Tuesday, August 2, 2022

भारतीय संस्कृति के अनन्य प्रवक्ता: राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त

 

“जिसको न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान है
वह नर नहीं नर-पशु निरा और मृतक समान है”-

इन पंक्तियों द्वारा राष्ट्रीयता तथा राष्ट्र प्रेम को मनुष्यता का पर्याय घोषित करनेवाले और मानस भवन में आर्यजन जिसकी उतारें आरतीभगवान भारतवर्ष में गूँजे हमारी भारतीजैसे शब्दों से अपने देश की शुभाशंसा को अपने व्यक्तित्व और कृतित्व की प्रेरणा बनानेवाले राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त का जन्म एक संपन्न वैश्य परिवार में हुआ था। उनके पिता, श्री रामचरण गुप्त, एक निष्ठावान् राम भक्त और काव्यानुरागी व्यक्ति थे। उनके ये दोनों गुण मैथिलीशरण जी को विरासत के रूप में प्राप्त हुए थे। मुंशी अजमेरी ने उनका मार्गदर्शन किया और १२ वर्ष की आयु में ब्रजभाषा में कनकलता नाम से उन्होंने अपनी पहली कविता लिखनी आरंभ की घर पर ही अँग्रेज़ी, बँगला, संस्कृत एवं हिन्दी का अध्ययन करने वाले गुप्त जी की प्रारंभिक रचनाएँ कोलकाता से प्रकाशित वैश्योपकारक नामक पत्रिका में छपती थीं। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जी के संपर्क में आने पर उनके आदेश, उपदेश एवं स्नेहमय परामर्श से गुप्त जी खड़ी बोली में कविता लिखने लगे। महादेवी वर्मा से परिचय के बाद उनकी कविताएँ सरस्वती में प्रकाशित होनी प्रारंभ हुईं। उन्होंने गाँधी जी से प्रभावित होकर राष्ट्रीय आन्दोलन में भाग लिया और कारावास भी गए

गुप्त जी ने खड़ी बोली के स्वरूप-निर्धारण एवं विकास में महत्वपूर्ण योगदान किया। उनकी प्रारंभिक रचनाओं में इतिवृत्तात्मकता की अधिकता है, किंतु बाद की रचनाओं में लाक्षणिक वैचित्र्य एवं सूक्ष्म मनोभावों की मार्मिक अभिव्यक्ति हुई है। गुप्त जी ने चवालीस से अधिक रचनाओं में प्रबंध के अंतर्गत गीतिकाव्य का समावेश कर उन्हें उत्कृष्टता प्रदान की है। उनकी चरित्र कल्पना में कहीं भी अलौकिकता के लिए स्थान नहीं है। सारे चरित्र मानव हैं, उनमें देव एवं दानव नहीं है। उनके राम, कृष्ण, गौतम आदि सभी प्राचीन और चिरकाल से हमारी श्रद्धा प्राप्त किए हुए पात्र हैं। गुप्त जी ने मानवीय स्वरूप में उनकी संकल्पना की है। साकेत के राम ईश्वर होते हुए भी तुलसीदास के राम की भाँति अलौकिक नहीं, हमारे ही बीच के एक मानव हैं।

वे गंभीर विषयों को भी सुंदर और सरल शब्दों में प्रस्तुत करने में सिद्धहस्त थे। उनकी भाषा में लोकोक्तियों एवं मुहावरों के प्रयोग से जीवंतता आई है। गुप्त जी मूलत: प्रबन्धकार थे, लेकिन प्रबंध के साथ-साथ मुक्तक, गीति, गीतिनाट्य, नाटक आदि क्षेत्रों में भी उन्होंने रचनाएँ की हैं। हिन्दी साहित्य में खड़ी बोली को कविता की भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने में गुप्त जी का बड़ा योगदान है। उनकी भाषा में माधुर्य, भाव की तीव्रता और संस्कृत के शब्दों की बहुलता उसको अभिव्यंजकता, प्रवाहमयता और संगीतात्मकता से समृद्ध करती है।

साकेत और यशोधरा में गुप्त जी ने नारी विमर्श की एक मौलिक उद्भावना की, जिसने यशोधरा और उर्मिला के त्याग के प्रति पूर्ववर्ती कवियों की उदासीनता को दर्शाया तथा कैकेयी के चरित्र के सदियों से प्रचलित कलुष को पश्चाताप की अग्नि से तपा कर एक उज्जवल गरिमा प्रदान की। उन्होंने नारी की  मानवीय संवेदना को रेखांकित ही नहीं किया, बल्कि उसके साथ पाठक को साधारणीकृत भी किया। यह उनके काव्य की महती उपलब्धि और हिन्दी साहित्य की अमूल्य निधि है। राष्ट्रप्रेम तथा राष्ट्रीयता की भावना से ओतप्रोत रचनाओं के कारण हिन्दी साहित्य में मैथिलीशरण जी का  विशेष स्थान है। वे सच्चे अर्थों में लोगों में राष्ट्रीय भावनाओं को भरकर उनमें जनजागृति लाने वाले राष्ट्रकवि हैं।भारत-भारती में प्राचीन भारतीय संस्कृति का प्रेरणाप्रद चित्रण हुआ है तथा आज की समस्याओं और विचारों के स्पष्ट दर्शन होते हैं। गाँधीवाद तथा कहीं-कहीं आर्य समाज का प्रभाव भी उन पर पड़ा है। अपने काव्य की कथावस्तु गुप्त जी ने आज के जीवन से लेकर प्राचीन इतिहास अथवा पुराणों से ली है। उनका अभीष्ट अतीत की गौरव गाथाओं को वर्तमान जीवन के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत करके मानवतावाद एवं नैतिक प्रेरणा का शंखनाद करना है।

