Saturday, November 27, 2021

साहित्य जगत का मील का पत्थर: हरिवंश राय बच्चन


हरिवंश राय बच्चन २० वीं सदी के सर्वाधिक प्रशंसित हिन्दी-भाषी कवियों में से एक हैं। १९३५ में प्रकाशित हुई उनकी लंबी कविता “मधुशाला” से वे साहित्य जगत पर छा गए| मधुशाला ने उन्हें प्रशंसकों की एक बड़ी फौज दी और इस संख्या में आज भी दिन-प्रतिदिन इजाफा हो रहा है| दिल को छू लेने वाली उनकी काव्यशैली वर्तमान समय में भी हर उम्र के लोगों पर अपना प्रभाव छोड़ती है। डॉ. हरिवंश राय बच्चन का हिन्दी साहित्य में अविस्मरणीय योगदान रहा है| आइए, इस कुशल साहित्यकार एवं कवि के जीवन के कुछ दिलचस्प पहलुओं को जानने का प्रयास करें|

पृष्ठभूमि:

मिट्टी का तन, मस्ती का मन

क्षणभर जीवन मेरा परिचय

‘मधुशाला' की इन पंक्तियों में खुद को समा देने वाले हिन्दी के महान कवि और लेखक हरिवंश राय बच्चन का जन्म इलाहाबाद के कायस्थ परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम प्रताप नारायण श्रीवास्तव तथा माता का नाम सरस्वती देवी था। इनको बाल्यकाल में प्यार से बच्चन कहा जाता था जिसका अर्थ होता है बच्चा। बाद में इसी नाम से वे और उनका परिवार मशहूर हुए। साल १९२६ में १९ वर्ष की उम्र में उनका विवाह श्यामा बच्चन से हुआ, जो उस समय १४ साल की थीं। लेकिन १९३६ में ही  टी.बी की बीमारी के कारण श्यामा जी की मृत्यु हो गई| इस घटना ने उनके ह्रदय पर गहरा आघात किया और इससे उबरने में उन्हें काफी समय लग गया। १९३९ में लिखी उनकी रचना ‘एकांत संगीत’ उसी दुःख और अकेलेपन को झलकाती है।  

५ साल बाद १९४१ में उन्होंने तेजी सूरी से विवाह किया जो रंगमंच तथा गायन से जुड़ी थीं। तेजी बच्चन से हरिवंश राय के दो पुत्र हुए - अमिताभ बच्चन और अजिताभ बच्चन| आगे चलकर अमिताभ बच्चन फ़िल्म अभिनेता बने और अपने पिता के संमान ही प्रसिद्धि अर्जित की| वहीँ अजिताभ ने सामान्य पारिवारिक जीवन चुना और अपने व्यवसाय में सफलता अर्जित की|  

साहित्यिक सफ़र:

बच्चन जी की कविताएँ और रचनाऍं एक ऐतिहासिक मिसाल हैं| उनके काव्य की गहराई, सच्चाई और वास्तविकता ही उनकी असली धरोहर है और यही उनकी लोकप्रियता का प्रमुख कारण भी है। हरिवंश राय बच्चन जी उत्तर छायावादी युग के आस्थावादी कवि हैं। उनकी कविताओं में मानवीय भावना की सहज और स्वाभाविक अभिव्यक्ति हुई है। डॉ. नागेंद्र ने "बच्चन जी" की काव्यगत विशेषताओं पर प्रकाश डालते हुए लिखा है, ‘'जीवन की मौलिक भावनाओं का व्यक्तिगत रूप में प्रबल संवेदन करते हुए उन्हीं के अनुरूप प्रकृति अथवा जीवन के सरल एवं व्यापक तत्त्व का साधारणीकरण करना बच्चन की मुख्य विशेषता है।” 

