Thursday, July 21, 2022

उमा शंकर जोशी : गुजराती साहित्य के आधुनिक प्रणेता

 उमाशंकर जोशी

कितना सुखद एवं रोमांचक प्रसंग है- एक सत्रह वर्ष का बालक अपने कुछ दोस्तों के साथ आबू पर्वत पर घूमने जाता है। वहाँ पर्वत की चोटी पर बसी सुरम्य नक्की झील में शरद पूर्णिमा के चाँद के प्रफुल्ल आलोक से विस्मित उसके मन में कविता के उद्गार अंकुरित होते हैं, जो कि एक छंद रचना 'नखी सरोवर उपर शरत पूर्णिमा' के शीर्षक से गुजरात कॉलेज की पत्रिका में प्रकाशित होते हैं। धीरे-धीरे यह अंकुरण एक विशाल वृक्ष का रूप ले लेता है; जिसमें हिंदी, संस्कृत, गुजराती और अंग्रेजी साहित्य पोषित होता है। यह विशाल वृक्ष और कोई नहीं गुजराती साहित्य के मूर्धन्य साहित्यकार श्री उमा शंकर जोशी जी हैं।  


उमा शंकर का जन्म उत्तर गुजरात के सुंदर बामणा गाँव में २१ जुलाई १९११ को श्री जेठालाल कमल जी और श्रीमती नवलबाई जी के घर में हुआ था। ग्रामीण पृष्ठभूमि, प्रकृति के स्नेहासिक्त आँचल तथा परिवार के गहन प्यार ने कवि हृदय को पोषित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी प्रारंभिक शिक्षा गाँव के विद्यालय से हुई, आगे की पढ़ाई के लिए अहमदाबाद चले गए और हाईस्कूल की परीक्षा प्रथम स्थान से उत्तीर्ण की। इसके पश्चात उन्होंने गुजरात कॅालेज में प्रवेश लिया, लेकिन १९३० में बीच में ही पढ़ाई छोड़कर गाँधी जी के सत्याग्रह आंदोलन में कूद पड़े। उन्होंने १९३४ में अेलफिन्सटन कॉलेज में प्रवेश लिया और वहीं से १९३६ में अर्थशास्त्र व इतिहास विषयों के साथ बी० ए० ऑनर्स किया तथा १९३८ में गुजराती मुख्य विषय के साथ एम० ए० प्रथम श्रेणी में पास किया। 

अपने अथक परिश्रम और लगन से उन्होंने शिक्षण और साहित्यिक संस्थानों में उच्च पद प्राप्त किया। नौकरी की शुरुआत १९३७ में गोकलीबाई हाई स्कूल, मुंबई में एक शिक्षक के रूप में हुई। बाद में मुंबई के सिडेनहैम कॉलेज ऑफ कॉमर्स में अंशकालिक व्याख्याता और १९३९ में उन्हें गुजरात विद्यासभा में स्नातकोत्तर अनुसंधान अध्ययन विभाग में प्रोफेसर के रूप में नियुक्त किया गया। सन १९४६ में उन्होंने स्वेच्छा से गुजरात विद्यासभा से सेवानिवृत्ति ले ली। उन्होंने 'संस्कृति' नामक मासिक पत्रिका की शुरुआत की और इस पत्रिका को १९८४ तक चलाना जारी रखा। उन्होंने अपनी पत्नी (ज्योत्स्ना जोशी) के साथ मिलकर 'गंगोत्री ट्रस्ट' भी शुरू किया। मुंबई राज्य सरकार ने उन्हें १९४८ में गुजराती पाठ्यपुस्तक समिति के सदस्य के रूप में नियुक्त किया। सन १९५३ में उन्होंने लोकभारती शिक्षण संस्था जो सनोसरा, भावनगर जिले में एक शैक्षणिक संस्थान था, में एक अतिथि संकाय के रूप में कार्य किया। मार्च १९५४ में उमा शंकर जोशी को साहित्य अकादमी की स्थापना से ही सामान्य परिषद और कार्यकारी समिति के सदस्य के रूप चयनित किया गया था। उन्हें  गुजरात विश्वविद्यालय में गुजराती साहित्य के प्रोफेसर तथा स्कूल ऑफ लैंग्वेजेज का प्रमुख भी नियुक्त किया गया। नवंबर १९६६ में वे गुजरात विश्वविद्यालय के कुलपति पद पर आसीन हुए और १९७२ तक इस पद पर कार्यरत रहते हुए सेवानिवृत्त हुए। सन १९७० में उन्हें राज्यसभा के लिए मनोनीत किया गया। सन १९७६ में ज्ञानपीठ पुरस्कार समिति और १९७८ में साहित्य अकादमी के अध्यक्ष बने। १९७८ से १९८३ तक साहित्य अकादमी के अध्यक्ष के पद पर बने रहे। फेफड़ों के कैंसर के कारण १९ दिसंबर १९८८ को ७७ वर्ष की आयु में मुंबई में उनका निधन हो गया। 


