दिया…

 अपने सारे अनुभवों का सार अपनी पंक्तियों में आपने रच दिया है तथा जीवन को परिभाषित करते हुए लिखते हैं-

हम दीवानों की क्या हस्ती है आज यहाँ कल वहाँ चले,
मस्ती का आलम साथ चला, हम धूल उड़ाते जहाँ चले 

पद्य सर्जना के पश्चात भगवती चरण वर्मा का रुझान कहानियों की ओर हो चला। भगवती बाबू अपने समय के श्रेष्ठ कहानीकारों में गिने जाते रहे। आप की कहानियां पढ़कर पाठक मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। सामाजिक परिवेश, पारिवारिक प्रसंग, सादगी, स्पष्टता और सहज अभिव्यक्ति आपकी कहानियों में स्पष्ट दिखाई देती है। सामान्य घटनाओं का मार्मिक, प्रभावी तो कभी चुटीला प्रस्तुतिकरण आपकी विशेषता है। आपने मुख्यतः चरित्र प्रधान, समस्या प्रधान और विचार प्रधान कहानियां लिखी हैं। आपकी कहानियों के पात्र समाज के विभिन्न वर्गों से चुने गये हैं, जिनका मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से चित्रण कर सजीव बनाया गया है। आपकी संवाद और कथाकथन योजना कहानियों में विशेष प्रभाव त्पन्न करती हैं। दो बांके, सल्तनत बख्श दी, प्रायश्चित, काश मैं कह सकता, विक्टोरिया क्रॉस, कायरता, वसीयत इत्यादि आप की प्रसिद्ध कहानियां हैं। कुछ कहानियां लिखकर भगवती बाबू उपन्यास विधा में स्थापित हुए तथा उनके उपन्यासों को चतुर्दिक प्रसिद्धि मिली।

नि:संदेह गद्य-साहित्य में उपन्यास अत्यंत लोकप्रिय और सशक्त साहित्यिक विधा है। यह लोक-जीवन की जीवंत अभिव्यक्ति है विद्वानों ने इसे मानव सभ्यता की प्रतिकृति कहा है। भगवती चरण वर्मा प्रेमचंदोत्तर युग के महत्त्वपूर्ण रचनाकार रहे हैं, आपकी सशक्त और प्रभावी औपन्यासिक कृतियों ने साहित्य में नए आयाम रचे हैं। ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर आपका सर्वाधिक लोकप्रिय उपन्यास चित्रलेखा रहा है, जो पाप और पुण्य  विषय पर केंद्रित है, जिसमें एक सन्यासी सांसारिकता की ओर अग्रसर होना चाहता है, लेकिन नायिका चित्रलेखा उसे फटकारती है, तथा उसकी स्वयं की रुचि सन्यास में हो जाती है। चित्रलेखा में महान योगी कुमार गिरि और भोग-विलास तथा वासना में लिप्त शासक बीजगुप्त के चरित्रों की पारस्परिक तुलना में अप्रत्याशित रूप से भगवती बाबू पाप और पुण्य की नई परिभाषा गढ़ते हैं। वे लिखते हैं- "संसार में पाप कुछ भी नहीं है, वह केवल मनुष्य के दृष्टिकोण के विषमता का दूसरा नाम है। प्रत्येक व्यक्ति एक विशेष प्रकार की मन: प्रवृत्ति लेकर पैदा होता है। प्रत्येक व्यक्ति इस संसार के रंगमंच पर एक अभिनय करने आता है, अपनी मन: प्रवृत्ति से प्रेरित होकर अपने पाठ को वह दोहराता है। यही मनुष्य का जीवन है, जो कुछ मनुष्य करता है, वह उसके स्वभाव के अनुकूल होता है, और स्वभाव प्राकृतिक होता है। मनुष्य अपना स्वामी नहीं है, वह परिस्थितियों का दास है, विवश है। वह कर्त्ता नहीं है, वह केवल साधन मात्र है, फिर पाप और पुण्य कैसा!"