बच्चन जी को ख्याति १९३५ में प्रकाश में आए लोकप्रिय संग्रह ‘मधुशाला’ से मिली। उसके बाद १९३६ में बच्चन का कविता संग्रह ‘मधुबाला’ और १९३७ में ‘मधुकलश’ आया।  ये रचनाएँ भी खूब प्रसिद्ध हुईं। निशा निमंत्रण, एकांत संगीत, आकुल अंतर और सतरंगिनी उनके प्रसिद्ध रचना संग्रह हैं।  उनकी रचना ‘दो चट्टानें’ को १९६८ में हिन्दी कविता का साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था। उसी साल उनको ‘सोवियत भूमि नेहरू पुरस्कार’ और ‘एफ्रो-एशियाई सम्मेलन’ के ‘कमल पुरस्कार’ से भी नवाज़ा गया था। साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में योगदान के लिए बच्चनजी को १९७६  में ‘पद्म भूषण’ से सम्मानित किया गया। 

‘क्या भूलूँ क्या याद करूँ’ हरिवंश राय बच्चन की बहुप्रशंसित आत्मकथा तथा हिन्दी साहित्य की एक कालजयी कृति है। यह चार खण्डों में हैः 'क्या भूलूँ क्या याद करूँ', ‘नीड़ का निर्माण फिर', 'बसेरे से दूर' और 'दशद्वार से सोपान तक'। इसके लिए बच्चनजी को १९९१ में भारतीय साहित्य के सर्वोच्च पुरस्कार 'सरस्वती सम्मान' से सम्मानित किया गया था।  हिन्दी प्रकाशनों में इस आत्मकथा का अत्यंत ऊँचा  स्थान है।

डॉ॰ धर्मवीर भारती ने इसे हिन्दी के हज़ार वर्षों के इतिहास में ऐसी पहली घटना बताया जब अपने बारे में किसी ने सब कुछ इतनी बेबाकी, साहस और सद्भावना से कह दिया हो। 

डॉ॰ हज़ारीप्रसाद द्विवेदी के अनुसार इसमें केवल बच्चन जी का परिवार और उनका व्यक्तित्व ही नहीं उभरा है, बल्कि उनके साथ समूचा काल और क्षेत्र भी अधिक गहरे रंगों में उभरा है। डॉ॰ शिवमंगल सिंह सुमन की राय में ऐसी अभिव्यक्तियाँ नई पीढ़ी के लिए पाठेय बन सकेंगी, इसी में उनकी सार्थकता भी है।

कविता ‘आत्म परिचय’ में बच्चन जी ने अपने स्वभाव एवं व्यक्तित्व के बारे में बताया है,

मैं जग जीवन का भार लिए फिरता हूँ

फिर भी जीवन में प्यार लिए फिरता हूँ


इसी प्रकार "एक गीत" के शीर्ष गीत में श्री हरिवंश राय बच्चन ने अपने जीवन के अकेलेपन की कुंठा को अभिव्यक्त किया है। 

हरिवंश राय बच्चन पर अनेक पुस्तकें लिखी गई हैं। इनमें उन पर हुए शोध, आलोचना एवं रचनावली शामिल हैं। बच्चन रचनावली के ग्यारह खंड है जिसका संपादन अजित कुमार ने किया है। अन्य उल्लेखनीय पुस्तकें हैं- 'हरिवंश राय बच्चन' (बिशन टंडन) 'गुरुवर बच्चन से दूर' (अजित कुमार)। 

अकोला, महाराष्ट्र के प्रसिद्ध लेखक व शिक्षक डॉ.रामप्रकाश वर्मा ने श्री हरिवंशराय बच्चन पर लिखे अपने संस्मरण 'क्या-क्या याद करुँ' में बच्चन जी पर किए गए शोध के बारे में विस्तार से बताया कि किस प्रकार बच्चन जी ने स्वयं बड़ी आत्मीयता व अपनेपन से उनके शोधकार्य में उनका मार्गदर्शन किया था। वर्मा जी ने उसमें यह भी लिखा है कि बच्चन जी के बँगले 'प्रतीक्षा' के लॉन में एक हनुमान जी का मंदिर है और घर की यह प्रथा है कि कोई भी सदस्य घर से बाहर जाते समय हनुमान जी को प्रणाम अवश्य करता है।