उमा शंकर जी के महान व्यक्तित्त्व और विस्तृत कृतित्त्व को महज कुछ शब्दों में पिरोना आसान नहीं है, कुछ मनके तो रह कर इधर-उधर बिखर ही जाऐंगे। वे एक साधारण, ऊर्जावान, ईमानदार, चिंतक, स्वाभिमानी तथा बहुमुखी प्रतिभा के धनी व्यक्ति थे। साथ ही एक स्पष्ट वक्ता के रूप में अपनी बात को सीधे साफ शब्दों में कहना उनकी विशेषता थी। उनके वक्तव्यों से विधानसभा में खलबली मच जाया करती थी। सन १९७५ में जब देश में आपातकाल लगाया गया, ज्यादातर साहित्यकार चुप थे, लेकिन उमा शंकर जी उसके विरुद्ध मुखर थे और व्यावहारिक लड़ाई लड़ रहे थे। 


उमा शंकर जी को गुजराती साहित्य का आधुनिक प्रणेता कहा जाता है। उन्होंने हिंदी, गुजराती, संस्कृत और अंग्रेजी में काव्य रचना की है। वे एक साहित्यकार के साथ-साथ एक भाषाविद, शिक्षक और स्वतंत्रतता सेनानी भी थे। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। कई बार जेल यात्राएँ भी की। गुलामी की वेदना उनकी कविताओं में स्पष्ट झलकती है। वे लिखते हैं, 

हूँ गुलाम

सृष्टि बागनु अमूल फूल मानवी गुलाम?

(मै गुलाम? सृष्टि के अमूल्य उपवन का पुष्प मानव गुलाम?)


नवंबर १९३० में ब्रिटिश सरकार ने उन्हें अन्य सत्याग्रहियों के साथ गिरफ्तार कर लिया। वे लिखते हैं, "उस समय केवल राष्ट्रीयता का आकर्षण था? या राष्ट्रीय लड़ाई के नेपथ्य में रही किसी व्यापक भावना का भी आकर्षण था? सन १९३० में जेल में एक अनुभव हुआ। आबू पर प्राप्त अनुभव जिस तरह काव्य की दीक्षा देने वाला था, यह जीवन समग्र की दीक्षा में प्रेरित करने वाला था।" शुरू में उन्हें साबरमती जेल में और बाद में यरवदा टेंट-जेल में कैद किया गया। अंततः गांधी-इरविन समझौते के तहत उन्हें १९३१ में हजारों राजनीतिक कैदियों के साथ रिहा कर दिया गया। कारावास में उनको समाजवाद और मार्क्सवाद का अध्ययन करने का अवसर मिला। जेल में रहते हुए ही उन्होंने अपने पहले काव्य 'विश्व शांति' की रचना की। वे गांधी जी के जीवन और संदेश से काफी प्रभावित थे, और 'विश्व शांति' गांधी जी के संदेश और जीवन कार्य को संदर्भित करती है। साबरमती जेल में उन्होंने श्री शंकर दीक्षित की खगोलशास्त्र की मराठी पुस्तक 'ज्योति विलास' का अनुवाद पढ़ा। वहीं जेल में हुई एक अप्रत्याशित घटना से उनके मन में एक नाटक लिखने का विचार जाग्रत हुआ। उस नाटक में नक्षत्र ग्रह पात्रों के रूप में थे। स्वयं काल भी एक पात्र था। वे लिखते हैं, "उस समय मैं ऐसा नाटक लिखने की स्थिति में बिल्कुल नहीं था, और उस नाटक के कुछ ही अंश लिख पाया, लेकिन इसका फायदा यह हुआ की मुझे नाटक लिखने की, कवि बनने की तैयारी कर रहा हूँ, ऐसा भाव अनुगामी वर्षों में सतत बना रहा।" १९३०-३४ के बीच स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेते हुए उन्होंने गुजराती में कई कविताएँ, नाटक, लेख, उपन्यास और कहानियाँ लिखीं। इस अवधि के दौरान, उनके जेल साथी एक और समकालीन गुजराती कवि त्रिभुवनदास लुहार 'सुंदरम' थे। दोनों एक ही कॉपी बुक में राष्ट्र-भक्ति से ओत-प्रोत कविताएँ लिखा करते। सुंदरम का उल्लेख करते हुए वे लिखते हैं, "हम जुड़वाँ भाई हैं। हमारे रचनात्मक आग्रह की पूर्ति में, गुजराती भाषा ने शायद हमें इसकी जानकारी के बिना हमें इसकी जड़ में एक साथ बाँधने की साजिश रची है।" 