यशोधरा गुप्त जी की नारी-भावना का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। भूमिका में गुप्त जी लिखते हैं- भगवान बुद्ध और उनके अमृत तत्त्व की चर्चा तो दूर की बात है, राहुल-जननी के दो-चार आँसू ही इसमें मिल जाएँ तो बहुत समझना। और उनका श्रेय भी साकेत की उर्मिला देवी को है। ...सुगत का गीत तो देश-विदेश के कितने ही कवि-कोविदों ने गाया है, परंतु गर्विणी गोपा की स्वतंत्र सत्ता और महत्ता देखकर मुझे शुद्धोदन के शब्दों में यही कहना पड़ता है किगोपा बिना गौतमी भी ग्राह्य नहीं मुझको।यशोधरा को बिना बताये, सोती छोड़कर सिद्धार्थ गृहत्याग कर सिद्धिलाभ हेतु चले गए। उसे इस बात का गर्व है कि स्वामी सिद्धि- हेतु गये, पर उसे बताये बिना चोरी-चोरी गये, यह व्याघात सालता है। यशोधरा एक उदात्त नारी है, वह अपने पति की साधना के मार्ग में कभी बाधक नहीं बनती। पर उसे वे पहचान नहीं पाए, इस बात का उसे असह्य कष्ट है। सिद्धि प्राप्ति के उपरांत लौटने पर वह उन्हें उपालंभ नहीं देती है। उनका स्वागत करते समय उन्हें उनकी महानता और अपनी तुच्छता का आभास कराके वह वास्तव में त्याग और बलिदान की प्रतिमा बन गई। इसकी चरम परिपूर्ति उन्हें अपने एकमात्र पुत्र राहुल को सौंपने से होती है। उसके नारी हृदय को यह संतोष है कि भिक्षुक बनकर लौटे बुद्धदेव ने स्वयं उसके निकट आकर क्षमायाचना की। बुद्धदेव नारी जाति की शक्ति का वर्णन करते हैं, वे सिद्धि प्राप्ति का श्रेय यशोधरा को देते हैं, जिसके कारण सिद्धि के मार्ग में आए प्रलोभन उन्हें विचलित नहीं कर सके:


“दीन न हो गोपे हीन नहीं नारी कभी,
भूत दया मूर्ति वह मन से, शरीर से,
क्षीण हुआ वन में क्षुधा से विशेष जब,
मुझको बचाया मातृजाति ने ही ख़ीर से”

सन् १९१२ में प्रकाशित भारत-भारती' की रचना तत्कालीन हिन्दी साहित्य में एक बहुत बड़ी कमी को पूरा करने के लिए हुई थी। स्वयं गुप्त जी के शब्दों में- हिन्दी में अभी तक इस ढंग की कोई कविता पुस्तक नहीं लिखी गई जिसमें हमारी प्राचीन उन्नति और अर्वाचीन अवनति का वर्णन भी हो और भविष्यत् के लिए प्रोत्साहन भी। अतीत खण्ड में गुप्त जी ने भारतवर्ष के स्वर्णिम अतीत का गुणगान किया है। भारतवर्ष ऋषियों की भूमि है, जहाँ हिमालय के उत्तुंग शिखर हैं और पावन जलदायिनी गंगा प्रवाहित होती हैं| भारतवर्ष का इतिहास सबसे पुराना है। गुप्त जी अपनी इस मान्यता की पुष्टि के लिए प्रसिद्ध इतिहासकार टाड को उद्धृत करते हैं, जिनके अनुसार- आर्यावर्त के अतिरिक्त और किसी भी देश में सृष्टि के आरम्भ का हिसाब नहीं पाया जाता। इससे आदि सृष्टि यहीं हुई, इसमें संदेह नहीं|”

कवि भारतवासियों की वीरता, आदर्श, विद्या-बुद्धि, कला-कौशल, सभ्यता-संस्कृति, साहित्य-दर्शन एवं आदर्श स्त्री पुरुषों का गुणगान करता है:

“उन पूर्वजों की कीर्ति का वर्णन अतीव अपार है,
गाते नहीं उनके हमीं गुण गा रहा संसार है|”

इसके विपरीत वर्तमान खण्ड में देश की वर्तमान अवनत दशा पर क्षोभ एवं संताप की अभिव्यक्ति है। जहाँ प्राचीन भारत में काव्य, संगीत, कला और दर्शन का उत्कर्ष था, वर्तमान भारत में उन सभी का अपकर्ष कवि की राष्ट्रीयता की भावना को संतप्त करता है। गुप्त जी को इस बात की बहुत ग्लानि थी कि जो आर्य जाति कभी सारे संसार को शिक्षा देती थी वही आज पदपद पर पराया मुँह ताक रही है। देशवासियों को उन्नति और आत्मनिर्भरता की प्रेरणा देने के लिए आवश्यक था कि उन्हें भारत के स्वर्णिम इतिहास और वर्तमान अधोगति से अवगत कराया जाए। कवि ने वर्तमान भारतीय समाज के पतन का चित्रण करके अपनी दुराशा अभिव्यक्त करने वर्तमान स्थिति से बाहर आने के लिए मार्गदर्शन किया है: “हम कौन थे, क्या हो गये और क्या होंगे अभी, आओ विचारें आज मिलकर वे समस्याएँ सभी। नशेबाजी, दम्भ, आलस्य, ईर्ष्या-द्वेष, मालिन्य, मदमोह् आदि से ग्रस्त समाज के प्रति कवि का आक्रोश एवं क्षोभ 'वर्तमान खण्ड' की मुख्य संवेदना है:

“आर्य-संतति आज कैसी अन्ध और अशक्त है,
पानी हुआ क्या अब हमारी नाड़ियों का रक्त है?
संसार में हमने किया बस एक ही यह काम है-
निज पूर्वजों का सब तरह हमने डुबोया नाम है! ...
भारत! तुम्हारा आज यह कैसा भयंकर वेष है?
है और सब नि:शेष केवल नाम ही अब शेष है!...”