विश्व साहित्य और बच्चन

हरिवंश राय बच्चन का विदेशी साहित्य से गहरा सम्बन्ध था।  उन्होंने अपनी पीएचडी अँग्रेज़ी साहित्य के विख्यात कवि डब्ल्यू० बी० यीट्स की कविताओं पर की थी| उन्होंने उमर ख़य्याम की कृतियों को ‘खय्याम की मधुशाला’ और ‘उमर ख़य्याम की रुबाइयाँ’ पुस्तकों के ज़रिये हिन्दी पाठकों तक पहुँचाया था| साथ ही अँग्रेज़ी की कई और कृतियों से हिन्दी भाषियों को रूबरू करवाया था। उन्होंने ६४ रूसी कविताओं का अनुवाद अंग्रेजी से हिन्दी में किया था और १९६५ में इन कविताओं की पुस्तक ‘चौंसठ रूसी कविताएँ’ प्रकाशित हुई थी। इस पुस्तक के माध्यम से पूश्किन, ब्लोक और मयकोवस्की जैसे महान कवियों की रचनाएँ भारतीय पाठकों तक हिन्दी में पहुँची थीं। इस सराहनीय कार्य के लिए १९६८ में उन्हें सोवियत भूमि नेहरू पुरस्कार से नवाज़ा गया था।  

रूस में बच्चन जी हमेशा लोकप्रिय रहे और वे कई बार यहाँ आधिकारिक दौरों पर बुलाए गए। रूस के प्रसिद्ध कवि, भारतविद अलेक्सांदर सिन्केविच, ने कई हिन्दी कवियों की रचनाओं का अनुवाद किया है। हिन्दी कवियों पर सिन्केविच जी ने अपना काम हरिवंशराय बच्चन की रचनाओं से शुरू किया था। उनकी किताब रूसी में थी जिसका अनुवाद प्रो० वरयाम सिंह ने किया है - बच्चन एक व्याख्या।  

हरिवंश राय बच्चन का व्यक्तित्व और कृतित्व ऐसा था कि उन्हें वैश्विक नागरिक की संज्ञा आसानी से दी जा सकती है। साहित्य अध्ययन और व्यक्तित्व के निर्माण के बीच अटूट सम्बन्ध होता है। विभिन्न समाजों  की संवेदनाओं, भावनाओं और सोच का उत्कृष्ट दर्पण साहित्य ही होता है। बच्चन जी की शख़्सियत अलग-अलग भाषाओं के साहित्य-अध्ययन से तो निखरी ही, साथ ही उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से उसे हिन्दी प्रेमियों तक पहुँचाकर उनके जीवन को भी समृद्ध किया।

कुछ रोचक पहलू:

हरिवंश राय बच्चन ने महू और सागर में फ़ौजी प्रशिक्षण लिया था और लेफ्टिनेंट बन कर कंधे पर दो सितारे लगाने का अधिकार भी पाया था। बच्चन जी ने कुछ समय के लिए ऑल इंडिया रेडियो के इलाहाबाद केंद्र में भी काम किया था। आज भी न केवल हिन्दी साहित्य में, अपितु समग्र विश्व के अव्वल, लोकप्रिय और महान कवियों में बच्चन जी का स्थान सुरक्षित है।

18 जनवरी 2003 को 95 साल की उम्र में हिन्दी कविता का यह सूर्य अस्ताचल को पा गया किन्तु अपनी कविताओं के प्रकाश से सम्पूर्ण जगत को उदीयमान करता गया| उनकी कविताएँ आज भी साहित्य प्रेमियों के दिलों में धड़कन बनकर ज़िंदा है|  

हरिवंश राय बच्चन: जीवन परिचय

जन्म

२७  नवम्बर १९०७, इलाहाबाद, भारत 

मृत्यु 

१८ जनवरी २००३ 

मुम्बई, महाराष्ट्र, भारत

व्यवसाय 

कवि, लेखक, प्राध्यापक 

भाषा 

अवधी, हिंदी, उर्दू  

शिक्षा एवं शोध

एम. ए. 

इलाहाबाद विश्वविद्यालय

पीएच.डी.