उमा शंकर जी ने शिक्षा और साहित्य में अच्छा सामंजस्य स्थापित किया। गुजराती में नई कविता का उदय उमा शंकर जी की गंगोत्री, काव्य वर्षा आदि काव्य-संग्रहों से होता है। उन्होंने साहित्य को तो समृद्ध किया ही, साथ में युवाओं को भी लेखन के क्षेत्र में आने के लिए प्रेरित किया। वे शिक्षा और संस्कृति को साथ लेकर चलते थे। गुजरात विद्यापीठ के कुलपति रहते हुए उन्होंने आकाशवाणी के पाक्षिक पत्र में लिखा है, "अगर इंसान को विकृति के मार्ग से बचना है तो उसे हमेशा संस्कृति के मार्ग पर चलना होगा। उनके अनुसार संस्कृति के पाँच अंग हैं और पाँचवाँ व मुख्य अंग है भाषा। मनुष्य जन्म लेते ही भाषा से अवगत होता है और भाषा आज तक के सांस्कृतिक विरासत के ख़ज़ाने की चाबी है।" वे संस्कृति के विकास में विज्ञान के योगदान को भी महत्त्व देते थे।  

उमा शंकर जी छायावादी काव्यधारा से बहुत प्रभावित थे। प्रादेशिकता का  प्रभाव उनकी कविता में अक्सर देखने को मिलता है। हालांकि उन्होंने संस्कृत और अंग्रेजी में भी काव्य रचना की है, लेकिन उनका मानना था कि कविता एक ऐसी विधा है जिसमें भाषा अपना सर्वस्व रखती है तथा कविता तो मनुष्य अपनी मातृभाषा में ही लिखता है, उसी में आनंद भी है। वे कहते थे, "मैं गुजराती भाषा में लिखने वाला भारतीय लेखक हूँ।" उनकी कविताओं में मानवतावाद, सौंदर्य और प्रकृति-प्रेम का विशेष चित्रण है। मानवीय जीवन की पीड़ा अक्सर उनके लेखन में दिखाई देती है।

रामजी, क्यों रोटी महँगी?

रक्त मांस इतने सस्ते?


अपनी भावना प्रधान कविता में उन्होंने कल्पना को इस प्रकार संयोजित किया है कि विचार मानव-जीवन के लिए ठोस आधार के रूप में प्रस्तुत हो पाने में समर्थ सिद्ध हुए हैं,

कल्पना के रसायनों को पी

बीज गल गया नि:शेष;

शब्द के अंकुर फूटे,

पल्लव-पुष्पों से नमित हुआ विशेष। 


(कल्पना के रसायनों को पीकर बीज गल गया है, नि:शेष शब्द में अंकुर फूटे, पल्लव पुण्यों से नमित हुआ) उमा शंकर बेहद संवेदनशील कवि हैं। उनकी संवेदनशीलता बार-बार उनकी कविताओं में उद्धृत होती है, फिर वह हिंदुस्तान-पाकिस्तान विभाजन का नरसंहार हो, हीरोशिमा-नागासाकी की तबाही का मंजर या फिर गांधी जी की हत्या। द्वितीय विश्व युद्ध  के बाद हीरोशिमा और नागासाकी में हुए अमानवीय कृत्य से कवि ह्रदय अछूता न रह सका। वे लिखते हैं,