वर्तमान भारत के पतन का चित्रण करते समय भी वे राष्ट्रीयता की भावना से प्रेरित हैं। साहित्य, संगीत, धर्म, दर्शन आदि के क्षेत्र में हुई अवनति, युवावर्ग की विलासिता, तीर्थ-स्थलों और मंदिरों की दुर्गति तथा स्त्रियों की दुर्दशा का वर्णन जनमानस को जागृत करके अधोपतन की दशा से निवृत्त कराने के उद्देश्य से किया गया है। अंत में वे तामसिक विचारों में डूबे भारतवासियों को दिशा निर्देश करते हुए उन्हें उद्बोधित करते हैं: अब भी समय है जागने का देख”- में उनकी भविष्य के प्रति आस्था एवं क्या साम्प्रदायिक भेद से है ऐक्य मिट सकता अहो!”- में एकराष्ट्र की परिकल्पना है।

भविष्यत खण्ड के अंतर्गत कवि भारतीय समाज को अपने स्वर्णिम अतीत का स्मरण कराके पुन: उन्नति के मार्ग पर प्रशस्त होने की प्रेरणा देता है। गुप्त जी का आशावादी दर्शन एवं शुभांशसा भगवान भारतवर्ष को फिर पुण्य भूमि बनाइए में निहित है। भारत-भारती' ने हिन्दी-भाषियों में अपनी जाति और देश के प्रति गौरव की भावना जगाई। उनकी इस कृति ने उन्हें राष्ट्रकवि की पदवी से सुशोभित कराया था। भारत-भारती आज भी उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी गुप्त जी के रचनाकाल में थी।

डॉ नगेन्द्र  के अनुसार, गुप्त जी चाहते थे किसाकेतउनकी अंतिम रचना हो। समय-समय पर उसमें परिवर्तन हुए। रचना के मध्य गुप्त जी गंभीर रूप से अस्वस्थ हो गए थे, किन्तु जब वे स्वस्थ हुए तो स्वर्गीय अजमेरी जी और सियारामशरण जी ने साकेत को पूरा करने का आग्रह किया साकेत पंद्रह-सोलह वर्षों में पूरा हुआ। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के उपेक्षिता उर्मिला विषयक लेख से प्रेरित होकर मैथिलीशरण गुप्त ने साकेत की रचना की। उसके पहले टैगोर ने अपनेकाव्य की उपेक्षितानामक आलेख में बँगला साहित्य में रामकथा के अंतर्गत उर्मिला की उपेक्षा पर खेद व्यक्त किया था। राम भक्त गुप्त जी ने वाल्मीकि और तुलसी की परम्परागत कथा में अनेक मौलिक उद्भावनाएँ कीं, जिनमें सबसे प्रधान बात यह है कि साकेत में राम-सीता की कहानी प्रासंगिक और उर्मिला के त्याग की कहानी प्रमुख हो गई। इसका आरम्भ होता है उर्मिला-लक्ष्मण के वाग्विनोद से, जो राम के अभिषेक की सूचना देता है। अभिषेक, कैकेयी-मंथरा-संवाद, विदा-प्रसंग, निषाद-मिलन, दशरथ-मरण, भरत-आगमन, चित्रकूट-मिलाप तक के प्रसंग तो साकेत में दृश्य रूप में प्रस्तुत किए गए हैं, परंतु इसके बाद कवि उर्मिला को छोड़कर राम के साथ नहीं जा सका। आगे की सारी घटनाएँ वशिष्ठ जी अपनी योग दृष्टि से साकेत-वासियों को दिखाते हैं। प्रथम सर्ग में ‘‘कनक लतिका भी कमल सी कोमला’’ नवविवाहिता उर्मिला का परिचय देकर उसके वाग्वैधग्य की झलक लक्ष्मण- उर्मिला संवाद में चित्रित है। इसके उपरांत वियोग का हृदय-विदारक दृश्य आता है। दशरथ ने सत्य का आलम्बन लिया, कौशल्या ने मातृ आदर्श का पालन किया, सुमित्रा ने क्षत्राणी का कर्तव्य पालन किया, सीता ने सोचा, ‘‘स्वर्ग बनेगा अब वन में’’, लक्ष्मण ने भी इस भय से कि ‘‘प्रभुवर बाधा पाएँगे, छोड़ मुझे भी जावेँगे’’ कह दिया, ‘‘रहो रहो हे प्रिये रहो’’, परंतु उर्मिला क्या सोचती? ‘‘वह भी सब कुछ जान गई, विवश भाव से मान गई’’ उसकी मौन विवशता को, जिसे तुलसीदास नहीं देख पाए, गुप्त जी ने सहानुभूति दी और यहीं से उर्मिला की महानता प्रारम्भ होती है। ‘‘हे मन, तू प्रिय-पथ का विघ्न बन’’ में उसका स्वार्थ त्याग भरा हो जाता है। लक्ष्मण अपने भाई के प्रति कर्तव्य पालन कर सकें यही उसकी मनोकामना है चाहे उसे राजमहल में रहकर भी वनवास की यातना सहनी पड़े, ‘‘भ्रातृ-स्नेह सुधा बरसे’’ में उसकी उदात्त भावना व्यक्त है। सीता के शब्दों में ‘‘बहन उर्मिला महाव्रता’’ है, उसके त्याग की महानता को सीता ‘‘सिद्ध करेगी वही यहाँ, जो मैं भी कर सकी कहाँ’’ कहकर स्वीकारती है।