सेन्ट कैथेराइन कॉलेज, कैम्ब्रिज

साहित्यिक रचनाएँ

मुख्य रचनाएँ (काव्य) 

मधुशाला, मधुबाला, मधुकलश 

निशा निमंत्रण, एकांत संगीत, आकुल अंतर और सतरंगिनी

मुख्य रचनाएं (गद्य) 

आत्मकथा: क्या भूलूँ क्या याद करूँ

नीड़ का निर्माण फिर 

बसेरे से दूर 

दशद्वार से सोपान तक 

पुरस्कार व सम्मान

साहित्य अकादमी पुरस्कार-१९६८  दो चट्टानें (हिन्दी कविता)

सोवियत भूमि नेहरू पुरस्कार-१९६८     चौंसठ रूसी  कविताएँ 

एफ्रो एशियाई सम्मेलन का कमल पुरस्कार-१९६८ 

पद्म भूषण-१९७६    साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में योगदान

बिड़ला फाउंडेशन सरस्वती सम्मान-१९९१       आत्मकथा 


 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 





लेखक परिचय

रश्मि बंसल झवर- विगत १५ वर्षों से हिन्दी अध्यापन में कार्यरत, लेखन व पठन में गहन रुचि। विविध अख़बारों व पत्रिकाओं में समय-समय पर लेख तथा कविताएँ प्रकाशित होती रहती हैं। हिन्दी भाषा की बहुत बड़ी प्रशंसक।

ईमेल: rashmizawar74 @gmail.com

Mobile no. 9588440759



Friday, November 26, 2021

आधुनिकता और दर्शन के अनूठे हस्ताक्षर - कैलाश वाजपेयी

 


कोलाहल इतना मलिन
दुःख कुछ इतना संगीन हो चुका है
मन होता है
सारा विषपान कर
चुप चला जाऊँ
ध्रुव एकान्त में

सही नहीं जाती
पृथ्वी-भर मासूम बच्चों
माँओं की बेकल चीख़।
सारे के सारे रास्ते
सिर्फ़ दूरियों के मानचित्र थे
रहा भूगोल
उसका अपना ही पुश्तैनी फ़रेब है

·         ‘भविष्य घट रहा है’ से

कैलाश वाजपेयी हिन्दी साहित्य के ऐसे दार्शनिक हस्ताक्षर थे जिनकी स्याही में आधुनिकता का गहरा रंग था। आधुनिक सूफ़ी कवि कहलाने वाले कैलाश जी गहन (इंटेंस) व्यक्तित्व के मालिक थे। अपने विशद अध्ययन और विदेश यात्राओं के फलस्वरूप भारतीय दर्शन और पाश्चात्य साहित्य का उन पर मिला-जुला असर रहा। उनकी कविताएँ देश-दुनिया के समकालीन यथार्थ से अनुप्राणित रहीं। वैसे तो कैलाश जी सीधे अकविता आंदोलन से नहीं जुड़े, परन्तु अकविता के भाषाई ढाँचे की बुनावट काफी हद तक कैलाश वाजपेयी की कविताओं से प्रेरित है।

ढीली सी कमीज़, तिरछी टोपी लगाए, थोड़ा देवानंद की तरह लगते, कैलाश वाजपेयी कभी अपने समय से आगे की बातें करते, और कभी भारतीय स्वर्णिम अतीत के ज्ञान को खोजने और उसे वर्तमान से जोड़ने की कोशिश में लग जाते! कैलाश जी संगीत, धर्म, दर्शन, मनोविज्ञान, ज्योतिष, तंत्र और क्वांटम भौतिकी जैसे गूढ़ विषयों में रुचि रखते थे। कई भाषाएँ जानने के साथ-साथ वे पद्य और गद्य पर सामान अधिकार रखते। इसलिए कॉलम लेखक और समीक्षक की तरह सदैव उनकी बड़ी पूछ रही। ‘धर्मयुग’ जैसी पत्रिकाओं में उनके लेखों की याद बहुतों को होगी। वे अंतरराष्ट्रीय मंच पर काव्य पाठ के लिए आमंत्रित होने वाले प्रमुख कवि में से थे। उनकी रचनाओं का अंग्रेजी, स्पेनिश, जर्मन में अनुवाद हुआ। एक समय था कि वे दूरदर्शन के अधिकांश साहित्यिक कार्यक्रमों के केंद्र में हुआ करते थे। अपनी विवादास्पद ‘राजधानी’ कविता पर दिल्ली के कोपभाजन बनने वाले कवि की दिल्ली के शीर्ष तक की यह रचना-यात्रा उनकी तरह ही अनूठी है - उत्तरोत्तर उर्ध्व होती हुई!