हीरोशीमा …… नागासाकी

कहो कुछ है बाक़ी

भले ही अमानुषता की मनुष्य ने दिखाई सीमा

नागासाकी…… हीरोशीमा 

अंत में मनुष्य के आगे अमानुषता ही थकी

हीरोशीमा……. नागासाकी 

नागासाकी की घटना पर एक और कुठाराघात 

मनुष्य की आत्मा पर फफोले

खपरैल पर उभर आए बुलबुले 

नागासाकी में।


पंद्रह अगस्त १९४७ को अंग्रेजों की गुलामी से देश को आज़ादी तो मिली, लेकिन साथ ही साथ बहुत गहरे घाव भी मिले। विभाजन के भीषण नरसंहार से दु:खी होकर उन्होंने स्वाधीनता की देवी को संबोधित करते हुए कहा था,

क्या हम तुम्हारी ही बाट जोह रहे थे देवी?

जिस दिन का हम इंतजार कर रहे थे

वह तुम हो? आओ।

जिसकी उषा का आँचल दुग्ध धवल शहीदों-सा

पवित्र रक्त से हुआ रंजित, वह तुम हो? आओ।

उदित हुए तुम निष्प्रभ चाहे आज

मेघाच्छन्न नभ में,

पुरुषार्थ के प्रखर प्रताप से मध्याह्न तुम्हारा दीप्त हो,

भव्य तपोदीप्त।


उमा शंकर जी को भारतीय परंपरा, धर्म और ग्रंथों का विशेष ज्ञान था। उन्होंने अभिज्ञान शाकुंतलम और उत्तर रामचरित मानस का गुजराती में अनुवाद भी किया है। उन्होंने कर्ण पर केंद्रित कर्ण-कृष्ण संवाद काव्य की रचना की है। कर्ण के दुखद और संघर्षमय जीवन के लिए उनके दिल में वेदना और संवेदना है। उन्होंने महाप्रस्थान, युधिष्ठिर और अर्जुन, उर्वशी नाटक भी लिखे हैं। "नरक का अस्तित्त्व है, यह बात मेरे स्वर्ग-सुख के मिथ्या को हमेशा के लिए खत्म कर देती है।" इस एक वाक्य में उमा शंकर ने युधिष्ठिर के पूरे व्यक्तित्त्व को समेट दिया है। ललित निबंध के क्षेत्र में उन्होंने उत्कृष्ट कार्य किया है। उनके निबंध लेखन की विशेषता है कि वे किसी भी विषय को सहजता से गद्य में परिवर्तित कर लेते हैं। मित्रतानि, पडोशिओ और वार्तालाप उनके प्रमुख ललित निबंध हैं। अंत में निशीथ की कुछ पंक्तियाँ,

हे निशीथ, हे शान्तमना तपस्वी!

तजकर अविश्रान्त विराट ताण्डव

बैठ जाता है तू कभी आसन लगा

हिमाद्रि-सी दृढ़ पालती जमाकर।

धू-धू जलती धूनी उत्क्रान्ति की

दिगन्त में उड़ते उडु-स्फुलिंग

वहाँ निगूढ़ अमा-तमान्तर में

करता तू गहन सृष्टि-रहस्य-चिन्तन।

और जैसे ही हम मानव, जलाकर मन्द दीप

निकलते हैं निरखने तुझे

देखकर जृं भाविकसित चंडमुख तेरा

दृगों से घेर लेते हैं अपनी नन्हीं-सी गृहदीपिका को

और करते हैं प्रयत्न भूल जाने का

व्योम में खिला तेरा रुद्र रूप!