लक्ष्मण के वियोग में उर्मिला अपनी ही छाया भर बन कर रह गई। पति का साथ दे पाने का दु: उसे सालता है, पर उनके भ्रातृ-प्रेम में बाधा नहीं बनना चाहती उसके लिए तो इतना ही पर्याप्त है कि

‘‘आराध्य युग्म के सोने पर
निस्तब्ध निशा के होने पर
तुम याद करोगे मुझे कभी,
तो बस फिर मैं पा चुकी सभी।’’

उर्मिला के चरित्र की गरिमा का उदाहरण, वियोग में भी अधीर होने की जगह परिवार की मंगल कामना करना है। उसे कौशल्या, सुमित्रा आदि माताओं की स्थिति देखकर कष्ट होता है। दशरथ के शब्दों में वह ‘‘रघुकुल की असहाय बहू’’ है। गुप्त जी के अनुसार उसके आँसू कैकेयी पर लगाए कुल-कलंक को भी धोने का सामर्थ्य रखते हैं। उर्मिला स्वप्न में भी लक्ष्मण की तपस्या भंग नहीं करना चाहती। स्वप्न में उसे लौटा देखकर चौंक कर उसे वापस जाने को कहती है। कवि के शब्दों में ‘‘हुआ योग से भी अधिक, उसका विषम वियोग!’’ ऐसी विषम स्थिति में भी उसकी संवेदना अयोध्या की विरहिणी नारियों के प्रति है।

उर्मिला वियोग में भी आशावादी है, प्रिय के लौटने की प्रतीक्षा उसे जीवित रखती है। घर-गृहस्थी के कर्तव्य, ललित कला में रुचि, खेती-बाड़ी आदि सांसारिक दायित्वों का पालन करने के प्रसंग उसके चरित्र की गरिमा को बढ़ाते  हैं। उर्मिला के रूप में कवि ने भारतीय नारी के त्याग, आदर्श और आशावादिता को मूर्त किया है।

मैथिलीशरण गुप्त का हृदय नारी जाति के प्रति सम्मान, करुणा और सहानुभूति से परिपूर्ण था। अपनी रचनाओं में उन्होंने सदियों से उपेक्षित उर्मिला, यशोधरा आदि के चरित्र की उदात्तता चित्रित करके एक नवीन परम्परा का सूत्रपात किया, जिसका उदाहरण साकेत की कैकेयी का चरित्र है। पुत्र-प्रेम से प्रेरित और दासी मंथरा के उकसाने पर वह राम के लिए वनवास और भरत के लिए राज्य अवश्य माँगती है। तुलसी गई गिरा मति फेर कहकर उसके अपराध का मार्जन नहीं करते, किंतु गुप्त जी ने उसे आजन्म विमाता होने का कलंक वहन करने देने की अपेक्षा उसको अपनी कुटिलता का पश्चाताप करने का अवसर दिया।

पंचवटी में अयोध्यावासियों की सभा में तुलसीदास के राम कैकेयी के व्यवहार को ईश्वर-इच्छा मानकर कहते हैं, अम्ब ईस आधीन जब काहु देइय दोषु, किंतु गुप्त जी कैकेयी को पश्चाताप की अग्नि में तपाकर पूरी तरह से दोषमुक्त करते हैं। राम के कथन, हे भरतभद्र, अब कहो अभीप्सित अपना, के उत्तर में भरत अत्यंत दुखी होकर उनसे अयोध्या लौट चलने की विनती करते हैं। भरत इन सबके लिए अपनी माँ को दोष देते हैं,

हा इसी अयश के लिए जनन था मेरा, निज जननी ही के हाथ हनन था मेरा”,

किंतु राम यह कहकर कि जिसे स्वयं जन्म देनेवाली माँ ही समझ पाई उसके हृदय की गहराई को और कौन समझ सकेगा, भरत को सर्वथा निर्दोष मानते हैं। इस प्रसंग में गुप्त जी ने कैकेयी को पश्चाताप का अवसर दिया है। कैकेयी के निष्प्रभ रूप का चित्रण करके कवि उसके प्रति सहानुभूति जगाता है। कैकेयी जो सिंहनी थी, आज गोमुखी गंगा बन गई। वह मानती है कि भरत को जन्म देकर भी वह उसे नहीं जान पाई और यदि

“यह सच है तो फिर लौट चलो घर भैया
अपराधिन मैं हूँ तात, तुम्हारी मैया।”

कैकेयी का स्वयं को राम की मैया कहकर राम के प्रति वात्सल्य भाव की प्रतीति कराना गुप्त जी की नारी भावना से प्रेरित है। कैकेयी आज गंगा के सदृश शांत, शीतल और पावन थी, कह कर गुप्त जी ने उसको पूर्णत: दोषमुक्त कर दिया। राम से घर लौटने का अनुरोध कर वह केवल भरत को ही निर्दोष नहीं ठहराती, बल्कि मंथरा को भी इसका दोष नहीं देती है। वह अपने पहाड़-से बड़े पाप का पूरी तरह से प्रायश्चित करती है। श्रीराम सहित सारे अयोध्यावासी सौ बार धन्य वह एक लाल की माई कहकर उसके अपराध का परिशोधन करते हैं। इस प्रकार कवि ने कैकेयी को दोषमुक्त कर उसके हृदय की पवित्रता को स्थापित करने का सफल प्रयास किया है। डॉ नगेन्द्र  के शब्दों मेंमैथिलीशरण व्यक्ति और कवि की जीवनव्यापी तपस्या का फल अखण्ड रूप में ‘साकेत’ में ही मिलता है। इस कवि ने अपने जीवनभर भारतीय (हिंदूजीवन को देखने और समझने का प्रयत्न किया है – और भारतीय जीवन का इतना भव्य चित्र आधुनिक अन्य किसी कवि में नहीं मिल सकता!” गुप्त जी की रचनाएँ हिन्दी साहित्य की अमूल्य निधि हैं।