 उनकी एक कविता जो बहुत समय से कवि के नाम बिन मेरे साथ रही:


“अगर तुम्हें गर्भ में पता चलता,
जिस घर में तुम होने वाले हो
नमाज़ नहीं पढ़ता वहाँ कोई
यज्ञ होम कीर्तन नहीं होता
कोई नहीं जाता रविवार को
गिरिजाघर या ग्रंथपाठ में
…
अगर तुम्हें यह पता चलता
तब तुम क्या करते
क्या माँ बदलते?”

ऐसे अनूठे, भीड़ से इतर प्रश्न करने वाले कवि कैलाश जी का जन्म ११ नवंबर १९३६ को हमीरपुर, उत्तर प्रदेश में हुआ। कविता और संगीत का शौक उन्हें बचपन से ही था। शुरूआती दौर में गीत लिखने और बढ़िया आवाज़ में गाने वाले कैलाश जी धीरे-धीरे छंद मुक्त कविताओं की तरफ बढ़ते चले गए। उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से पीएच.डी. की उपाधि हासिल की और फिर टाईम्स ऑफ इंडिया मुंबई में नौकरी शुरु की। बाद में शिवाजी व हस्तिनापुर कॉलेज दिल्ली में अध्यापन करते हुए वे  रीड़र पद से सेवानिवृत्त हुए थे। उनकी जीवन यात्रा के सामानांतर उनकी साहित्यिक यात्रा चलती रही जिसमें प्रेम, परंपरा, राजनीतिक व्यवस्था, रहस्यवाद, और आध्यात्म के महत्वपूर्ण पड़ाव थे। उन पर दर्शन, सूफ़ीवाद, रहस्यवाद, जैन और बौद्ध धर्म का गहरा प्रभाव था, जो उनके हिंदी और अंग्रेजी लेखन में छलकता है। 

छात्रावस्था से ही उनका बच्चन जी से नाता था। “रिमेम्बेरिंग बच्चन” में कैलाश जी लिखते हैं कि १९५५ में जब बच्चन जी प्रयाग विश्वविद्यालय में पढ़ाते थे, उस समय कैलाश जी एक छात्र थे। उनकी एक लोकप्रिय कविता पर बच्चन जी ने उनको बहुत सराहा। यह सिलसिला ३२ सालों तक अनवरत चला। जब कैलाश जी ने परिवार की नाराज़गी के बावज़ूद एक सिख लड़की, रूपा, से शादी का निश्चय किया तो परिवार की अनुपस्थिति के मध्य, बच्चन जी उनके साथ खड़े रहे। लेखकीय जगत में एक सुन्दर प्रतिमान स्थापित करते हुए रूपा और कैलाश जी की गृहस्थी सुख-सौहार्द्य से जीवन-पर्यन्त चलती रही। १९७२ में जन्मीं उनकी बेटी अनन्या आज एक सफल साहित्यकार और अकादमिक हैं। 

१९६४ में कैलाश वाजपेयी का पहला कविता संग्रह ‘संक्रांत’ आया। केवल २८ वर्ष की अवस्था में वे अलग तेवर वाले गीतकार के रुप में चर्चित हो गए। उसके बाद १९६८ में प्रकाशित संग्रह 'देहांत से हटकर' में अपने समय, समाज, राजनीति और व्यवस्था से नाराज़गी और विरक्ति की कविताएँ छपीं, जो आधुनिक जीवन के मोहभंग की कहानी कहती हैं। 

चूंकि कविता का धर्म ही अवज्ञा है चाहे वह सविनय हो या अविनय, तो चलिए देखते हैं उनकी ‘राजधानी’ कविता की व्यवस्था पर ज़बरदस्त चोट करती इन पंक्तियों को :


“सिल की तरह गिरी स्वतंत्रता, और पिचक गया है पूरा देश”

“चरित्र-रिक्त शासक
और संक्रामक सेठों की सड़ांध से भरी
इस नगरी में मैं जी रहा हूँ
जी रहा हूँ जीवन की व्याकृति
झूठे नारों और खुशहाल सपनों से लदी
बैलगाड़ियां वर्षों से
‘जनपथ’ पर आ-जा रही हैं…”