"मनुष्य में ममत्त्व प्रधान होता है। प्रत्येक मनुष्य सुख चाहता है व्यक्तियों के सुख के केंद्र भिन्न होते हैं, कुछ सुख को धन में देखते हैं, कुछ त्याग में देखते हैं, पर सुख प्रत्येक व्यक्ति चाहता है। कोई भी व्यक्ति संसार में अपनी इच्छा अनुसार वह काम न करेगा जिसमें दु:ख मिले, यही मनुष्य की प्रवृत्ति हैं और उसके दृष्टिकोण की विषमता है। संसार में इसीलिए पाप की परिभाषा नहीं हो सकी और न हो सकती है। हम न पाप करते हैं न पुण्य करते हैं, हम केवल वह करते हैं जो हमें करना पड़ता है।" आपका उपन्यास टेढ़े मेढ़े रास्ते एक रोचक धार्मिक और लोककथा पर आधारित उपन्यास है, जिसमें हिंदू लोक-जीवन के महत्त्व को बताया गया है। आप के उपन्यासों में लोकगीत और लोक परंपरा के दर्शन होते हैं। यह परंपराएं मानव मन की अनुभूतियों की सरस रागात्मक अभिव्यंजना की लयात्मकता लिए होती हैं। "खेल री जी भर फाग आंगन तोरे आए हैं साजन" तथा "फागुन के दिन चार बावले कर ले जी भर मौज" जैसी पंक्तियां पात्रों की भावनाओं को अभिव्यक्त करती हैं।

कथ्य की दृष्टि से आपने १९वीं सदी के दशकों १८८० से लेकर भारत पर चीन आक्रमण १९६२ तक के काल को व्यापक और विविधता पूर्ण दृष्टि देकर रचनाधर्मिता की है। आपने समाज को तत्कालीन यथार्थ स्थिति से अवगत कराते हुए सामाजिक ऊंच-नीच, भलाई-बुराई सुख-दु:ख का चित्रण करते हुए, मानव मन की अतल गहराइयों की थाह लेकर सामाजिक समस्याओं का चित्रण किया है। आप उपन्यास साहित्य में लोक-संस्कृति की विविध विधाएं स्वाभाविक रूप से लेकर आए हैं। इन विधाओं में कथा, गीत, भाषिक अभिव्यक्ति, दीर्घ-संवाद, लघुवार्त्ता आदि समाविष्ट हैं। भगवती बाबू की भाषा-शैली सरल, सहज और प्रवाहमय है। आपकी रचनाओं में उपस्थित शिष्ट हास्य और परिमार्जित व्यंग्य पाठकों को प्रभावित करते हैं। आपकी भाषा सरल, सहज और तत्सम तथा तद्भव शब्दों से युक्त है। आपकी रचनाओं के ग्रामीण पात्र लोक-बोली में अपने भावों को प्रकट करते हैं, तो शिक्षित हिंदू पात्रों की भाषा में संस्कृत के तत्सम-तद्भव शब्द का बाहुल्य मिलता है। मुस्लिम पात्र उर्दू-फारसी समन्वित भाषा बोलते हैं, कचहरी की भाषा एक अलग ही ढंग की प्रयुक्त हुई है। इस प्रकार आपकी रचनाओं में भाषाओं का इंद्रधनुष सतरंगी भाषिक अभिव्यक्ति दर्शाता है। आपके उपन्यासों में मुहावरों का भी रोचक प्रयोग अत्यंत कौशल से किया गया है। दांतो तले उंगली दबाना, सिर आंखों पर, घाट-घाट का पानी पीना, उंगली पर नचाना, आग में घी डालना, आपे से बाहर होना, अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारना, बगले झांकना, वेद वाक्य मानना, चुल्लू भर पानी में डूबना, दाल में काला, धुन का पक्का, हवाई किले बनाना इत्यादि मुहावरे रचनाओं को भाषाई सौंदर्य प्रदान करते हैं।

जल्दी का काम शैतान का, मुद्दई सुस्त गवाह चुस्त, मौत ने घर का रास्ता देख लिया, प्यासा कुएं के पास जाता है, न नौ मन तेल होगा न राधा नाचेगी, भागते भूत की लंगोटी जैसी लोकोक्तियों ने आपके विचारों को व्यापक अर्थ प्रदान किया है। इन रचनाओं में जीवन की विकृति और विसंगति पाठकों को उद्वेलित करती है और यथार्थ के अनुभव के साथ पाठकों को संवेदनशील बनाती है। लोकभाषा, बोलियां, लोक-कथाएं विश्व भर के मानव समाज में कही सुनी जाती हैं। जनमानस  लोक-कथा का अपरिमित संग्रह होता है, ये कथाएं मनुष्य की आदिमकाल, तत्कालीन परंपराएं, रीति-रिवाज, श्रद्धा और विश्वास का प्रतिनिधित्त्व करती हैं। इन लोक-कथाओं में प्रभात काल की गुलाबी मादकता, मध्याह्न काल की प्रखरता तथा सांध्य गगन की श्रांत-क्लांत अनुभूतियों की रत्न राशि विद्यमान होती है। भगवती चरण वर्मा के साहित्य-संसार में लोक-कथा, बोलियां प्रचुर मात्रा में दिखती हैं, जो उनके भाषायी सौंदर्य में श्री वृद्धि करती हैं