जीवन परिचय

नाम

मैथिलीशरण गुप्त

जन्म

अगस्त, सन् १८८६, चिरगाँव, झाँसी, उत्तर प्रदेश

 मृत्यु

१२ दिसंबर, सन् १९६४, चिरगाँव, झाँसी, उत्तर प्रदेश

 पिता

सेठ रामचरण गुप्त

 माता

काशीबाई

भाई

सियारामशरण गुप्त

 गुरु

महावीरप्रसाद द्विवेदी

 कृतियाँ

रंग में भंग (१९०९), जयद्रथ-वध (१९१०), भारत-भारती (१९१२), किसान (१९१७), शकुंतला (१९२३), पंचवटी (१९२५), अनघ (१९२५ ), हिंदू (१९२७), त्रिपथगा (१९२८), शक्ति (१९२८), झंकार (१९२८), गुरुकुल (१९२९), विकटभट (१९२९ ), साकेत (१९३१), यशोधरा (१९३२), द्वापर (१९३६), सिद्धराज (१९३६), नहुष (१९४०), कुणालगीत (१९४२), अर्जन और विसर्जन (१९४२), काबा और कर्बला (१९४२), पृथ्वीपुत्र (१९५०), प्रदक्षिणा (१९५०), जयभारत (१९५२), विष्णुप्रिया (१९५७)

इनके अतिरिक्त यशोधरा में निम्न लिखित कृतियों की सूची है, जिनके रचनाकाल का उल्लेख नहीं है:

उच्छ्वास, लीला, चंद्रहास, तिलोत्तमा, अजित, रत्नावली, वक-संहार, सैरंध्री, किसान, पत्रावली (पत्रशैली में लिखा काव्य), वैतालिक, भूमिभाग, हिडिम्बा, अंजलि और अर्घ्य, राजा-प्रजा, युद्ध, गुरु तेगबहादुर, विश्ववेदना, दिवोदास्। 

 

 

अनुवाद

बँगला भाषा के काव्य-ग्रन्थमेघनाथ बधतथाब्रजांगनाऔर संस्कृत के प्रमुख काव्य-ग्रन्थ स्वप्नवासवदत्तका हिन्दी में अनुवाद।

साहित्य में योगदान

खड़ी बोली हिन्दी को काव्यभाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने और अपने काव्य में राष्ट्रीयता की भावना का संचार करने का श्रेय गुप्त जी को है।

पुरस्कार/सम्मान

सन् १९३६ में उन्हें अभिनन्दन ग्रन्थ भेंट किया गया था। उनकी साहित्य सेवाओं के लिए  आगरा विश्वविद्यालय तथा इलाहाबाद विश्वविद्यालय ने उन्हें डी. लिट. की उपाधि से विभूषित किया। सन् १९५२ में गुप्त जी राज्य सभा के सदस्य मनोनीत हुए और सन् १९५४ में उन्हें 'पद्मभूषण' अलंकार से सम्मानित किया गया। इसके अतिरिक्त उन्हें हिन्दुस्तानी अकादमी पुरस्कार, 'साकेत' पर 'मंगला प्रसाद पारितोषिक' तथा 'साहित्य वाचस्पति' की उपाधि से भी अलंकृत किया गया।


 
































संदर्भ:

  • भारत-भारती – मैथिलीशरण गुप्त
  • साकेत १९०९- मैथिलीशरण गुप्त
  • यशोधरा - मैथिलीशरण गुप्त
  • भारत कोश
  • भारत दर्शन
  • साकेत एक अध्ययन- डॉ. नगेन्द्र

लेखक परिचय:

डॉ अरुणा अजितसरिया एम बी स्वातंत्र्य युग के हिन्दी उपन्यास पर पी एच डी

पेशे से अध्यापन और देश-विदेश के हिंदी, अंग्रेज़ी और फ्रेंच साहित्य के अध्ययन और समीक्षा में रुचि,

सम्प्रति केम्ब्रिज विश्वविद्यालय की अंतरराष्ट्रीय शाखा में हिन्दी की मुख्य परीक्षक और प्रशिक्षक के रूप में कार्यरत।

Monday, August 1, 2022

पुरुषोत्तम दास टंडन : हिंदी को माँ मानने वाले अटल सेवक


पूज्‍य तुम राजर्षि क्‍या ब्रह्मर्षि बहुगुण धाम। 

व्‍यर्थ आज वशिष्‍ठ विश्‍वामित्र के संग्राम।।

बहुत मेरे अर्थ पुरूषोत्‍तम तुम्‍हारा नाम। 

सतत श्रद्धायुक्‍त तुमको शत सहस्र प्रणाम।। (मैथिलिशरण गुप्त)


हिंद देश की भाषा के लिए हिंदी नामकरण के प्रबल पक्षधर, हिंदी में महान शक्ति को देखने वाले महापुरुष, जिनके व्यक्तित्व को गोविंद बल्लभ पंत जी ने भारतीय संस्कृति और सभ्यता का प्रतीक बताया, तो अनंतशयनम अय्यंगर जी ने प्राचीन भारतीय संस्कृति की उस ओजस्विता का प्रतीक, जिसने हर नए को अपनी अजस्र ज्ञान-धारा में समा लेने और उनके परस्पर समन्वय का प्रयास किया है। जिनकी जीवनी को गोपाल प्रसाद व्यास जी ने सामाजिक, सांस्कृतिक एवं भाषायी कार्यकर्ताओं और नेताओं के लिए 'कर्मगीता' बताया, जो सिद्धांतों पर अटल स्तंभ की तरह डटे रहे, जिनका जीवन उनके संपर्क में आने वाले हर व्यक्ति के लिए एक सीख था…। ऐसी विभूति को नमन करना, उनके बारे में कुछ कहना सूर्य को दीपक दिखाने जैसा है।  