इस कविता पर संसद में हंगामा हुआ और कई सदस्यों द्वारा प्रतिबन्ध लगाने की माँग की गई। 

१९७० में छपे ‘महास्वप्न का मध्यांतर’ में कैलाश वाजपेयी का नया रूप सामने आया - यह आपातकाल की निःशब्द पीड़ा को आख्यायित करता, ठहराव, जगत दृष्टि एवं आत्म-मंथन से लैस सघन कविताओं का संग्रह था। इसी दशक में कैलाश जी आकाशवाणी की तरफ से रूस और यूरोप की लम्बी यात्रा पर गए। फ़्रांस में वे बहुत से साहित्यकारों से मिले, जिसमें ज्यां पॉल सात्र, और आयरिश नोबल विजेता सैम्युल बेक्केट प्रमुख हैं। उस समय ‘आस्तित्ववाद’ और ‘नया वामपंथ’ ज़ोर पर था। कैलाश जी अपने समकालीन निर्मल वर्मा और गुरु अज्ञेय की तरह, इस नई दुनिया के बारे में खुले विचार रखते। विदेश यात्राओं में विदेशी लेखकों और विचारकों के साथ रवींद्रनाथ टैगोर की चर्चा एक कॉमन ग्राउंड की तरह उभर कर आती रहती। १९७३-७७ तक वे मेक्सिको और अमरीका में विज़िटिंग प्रोफेसर की तरह रहे। अपने विदेशी प्रवास से लौट कर कैलाश जी का मन भारतीय दर्शन की तरफ झुक गया जो उनके लेखन में बखूबी प्रतिबिंबित हुआ। स्वामी विवेकानंद के जीवनवृत्त  पर लिखा उनका नाटक 'युवा संन्यासी' बहुत प्रचलित हुआ। कैलाश जी ने अनेक कवियों, चिंतकों - कबीर, हरिदास, सूरदास, जे. कृष्णमूर्ति, रामकृष्ण परमहंस और बुद्ध के जीवन दर्शन पर दूरदर्शन के लिए वृत्तचित्र बनाए। 

 २००८ में भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित उनकी किताब ‘अनहद’ में वैदिक से लेकर आधुनिक ज्ञान तक की अतुलनीय और व्यापक ज्ञानराशी पर व्ययाख्यात्मक निबंध और लेख संकलित हैं।  २००९ में कैलाश जी के जीवन का वह महत्वपूर्ण बिंदु आया जब ‘हवा में हस्ताक्षर' कविता संग्रह के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। कैलाश वाजपेयी की कविताएँ एक तरफ़ भारत के सत्तावर्ग से मोहभंग की देन हैं तो दूसरी तरफ़ विश्वस्तर पर पूंजी के बढ़ते दबदबे व मनुष्य के नितांत अकेलेपन की पीड़ा से जन्मी हैं। वे सार्वभौमिक मानवीय दुविधाओं के गायक थे, उनकी कविताएँ सार्वकालिक हैं। 

दूरदर्शन के एक साक्षातकार में सुधीश पचौरी से उन्होंने कहा: “साहित्य से आम आदमी कहीं ज़रूर दूर चला गया है, जिसका कारण कहीं न कहीं आज की आर्थिक व्यवस्था, आज की राजनितिक प्रणाली, आज की सत्ता - इन सब से जुड़ा है। “पोएट्री मैक्स नथिंग हैपन” जिसने लिखा है वह सही कहा है।”

कैलाशजी अपने साक्षात्कारों में ऐसा कुछ कह जाते थे कि सालों बाद भी लगता मानो विश्वव्यापी दृष्टि रखने वाले व्यक्ति की तरह वे भविष्य की दस्तक पहचानते थे। उनको यह भी दुःख था कि मूल अनुभव से रुख़ फेर कर लोग कविताओं से कविता बना रहे हैं! वे कहते थे, “पहले जो आदमी के अंदर कविता की थोड़ी बहुत प्यास थी, वह नई कौम के लिए पॉप संगीत से पूरी हो जाती है!” 