उमा शंकर जोशी : जीवन परिचय

उपनाम

वासुकी

जन्म

२१ जुलाई १९११, बामणा गाँव, जिला- साबरकांठा, उत्तर गुजरात 

निधन

१९ दिसंबर सन १९८८, मुंबई

पिता

श्री जेठालाल कमल 

माता

श्रीमती नवलबाई  

पत्नी

श्रीमती ज्योत्स्ना जोशी

शिक्षा व कार्यक्षेत्र

चौथी तक

बामणा गाँव, साबरकांठा, गुजरात

हाईस्कूल

ईंडर छात्रावास, अहमदाबाद, गुजरात (१९३०)

स्नातक

अर्थशास्त्र व इतिहास, अेलफिन्सटन कॉलेज (१९३६)

स्नातकोत्तर

संस्कृत व गुजराती- मुंबई विश्वविद्यालय (१९३८)

साहित्यिक रचनाएँ

काव्य-संग्रह

  • विश्व शांति (६ खंडों में)

  • निशीथ

  • आतिथ्य

  • महाप्रस्थान

  • गंगोत्री

  • प्राचीना

  • वसंत वर्षा

एकांकी

  • अभिज्ञा 

कहानी

  • सापनाभरा

  • शहीद

निबंध

  • पारंकाजण्या

उपन्यास

  • श्रावणी मेणो

  • विसामो 

संपादन

  • गोष्ठी

  • उघाड़ीबारी

  • क्लांतकवि

  • म्हारासॉनेट

  • स्वप्नप्रयाण

यात्रावृत्तांत

  • ईशान भारत अने अंदमानमाँ टहूँक्या मोर

अनुवाद

  • अभिज्ञानशाकुंतलम्

  • उत्तर रामचरितम्

सम्मान व पुरस्कार

  • रंजीतराम सुवर्ण चंद्रक पुरस्कार – १९३६ (गंगोत्री के लिए)

  • नर्मद सुवर्ण चंद्रक पुरस्कार – १९४३

  • मडीहा पुरस्कार - १९४४ (प्राचीना के लिए)

  • उमा-स्नेह्रश्मी पुरस्कार- १९६३ -६४ -६५

  • भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार- १९६८ (निशीथ के लिए)

  • सोवियत भूमि नेहरू पुरस्कार– १९७३

  • साहित्य अकादमी पुरस्कार (गुजराती)- १९७३ (कविनी श्रद्धा)

  • विश्व गुर्जरी गौरव पुरस्कार - १९८१

  • अनेक विश्वविद्यालयों से डी० लिट० की मानद उपाधियाँ


संदर्भ

  • अनोखा गुजराती कवि -उमा शंकर जोशी- डॉ० लता सुमन्त
  • रणवीर रंगा, २००८। भारत के प्रमुख साहित्यकारों से अंतरंग बातचीत।

लेखक परिचय

डॉनीरू भट्ट


शिक्षा- पीएचडी (पशु पोषण) और इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स में पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा

संप्रति- केनेडियन जर्नल ऑफ़ क्लीनिकल न्यूट्रिशन की मैनेजिंग एडिटर

कार्यानुभव- भारतीय पशु चिकित्सा अनुसन्धान संस्थान, बरेली, ओमान फ्लौर मिल्स और सुल्तान क़ाबूस यूनिवर्सिटी, सल्तनत ऑफ़ ओमान में विभिन्न पदों पर काम किया।

प्रकाशन- २५ रिसर्च और रिव्यु लेख विभिन्न राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय जर्नल में तथा सात पुस्तक अध्याय प्रकाशित हुए हैं। इनकी नेग्लेक्टेड वाइल्ड फ़्लोरा ऑफ़ उत्तराखंड नामक पुस्तक प्रकाशित हुई है। हिंदी कविताओं और कहानियों क़े पॉंच साझा संग्रह भी प्रकाशित हो चुके हैं।

2 comments:

  1. नीरू जी, उमाशंकरजी की सौम्य तस्वीर से शुरू हुआ आलेख उनकी ज़िन्दगी और कामों की जो तस्वीर मन में उभारता गया, वह भी उतनी ही सौम्य बनी। आपको इस उत्तम लेख के लिए आभार और बधाई

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  2. डॉ. नीरू जी नमस्ते। आपने उमाशंकर जी पर अच्छा लेख लिखा। मेरे लिए तो बिल्कुल नई जानकारी थी। आपको इस जानकारी पूर्ण लेख के लिए हार्दिक बधाई।

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