पुरुषोत्तम दास टंडन वकील, पत्रकार, भाषा अभियानी, राजनेता, स्वतंत्रता सेनानी थे। उनके जीवन को किसी एक वृत्त में समेट पाना बहुत मुश्किल है। उनके महान व्यक्तित्व और कृतित्व के कारण उन्हें १९४८ में 'राजर्षि' की पदवी से विभूषित किया गया। स्वतंत्रता संग्राम के निर्भय सेनानी और संस्‍कृति के मूलभूत मूल्‍यों में अदम्‍य विश्‍वास रखने वाले इस महर्षि से जब उनके अंतिम कुछ वर्षों में उनकी आत्मकथा बोलकर लिखवाने का आग्रह किया गया तो उन्हें वह प्रस्ताव ज़रा भी न भाया, क्योंकि वे इतने विनयशील थे कि अपने बारे में कुछ कहना उन्हें कभी न रुचा था। वे शांत भाव से अपना अभीष्ट करने में विश्वास रखते थे। हिंदी उनके लिए भाषा नहीं, माँ थी और इस माँ की सेवा में उन्होंने अथक कष्ट झेले किंतु मुख पर कभी न लाए। हिंदी को भारत की राजभाषा के पद पर प्रतिष्ठित करवाने में उनका महत्त्वपूर्ण योगदान रहा। वे हिंदी को देश की आज़ादी के पहले "आज़ादी प्राप्त करने का" और आज़ादी के बाद "आज़ादी को बनाए रखने का" साधन मानते थे। भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में अग्रणी पंक्ति के नेता होने के साथ-साथ पुरुषोत्तम दास जी हिंदी के अनन्य सेवक, कर्मठ पत्रकार, तेजस्वी वक्ता और समाज सुधारक भी थे। उनका मानना था कि राष्ट्र की निर्मिति और उसकी स्थिरता उसकी अपनी संस्कृति और अपने साहित्य के उपादानों से होती है। उनका कार्यक्षेत्र मुख्यतः तीन भागों में बँटा हुआ है, स्वतंत्रता संग्राम, साहित्य और समाज। उनके संघर्ष और त्याग को लक्षित करते हुए श्री किशोरीदास वाजपेयी जी ने लिखा है, "जब जब राष्ट्रीय संघर्ष हुए, टंडन जी सबसे आगे रहे"। 


१ अगस्त १८८२ को उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद नगर में जन्मे पुरुषोत्तम दास टंडन का नाम उनके पुरुषोत्तम मास में जन्म लेने के कारण रखा गया। प्रारंभिक शिक्षा एक मौलवी द्वारा दी गई और आठ वर्ष की आयु में शिवराखन स्कूल में नाम लिखवाया गया। उसके बाद क्रमशः, सरकारी स्कूल, कायस्थ पाठशाला क़ॉलेज तथा म्योर सेंट्रल कॉलेज में और स्थानीय सिटी एंग्लो वर्नाक्यूलर विद्यालय में शिक्षा हुई। वे आरंभ से ही एक मेधावी छात्र रहे और कॉलेज के बाद कानून की डिग्री हासिल की। १९०६ में कानूनी प्रैक्टिस के लिए इलाहाबाद हाई कोर्ट में काम करना शुरु किया। शिक्षा-दीक्षा के बाद वकालत को व्यवसाय के रूप में अपनाने वाले पुरुषोत्तम दास टंडन १८९९ में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ जुड़कर अंग्रेज़ों के खिलाफ़ चलने वाली गतिविधियों में शामिल होने लगे थे। जिसकी वजह से उनकी पढ़ाई भी अवरोधित हुई और उन्हें इलाहबाद के म्योर सेंट्रल कॉलेज से निकाल दिया गया था। हालांकि बाद में उन्होंने अन्य कॉलेज से अपनी पढ़ाई पूरी की और वर्ष १९०६ में वकालत के पेशे में आ गए। पुरुषोत्तम जी बालपन से ही निर्भीक व साहसी थे। दस वर्ष की आयु में चित्रकूट जाने के लिए घर से निकल पड़े थे, किंतु वापस पहुँचा दिए गए।

 

वकालत के साथ-साथ स्वतंत्रता आंदोलन की गतिविधियों में भी सक्रिय रहने वाले राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन ने १० अक्टूबर १९१० को नागरी प्रचारिणी सभा वाराणसी के प्रांगण में हिंदी साहित्य सम्मेलन की स्थापना की। इसी क्रम में १९१८ में उन्होंने 'हिंदी विद्यापीठ' और १९४७ में 'हिंदी रक्षक दल' की स्थापना की। १९१४ में मालवीय जी के कहने पर उन्होंने वकालत का कार्य स्थगित कर नाभा के विदेशमंत्री का पद संभाला लेकिन १९१६ में नाभा महाराज द्वारा हिंदी साहित्य सम्मेलन की बैठक में भाग लेने की अनुमति न दिए जाने के कारण वे त्यागपत्र देकर चले आए, क्योंकि हिंदी से ऊपर उनके लिए कुछ न था। 

 