वाजपेयीजी के साहित्य मित्र कवि श्रीराम वर्मा का कहना था, ‘कैलाश वाजपेयी की कविताएँ खौलते पानी में ताजे कमल जैसी है।'  

मौत से उनकी कविता का गहरा नाता था। लेखन और आवाजहियों में अंत तक सक्रिय वह अप्रतिम कलम-दल १ अप्रैल २०१५ को हृदयगति रुक जाने से एक अंतहीन नदी में उतर गया। उस समय उनका परिवार उनके साथ था। उनका अंतिम संस्कार उनकी पुत्री अनन्या ने किया। प्रयाग में संगम पर उनके विसर्जन को याद करते हुए अनन्या लिखती हैं, “...पिता का सिखाया हुआ शब्द ‘प्रवाह’ याद आ गया। पानी का प्रवाह, जीवन, समय और अविरल ‘फ्लक्स’ का प्रवाह जसके हम बने हुए हैं, जिसमें वास करते हैं और विलीन होते जाते हैं।”  कैलाश जी की कविता कहती है:

 

“आँख भी न बंद हो
और ये दुनिया ओझल हो जाये
कुछ ऐसी तरकीब करना
डूबना तो तय है इसलिए, नाव नहीं
नदी पर भरोसा करना!”

एक कवि और विचारक, एक मंत्रमुग्ध कर देने वाली आवाज के साथ एक करिश्माई व्यक्तित्व, कविता और साहित्य से लेकर रुचियों के एक विशाल और विविध स्पेक्ट्रम - यह है कैलाश वाजपेयीजी का हवा में अमिट हस्ताक्षर!  

डॉ. कैलाश वाजपेयी: जीवन परिचय

जन्म

११ नवम्बर १९३६, हमीरपुर उत्तर प्रदेश

पुण्यतिथि 

१ अप्रेल २०१५, दिल्ली 

पत्नी 

रूपा वाजपेयी, अंग्रेजी साहित्य की प्रॉफेसर 

पुत्री 

अनन्या वाजपेयी, अंग्रेजी लेखिका और साहित्यकार 

कर्मभूमि

·         रीडर, शिवाजी कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय 

·         विज़िटिंग प्रोफ़ेसर, एल कालेजियो द मौख़िको,मेक्सिको, १९७३-७६

·         एडजंक्ट प्रोफ़ेसर, डैलस विश्वविद्यालय, अमरीका -१९७६ -७७ 

·         सदस्य, हिन्दी सलाहकार समिति - भारतीय दूरदर्शन

शिक्षा एवं शोध

एम. ए. 

लखनऊ विश्वविद्यालय से एम.ए.

पीएच.डी.

हिन्दी साहित्य, लखनऊ विश्वविद्यालय, 

शोध: आधुनिक हिन्दी-कविता में शिल्प (१९६३)

साहित्यिक रचनाएँ

कविता संग्रह   

·         संक्रांत, १९६४

·         देहान्त से हटकर, १९६८

·         तीसरा अँधेरा, १९७२ 

·         महास्वप्न का मध्यान्तर, १९८०

·         सूफ़ीनामा, १९९२

·         पृथ्वी का कृष्णपक्ष, (प्रबंध  काव्य) १९९५

·         An Anthology of Modern Hindi Poetry, 1998

·         हवा में हस्ताक्षर, २००५

·         मॉस्को में दिल्ली के दिन (कविता संकलन रूसी भाषा में)

दर्शन, नाटक निबंध, गद्य 

·         शब्द संसार, २००६

·         अनहद, २००७

·         युवा संन्यासी, विवेकानन्द, १९९१ (नाटक )

·         और कुछ दीखै 

·         The Science of Mantras: A manual for Peace & Prosperity 1981

·         Astrological Combinations, 1985

पुरस्कार व सम्मान

·         १९९५ हिंदी अकादमी सम्‍मान 

·         २००० एसएस मिलेनियम अवॉर्ड

·         २००२ व्यास सम्मान - पृथ्वी का कृष्ण पक्ष 

·         २००५ में ह्यूमन केयर ट्रस्ट अर्वाड

·         २००९ साहित्य अकादमी पुरस्कार - हवा में हस्ताक्षर

 सन्दर्भ: 

 लेखक परिचय: 