अलौकिक रीत-रिवाज के तत्त्वों के अलावा अभिजात साहित्य में लोक विश्वासों के तत्त्व भी समाहित रहते हैंभगवती बाबू के उपन्यास साहित्य इन विश्वासों से अछूते नहीं हैं; उसमें धार्मिक, ज्योतिष, तंत्र-मंत्र, मानवीप्राणी से संबंधित विश्वासों को स्थान मिला हैलौकिक शक्ति, शाप, वरदान, पुनर्जन्म जैसे विषय भी समाविष्ट हैं। लोक-जीवन के अंतर्गत सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, राजनीतिक, प्राकृतिक और धार्मिक जीवन के बहुआयामी पक्ष उपन्यासकार भगवती चरण वर्मा की कृतियों में हमें दिखाई देतेसांस्कृतिक चेतना का अभ्युदय, मानवतावादी विचार-दर्शन आदि सभी तत्त्व आपके उपन्यास कला के आभूषण हैंआपने शिक्षा, खान-पान, वेशभूषा, आचार-विचार, आमोद-प्रमोद को भी अपनी लेखनी में रचनाओं में प्रमुख स्थान दिया हैभगवती बाबू का उपन्यास साहित्य वैविध्यपूर्ण है, इसमें प्रकृति, समाज, संस्कृति के समस्त उपादानों का वास्तविक अंकन हुआ हैइस तरह आप के उपन्यासों में लोक-वार्त्ता के विविध पक्षों का चित्रण लोक-साहित्य के अनेक अंग पुरातन मान्यताएं-धारणाएं लोक-जीवन के बहुरंगी जीवंत चित्रण चित्र प्राप्त होते हैंआपका साहित्य लोक-मानस का दर्पण है, उसमें लोक-जीवन की संवेदनाओं की सही पहचान है।

आधुनिक हिंदी उपन्यासकारों में भगवती चरण वर्मा का विशेष स्थान है। रोचकता से परिपूर्ण उनके उपन्यास चित्रलेखा, रेखा, भूले बिसरे चित्र आज भी लोग दिलचस्पी से पढ़ते हैं। भगवती बाबू ने अपने दौर में ऐसे विषयों को भी उठाया जिन पर साहित्यकार लिखने से संकोच करते थे या जिन पर लिखना साहस का काम हुआ करता था। चित्रलेखा और रेखा यह कृतियां प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। उनके उपन्यासों में शिल्प के अनुसार वर्णन शैली प्रवाहमयी होती थी। साहित्यिक पत्रिका के संपादक गौरीनाथ के अनुसार भगवती चरण वर्मा की कई रचनाओं में गजब की पठनीयता है वह किशोर और युवाओं की मानसिकता के करीब है, उनमें उनके लेखन में पाठकों में भावेश उत्पन्न करने की शक्ति है। उनकी रचनाओं में भावुकता का स्थायी भाव रहा है, इसलिए वह करुणा और कोमल भाव जगाने में सफल रहे हैं।

चित्रलेखा के अतिरिक्त भूले-बिसरे चित्र, टेढ़े मेढ़े रास्ते, सीधी सच्ची बातें, सामर्थ्य और सीमा, रेखा, वह फिर नहीं आई, सबहिं नचावत राम गुसाईं, प्रश्न और मरीचिका, युवराज चूण्डा, दो पल भूपल आदि प्रसिद्ध उपन्यास रहे हैंउनकी कृति ‘चित्रलेखा’ पर दो बार १९४१ और १९६४ में फिल्में बनीं और दोनों बार उसे अच्छी लोकप्रियता मिली।

भगवती चरण वर्मा कुछ समय तक आकाशवाणी और फिल्मों से भी जुड़ेउन्होंने फिल्म कॉरपोरेशन कोलकाता में काम किया तथा मुंबई फिल्म जगत में कथा-लेखन भी कियाउन्होंने दैनिक नव-जीवन का संपादन कियाबतौर उपन्यासकार उन्हें साहित्य जगत में प्रसिद्धि मिलीसाहित्य अकादमी सहित पद्मभूषण एवं अन्य सम्मानों से सम्मानित किया गया, साथ ही राज्यसभा के लिए मनोनीत किया गया। ५ अक्टूबर १९८१ को उनका निधन हो गया।