उनकी सक्रियता को देखते हुए उन्हें १९१९ में जलियाँवाला बाग़ हत्याकांड के अध्ययन के लिए बनी समिति में भी जगह दी गई। इसके बाद १९२१ में महात्मा गांधी के कहने पर राजर्षि टंडन ने वकालत छोड़कर खुद को स्वतंत्रता आंदोलन के कार्य में लगा लिया। वकालत छोड़कर स्वतंत्रता आंदोलन में पूरी तरह से कूदने के बाद पुरुषोत्तम दास टंडन १९३० में महात्मा गांधी द्वारा चलाए जा रहे सविनय अवज्ञा आंदोलन में उत्तर प्रदेश के बस्ती ज़िले से गिरफ्तार कर लिए गए। उन्होंने उत्तर प्रदेश में इस आंदोलन का संचालन बढ़-चढ़कर किया था, जिसके परिणामस्वरूप उन्हें कारावास की सजा मिली। लंदन में महात्मा गांधी की गोलमेज़ बैठक में शामिल होने से पहले भारत में जिन स्वतंत्रता आंदोलन के क्रांतिकारियों को गिरफ्तार किया गया था, उनमें पुरुषोत्तम दास टंडन भी थे।


१९२३ में जेल से छूटने पर उन्होंने परिवार के भरण-पोषण के लिए पंजाब नैशनल बैंक में मंत्री का पद संभाला।

टंडन जी ने ग्वालियर के विक्टोरिया कॉलेज में हिंदी के लेक्चरर के रूप में कार्य किया। उस समय अटल बिहारी वाजपेयी विक्टोरिया कॉलेज के छात्र हुआ करते थे। टंडन जी कहते थे कि हिंदी साहित्य के प्रति मेरे (उसी) प्रेम ने उसकी रक्षा और उसके विकास के पथ को स्पष्ट करने के लिए मुझे राजनीति में सम्मिलित होने को बाध्य किया।  

राजर्षि पुरुषोत्तमदास टंडन हिंदी के प्रबल पक्षधर थे। वे हिंदी में भारत की मिट्टी की सुगंध महसूस करते थे। हिंदी साहित्य सम्मेलन के इंदौर अधिवेशन में स्पष्ट घोषणा की गई कि अब से राजकीय सभाओं, कांग्रेस की प्रांतीय सभाओं और अन्य सम्मेलनों में अंग्रेजी का एक शब्द भी सुनाई न पड़े।

भारतवर्ष में स्वतंत्रता के पूर्व से ही सांप्रदायिकता की समस्या अपने विकट रूप में विद्यमान रही। टंडन जी ने अछूतोद्धार के लिए बढ़-चढ़कर कार्य किया।

साहित्य में रुचि

राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन जी साहित्य पठन में रुचि रखते थे। वे अंग्रेज़ी साहित्य का भी विशद ज्ञान रखते थे। वे स्वयं एक उच्चकोटि के रचनाकार थे। उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व का आकलन करते समय प्रायः उनके साहित्यकार रूप को अनदेखा कर दिया जाता है। उनकी रचनाओं में तत्कालीन इतिहास की खोज की जा सकती है। साहित्यकार के रूप में टंडन जी निबंधकार, कवि और पत्रकार के रूप में दिखलाई पड़ते हैं। उनके निबंध हिंदी भाषा और साहित्य, धर्म और संस्कृति तथा अन्य विविध क्षेत्रों से संबंधित हैं।

भाषा और साहित्य संबंधी निबंधों में कविता, दर्शन और साहित्य, हिंदी साहित्य का कानन, हिंदी राष्ट्रभाषा क्यों, मातृभाषा की महत्ता, भाषा का सवाल, गौरवशाली हिंदी, हिंदी की शक्ति, कवि और दार्शनिक आदि विशेष उल्लेखनीय हैं। धर्म और संस्कृति संबंधी निबंधों में भारतीय संस्कृति और कुंभमेला, भारतीय संस्कृति संदेश तथा अन्य निबंधों में लोककल्याणकारी राज्य, धन और उसका उपयोग, स्वामी विवेकानंद और सरदार वल्लभ भाई पटेल आदि अति महत्वपूर्ण हैं।


काव्य रचनाओं में 'बंदर सभा महाकाव्य', 'कुटीर का पुष्प' और 'स्वतंत्रता' अपना ऐतिहासिक महत्व रखती हैं। इन कविताओं में राष्ट्रीयता और देशभक्ति की प्रमुखता है। उनकी रचनाओं में काव्यशास्त्र की बारीकियाँ नहीं मिलेंगी लेकिन युगीन यथार्थ की अभिव्यक्ति टंडन जी ने जिस ढंग से की है, वह निश्चय ही श्लाघनीय है,


एक एक के गुण नहिं देखें, ज्ञानवान का नहिं आदर,

लड़ैं कटैं धन पृथ्वी छीनैं जीव सतावैं लेवैं कर।

भई दशा भारत की कैसी चहूँ ओर विपदा फैली,

तिमिर आन घोर है छाया स्वारथ साधन की शैली॥

अपनी अपनी चाल ढाल को सब कोऊ धर-धर छप्पर पर,

चले लुढ़कते बुरी प्रथा पर जिसका कहीं पैर नहिं सिर।

धनी दीन को दुख अति देवैं, हमदर्दी का काम नहीं,

धन मदिरा गनिका में फूँकै करैं भला कुछ काम नहीं।


'बंदर सभा महाकाव्य' में आल्हा शैली में अंग्रेज़ों की नीतियों का भंडाफोड़ किया है। 

हियाँ की बातें हियनै रह गईं, अब आगे के सुनौ हवाल,
गढ़ बंदर के देश बीच माँ पड़ा रहा एक खेत विशाल!

सौ जोजन लंबा अरु चौड़ा, अरबन बानर जाय समाय,
तामें बानर भये इकट्ठा जौन बचे वे आवैं धाय!