शार्दुला नोगजा सुपरिचित हिंदी कवयित्री हैं और हिंदी के प्रचार-प्रसार में संलग्न हैं। पेशे से वे तेल एवं ऊर्जा सलाहकार हैं और २००५ से सिंगापुर में कार्यरत हैं। उनकी संस्था ‘कविताई-सिंगापुर’, भारत और सिंगापुर के काव्य स्वरों को जोड़ती और मजबूत करती है। शार्दुला साहित्यकार-तिथिवार परियोजना का नेतृत्व और प्रबंधन कर रही हैं। 

shardula.nogaja@gmail.com 

 

 

 

पूनम मिश्रा:

स्नातक (बायोकेमिस्ट्री), स्नातकोत्तर (पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन), नागपुर विद्यापीठ

हिन्दी व अंग्रेजी अखबार में पत्रकारिता का १५ वर्ष का अनुभव

कृतियां: कैकेयी (पद्य); गीली माटी (काव्य संग्रह साझा); ओ चिरैय्या (काव्य संग्रह)

हाइबुन संग्रह (एकल), अनेक अखबारों में लघुकथा व कविताएँ प्रकाशित।

 

आलेख पढ़ने के लिए चित्र पर क्लिक करें।

कलेंडर जनवरी

Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat
            1वह आदमी उतर गया हृदय में मनुष्य की तरह - विनोद कुमार शुक्ल
2अंतः जगत के शब्द-शिल्पी : जैनेंद्र कुमार 3हिंदी साहित्य के सूर्य - सूरदास 4“कल जिस राह चलेगा जग मैं उसका पहला प्रात हूँ” - गोपालदास नीरज 5काशीनाथ सिंह : काशी का अस्सी या अस्सी का काशी 6पौराणिकता के आधुनिक चितेरे : नरेंद्र कोहली 7समाज की विडंबनाओं का साहित्यकार : उदय प्रकाश 8भारतीय कथा साहित्य का जगमगाता नक्षत्र : आशापूर्णा देवी
9ऐतिहासिक कथाओं के चितेरे लेखक - श्री वृंदावनलाल वर्मा 10आलोचना के लोचन – मधुरेश 11आधुनिक खड़ीबोली के प्रथम कवि और प्रवर्तक : पं० श्रीधर पाठक 12यथार्थवाद के अविस्मरणीय हस्ताक्षर : दूधनाथ सिंह 13बहुत नाम हैं, एक शमशेर भी है 14एक लहर, एक चट्टान, एक आंदोलन : महाश्वेता देवी 15सामाजिक सरोकारों का शायर - कैफ़ी आज़मी
16अभी मृत्यु से दाँव लगाकर समय जीत जाने का क्षण है - अशोक वाजपेयी 17लेखन सम्राट : रांगेय राघव 18हिंदी बालसाहित्य के लोकप्रिय कवि निरंकार देव सेवक 19कोश कला के आचार्य - रामचंद्र वर्मा 20अल्फ़ाज़ के तानों-बानों से ख़्वाब बुनने वाला फ़नकार: जावेद अख़्तर 21हिंदी साहित्य के पितामह - आचार्य शिवपूजन सहाय 22आदि गुरु शंकराचार्य - केरल की कलाड़ी से केदार तक
23हिंदी साहित्य के गौरव स्तंभ : पं० लोचन प्रसाद पांडेय 24हिंदी के देवव्रत - आचार्य चंद्रबलि पांडेय 25काल चिंतन के चिंतक - राजेंद्र अवस्थी 26डाकू से कविवर बनने की अद्भुत गाथा : आदिकवि वाल्मीकि 27कमलेश्वर : हिंदी  साहित्य के दमकते सितारे  28डॉ० विद्यानिवास मिश्र-एक साहित्यिक युग पुरुष 29ममता कालिया : एक साँस में लिखने की आदत!
30साहित्य के अमर दीपस्तंभ : श्री जयशंकर प्रसाद 31ग्रामीण संस्कृति के चितेरे अद्भुत कहानीकार : मिथिलेश्वर          

आचार्य नरेंद्रदेव : भारत में समाजवाद के पितामह

"समाजवाद का सवाल केवल रोटी का सवाल नहीं है। समाजवाद मानव स्वतंत्रता की कुंजी है। समाजवाद ही एक सुखी समाज में संपूर्ण स्वतंत्र मनुष्यत्व...