भगवती चरण वर्मा की  लेखनी समाज को नई दिशा देने वाली रहीभाषा पर गहरी पकड़ रखने वाले भगवती बाबू की रचनाएं आज भी प्रासंगिक हैं, लेकिन साहित्य जगत ने उन्हें आज बिसरा दिया। साहित्यकार विलास गुप्ते कहते हैं- "भगवती चरण वर्मा ने चित्रलेखा लिखा था, तब प्रेमचंद का साहित्य लोगों के जेहन में थासमसामयिक जीवन की वास्तविकता से  उस दौर में इतिहास को आधार बनाते हुए संस्कृत के शब्दों का इस्तेमाल कर चित्रलेखा की रचना करने का साहस सिर्फ वही दिखा सकते थे, हालांकि चित्रलेखा में पाप और पुण्य को लेकर सवाल उठाए गए थे, लेकिन आध्यात्मिक और नैतिकता की दृष्टि से यह एक उत्तम उपन्यास था, यह आज भी खूबसूरत है।" ज्ञानपीठ के निदेशक और वरिष्ठ साहित्यकार रवींद्र कालिया कहते हैं- "भगवती चरण वर्मा हिंदी के महत्त्वपूर्ण उपन्यासकार हैं, मगर हिंदी ने उन्हें लगभग भुला-सा दिया और यह कुछ उनके उपन्यास भूले-बिसरे चित्र के जैसा ही हुआ।"

 निष्कर्ष रूप में हम कह सकते हैं कि साहित्य आराधक भगवती चरण वर्मा का साहित्य आज भी प्रासंगिक हैभले ही साहित्य ने भूले-बिसरे चित्र की तरह उन्हें बिसरा दिया, किंतु आज हम साहित्यकार तिथिवार पटल पर उनके जन्मदिवस पर, उनके पावन स्मृतियों को नमन करते हैं, उनके कृतित्त्व को प्रणाम करते हैं!

भगवती चरण वर्मा : जीवन परिचय

जन्म

३० अगस्त १९०३ शफीपुर, जिला-उन्नाव, उत्तर प्रदेश, भारत

मृत्यु

अक्टूबर १९८१ (उम्र ७८), लखनऊ, उत्तर प्रदेश, भारत

पिता

श्री देवी चरण वर्मा

पुत्र

श्री धीरेंद्र वर्मा

शिक्षा एवं कार्य-क्षेत्र

स्नातक कला

प्रयागराज विश्वविद्यालय, प्रयागराज

एल.एल.बी.

प्रयागराज विश्वविद्यालय, प्रयागराज

कर्म-क्षेत्र

दिल्ली, मुम्बई, कोलकाता, लखनऊ

कार्य-क्षेत्र

उपन्यास, कविता, कहानी, संस्मरण, नाटक, आलोचना, पत्रकारिता

साहित्यिक रचनाएं

उपन्यास

पतन (१९२८), चित्रलेखा (१९३४), टेढ़े-मेढ़े रास्ते (१९४६), अपने खिलौने (१९५७), भूले-बिसरे चित्र (१९५९), सामर्थ्य और सीमा (१९६२), थके पाँव (१९६४), सबहिं नचावत राम गोसाईं (१९७०), प्रश्न और मरीचिका (१९७३), रेखा, सीधी सच्ची बातें, युवराज चूण्डा, तीन वर्ष, वह फिर नहीं आई, धुप्पल, चाणक्य, क्या निराश हुआ जाए

कहानी-संग्रह

·       दो बांके (१९३६)

·       मोर्चाबंदी

·       इंस्टालमेंट

·       मुगलों ने सल्तनत बख्श दी

कविता-संग्रह

·       मधुकण (१९३२)

·       प्रेम-संगीत (१९३७)

·       मानव (१९४०)

नाटक

·       वसीहत

·       रुपया तुम्हें खा गया (१९५५)

·       सबसे बड़ा आदमी

संस्मरण

अतीत के गर्भ से

रेडियो-रूपक

त्रिपथगा (१९५६)

आलोचना 

साहित्य के सिद्घान्त और रूप

सम्पादन

·       विचारसाप्ताहिक पत्रिका

·       नवजीवन दैनिक पत्र

सम्मान व पुरस्कार

·      साहित्य अकादमी पुरस्कार- १९६१ (उपन्यास-भूले-बिसरे चित्र)

·      साहित्य वाचस्पति- १९६९

·      पद्मभूषण, भारत सरकार- १९७१

·      मानद राज्यसभा सदस्य- १९७८

 संदर्भ-

१.    रचनाकार (नेसे प्राप्त)