जब सगिरा मैदनवा भरिगा, पूछें टोपी लगीं दिखाय,
सबके सब कुरसिन से उछले, हाथ-पाँव से ताल बजाय!

इतने माँ मल्लू-सा आए, बंदरी और मुसाहिब साथ,
बंदरी बड़ी चटक-चमकीली, थामे मल्लू-सा को हाथ!

ओढ़े गउन लगाए टोपी, हीरे जड़े पांत के पांत,
मटकत आवत, भाव दिखावत, आखिर मेहरारू की जात! 


उन्होंने अंग्रेज़ों के प्रति चुटकियाँ भी खूब ली हैं, यथा-


कबहूँ आँख दाँत दिखलावैं, लें डराय बस काम निकाल।

कबहूँ नम होय सीख सुनावैं, रचैं बात कै जाल कराल॥

ऐसे वैसे तो डर जावैं या फँस जावैं हमारे जाल।

जौने तनिक अकड़ने वाले तिनके लिए अनेकन चाल॥


पत्रकारिता के क्षेत्र में टंडन जी अंग्रेज़ी के भी उद्भट विद्वान थे। श्री त्रिभुवन नारायण सिंह जी ने उल्लेख किया है कि सन १९५० में जब वे कांग्रेस के सभापति चुने गए तो उन्होंने अपना अभिभाषण हिंदी में लिखा और अंग्रेज़ी अनुवाद मैंने किया। श्री सम्पूर्णानंद जी ने भी उस अंग्रेज़ी अनुवाद को देखा, लेकिन जब टंडन जी ने उस अनुवाद को पढ़ा, तो उसमें कई पन्नों को फिर से लिखा। तब मुझे इस बात की अनुभूति हुई कि जहाँ वे हिंदी के प्रकांड विद्वान थे, वहीं अंग्रेज़ी साहित्य पर भी उनका बड़ा अधिकार था।


टंडन जी सादगी और सरलता की मिसाल थे और अपनी बहुत सादे कुरते-धोती वाली वेशभूषा से ही उनकी पहचान थी, पर बहुतों को शायद पता न हो कि कॉलेज के दिनों में वे  एक बहुत अच्छे खिलाड़ी और अपनी क्रिकेट टीम के कप्तान थे। इसी तरह टंडन जी हिंदी के अनन्य भक्त होने के साथ ही फ़ारसी के बहुत अच्छे विद्वान थे। 

वर्ष १९६१ में हिंदी भाषा को देश में अग्रणी स्थान दिलाने में अहम भूमिका निभाने के लिए उन्हें देश का सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार दिया गया। २३ अप्रैल १९६१ को उन्हें भारत सरकार द्वारा 'भारत रत्न' की उपाधि से विभूषित किया गया। प्रयागराज में उनके नाम पर एक विश्वविद्यालय भी खुला है।

राष्ट्रभाषा हिंदी के लिए समर्पित पुरुषोत्तम दास टंडन जी का निधन १ जुलाई १९६२ को हुआ। हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने वाले राजर्षि पुरूषोत्तम दास टंडन के हम सदैव ऋणी रहेंगे। देह रूप में टंडन जी हमारे बीच नहीं है लेकिन एक हिंदी प्रेमी, प्रखर वक्ता, विचारशील पत्रकार, साहित्यकार व समाज सुधारक के उत्साह से भरे विचार के रूप में वे सदा मानव जाति को प्रोत्साहित करते रहेंगे। आत्मा अजर अमर अविनाशी है। महान आत्मा टंडन जी के सम्मान में महान कवि सुमित्रानंदन पंत की एक कविता है,

जीना अपने ही में एक महान कर्म है, जीने का हो सदुपयोग यह मनुज धर्म है।

अपने ही में रहना एक प्रबुद्ध कला है, जग के हित रहने में सबका सहज भला है।

जग का प्यार मिले जन्मों के पुण्य चाहिए, जग जीवन को प्रेम सिंधु में डूबना चाहिए।

ज्ञानी बनकर मत नीरस उपदेश दीजिए, लोक कर्म भव सत्य प्रथम सत्कर्म कीजिए।


पुरुषोत्तम दास टंडन : जीवन परिचय

जन्म

१ अगस्त १८८२, प्रयागराज, उत्तर प्रदेश, भारत

निधन

१ जुलाई १९६२

पिता

सालिगराम टंडन

माता

शरणप्यारी

शिक्षा

वकालत की डिग्री

व्यवसाय

राजनेता, स्वतंत्रता सेनानी

राजनैतिक पार्टी

भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस

साहित्यिक रचनाएँ

निबंध

  • कविता, दर्शन और साहित्य

  • हिंदी साहित्य का कानन

  • हिंदी राष्ट्रभाषा क्यों

  • मातृभाषा की महत्ता

  • भाषा का सवाल

  • गौरवशाली हिंदी

  • हिंदी की शक्ति

  • कवि और दार्शनिक


धर्म व संस्कृति संबंधी

  • भारतीय संस्कृति और कुंभमेला

  • भारतीय संस्कृति संदेश


अन्य निबंध

  • लोककल्याणकारी राज्य, धन और उसका उपयोग

  • स्वामी विवेकानंद 

  • सरदार वल्लभ भाई पटेल

काव्य

  • बंदर सभा महाकाव्य

  • कुटीर का पुष्प

  • स्वतंत्रता

पुरस्कार

  • भारतरत्न १९६१

  • डाक टिकट  

संदर्भ

लेखक परिचय


भावना सक्सैना 

लेखिका, अनुवादक, पूर्व राजनयिक। 

संप्रति - भारत सरकार के राजभाषा विभाग में कार्यरत हैं।  

ईमेल - bhawnasaxena@hotmail.com

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