२.    सुप्रसिद्ध आलोचक निर्मला जैन

३.    आखरी दाव- पृष्ठ-३

४.    भूले-बिसरे चित्र- पृष्ठ-८६

५.    भगवती चरण वर्मा के उपन्यासों में लोकतत्व -डॉ दिव्या वर्मा

६.    गद्यकोष (नेट से प्राप्त)

७.    भगवती चरण वर्मा को भुला क्यों दिया गया? -प्रभासाक्षी ई-पत्रिका

 लेखक 

 डॉ वसुधा गाडगिल, इंदौर









डॉ. वसुधा गाडगिल , लेखिका और अनुवादक।  लघुकथा, कहानी ,कविता , संस्मरण, जीवनी, यात्रा वृतांत लेखन, हिंदी - मराठी में अनुवाद लेखन। हिंदी भाषा, साहित्य पठन - पाठन, तकनीकी युग में देवनागरी को अपनाने, हिंदी भाषा को युवाओं से जोड़ने  हेतु प्रत्यक्ष तथा आभासी  कार्यशालाओं का आयोजन करने जैसे अकादमिक कार्यों में सहभागिता।

साहित्य और प्रकृति, पर्यावरण हेतु  लेखन। विभिन्न साहित्यिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित।
प्रकृति, जल संरक्षण और स्वच्छता अभियान में स्वैच्छिक सेवा और प्रेरक लेखन हेतु महापौर इंदौर तथा हेल्प बॉक्स नेचर संस्था, भोपाल  द्वारा सम्मानित।

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कलेंडर जनवरी

Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat
            1वह आदमी उतर गया हृदय में मनुष्य की तरह - विनोद कुमार शुक्ल
2अंतः जगत के शब्द-शिल्पी : जैनेंद्र कुमार 3हिंदी साहित्य के सूर्य - सूरदास 4“कल जिस राह चलेगा जग मैं उसका पहला प्रात हूँ” - गोपालदास नीरज 5काशीनाथ सिंह : काशी का अस्सी या अस्सी का काशी 6पौराणिकता के आधुनिक चितेरे : नरेंद्र कोहली 7समाज की विडंबनाओं का साहित्यकार : उदय प्रकाश 8भारतीय कथा साहित्य का जगमगाता नक्षत्र : आशापूर्णा देवी
9ऐतिहासिक कथाओं के चितेरे लेखक - श्री वृंदावनलाल वर्मा 10आलोचना के लोचन – मधुरेश 11आधुनिक खड़ीबोली के प्रथम कवि और प्रवर्तक : पं० श्रीधर पाठक 12यथार्थवाद के अविस्मरणीय हस्ताक्षर : दूधनाथ सिंह 13बहुत नाम हैं, एक शमशेर भी है 14एक लहर, एक चट्टान, एक आंदोलन : महाश्वेता देवी 15सामाजिक सरोकारों का शायर - कैफ़ी आज़मी
16अभी मृत्यु से दाँव लगाकर समय जीत जाने का क्षण है - अशोक वाजपेयी 17लेखन सम्राट : रांगेय राघव 18हिंदी बालसाहित्य के लोकप्रिय कवि निरंकार देव सेवक 19कोश कला के आचार्य - रामचंद्र वर्मा 20अल्फ़ाज़ के तानों-बानों से ख़्वाब बुनने वाला फ़नकार: जावेद अख़्तर 21हिंदी साहित्य के पितामह - आचार्य शिवपूजन सहाय 22आदि गुरु शंकराचार्य - केरल की कलाड़ी से केदार तक
23हिंदी साहित्य के गौरव स्तंभ : पं० लोचन प्रसाद पांडेय 24हिंदी के देवव्रत - आचार्य चंद्रबलि पांडेय 25काल चिंतन के चिंतक - राजेंद्र अवस्थी 26डाकू से कविवर बनने की अद्भुत गाथा : आदिकवि वाल्मीकि 27कमलेश्वर : हिंदी  साहित्य के दमकते सितारे  28डॉ० विद्यानिवास मिश्र-एक साहित्यिक युग पुरुष 29ममता कालिया : एक साँस में लिखने की आदत!
30साहित्य के अमर दीपस्तंभ : श्री जयशंकर प्रसाद 31ग्रामीण संस्कृति के चितेरे अद्भुत कहानीकार : मिथिलेश्वर          

आचार्य नरेंद्रदेव : भारत में समाजवाद के पितामह

"समाजवाद का सवाल केवल रोटी का सवाल नहीं है। समाजवाद मानव स्वतंत्रता की कुंजी है। समाजवाद ही एक सुखी समाज में संपूर्ण स्वतंत्र मनुष्यत्व...