Monday, December 27, 2021

उर्दू अदब को नए अफ़्कार, अंदाज़ और आयाम देने वाला अज़ीम शायर: मिर्ज़ा ग़ालिब


ये मसाईल-ए-तसव्वुफ़ ये तिरा बयान ‘ग़ालिब’ 
तुझे हम वली समझते जो न बादा-ख़्वार होता 

‘ग़ालिब’ ने इन दो मिसरों में अपना पूरा परिचय दे दिया है, अपनी क़लम और सूफ़ीयाना ख़यालात की बदौलत वे महात्मा का दर्ज़ा पाने की क़ुव्वत रखते हैं, लेकिन अफ़सोस, ये बुरी आदतें! ‘ग़ालिब’ बहुत ही व्यापक और गहरी दृष्टि रखते थे, उनकी शायरी को परत दर परत समझने की कोशिशें होती रहती हैं। शायरी की चर्चा होते ही ख़ास-ओ-आम की ज़ुबाँ पर पहला नाम उन्हीं का आता है।
'ग़ालिब' का तख़ल्लुस रखने वाला शख़्स, बहादुरशाह ज़फर से मिले ख़िताब ‘मिर्ज़ा नौशा’ से मिर्ज़ा 'ग़ालिब' हुआ और इसी नाम से लोगों के दिलों पर राज करता है। 'ग़ालिब' का अर्थ होता है विजेता, यानी शायर को अपनी सुख़नगोई और कलम पर ऐसा विश्वास था कि उस सा कहनेवाला, लिखनेवाला दूसरा न ही है और न होगा-

हैं और भी दुनिया में सुख़न-वर बहुत अच्छे 
कहते हैं कि 'ग़ालिब' का है अंदाज़-ए-बयाँ और

दिल्ली शहर में ५० से ज़्यादा साल ज़िंदगी गुज़ारने के बावजूद भी किराए के मकानों में रहने वाले 'ग़ालिब' हमेशा बल्ली-मारान की गलियों में ही रहे, गुलज़ार साहब ने अपनी नज़्म में उनके पते और उस माहौल को बख़ूबी बयाँ किया है, जिसकी फ़िज़ाओं में उर्दू के अज़ीम शायर ‘ग़ालिब’ ने साँसें लीं। 

बल्ली-मारां के मोहल्ले की वो पेचीदा दलीलों की सी गलियाँ
सामने टाल की नुक्कड़ पे बटेरों के क़सीदे…. 
इसी बे-नूर अँधेरी सी गली-क़ासिम से
एक तरतीब चराग़ों की शुरूअ' होती है
एक क़ुरआन-ए-सुख़न का सफ़हा खुलता है
असदुल्लाह ख़ाँ 'ग़ालिब' का पता मिलता है
-गुलज़ार 

'ग़ालिब' का जन्म २७ दिसंबर १७९७ को आगरा में हुआ था। उनका नाम था असदुल्लाह ख़ान। मुग़ल साम्राज्य के उरूज के दिनों उनके दादा समरकंद से भारत आये थे। मिर्ज़ा अब्दुल्ला ख़ान  'ग़ालिब' के पिता थे, उन्होंने पहले लखनऊ के नवाब और बाद में हैदराबाद के निज़ाम के यहाँ काम किया। 'ग़ालिब' जब पाँच साल के थे, उनके सिर से पिता का साया उठ गया और १८०६ तक वे चाचा नसरुल्लाह ख़ान की सरपरस्ती में रहे। चाचा के गुज़र जाने के बाद उनकी परवरिश ननिहाल में हुई। तेरह साल की उम्र में उनकी शादी लोहारू और फ़िरोज़पुर के पहले नवाब की भतीजी उमराव बेगम से  हो गई। उसके बाद  वे मुग़ल राजधानी दिल्ली आ गए थे और इस फ़ानी दुनिया से विदा लेने तक अधिकांश समय वहीं रहे। 
'ग़ालिब' एक ऐसे वक़्त दिल्ली में थे, जब मुग़लिया सल्तनत अपनी आख़िरी साँसें ले रही थी और ब्रिटिश हुकूमत अपने पाँव हिंदुस्तान में मज़बूती से गाड़ रही थी। देश में बदलाव के समय की चेतना उनकी रचनाओं में झलकती है। उर्दू अदब तब अपने यौवन पर था, मोहम्मद इब्राहीम ‘ज़ौक़’, दाग़ ‘देहलवी’ और मोमिन ख़ान ‘मोमिन’ बादशाह के दरबार में काम करते हुए उम्दा शायरी लिख रहे थे। १८३७ में जब ‘ज़ौक़’ को दरबारी शायर बनाया गया, तो 'ग़ालिब' थोड़ा निराश ज़रूर हुए, लेकिन उनकी हाज़िर जवाबी और मज़ाकिया अंदाज़ में कोई कमी नहीं आई। एक बार जब ‘ज़ौक़’ रास्ते से गुज़र रहे थे, तो 'ग़ालिब' ने तंज़ में कहा-

हुआ है शह का मुसाहिब फिरे है इतराता

‘ज़ौक़’ इस वाक़ये से आहत हुए और बादशाह से शिकायत कर दी। 'ग़ालिब' दरबार में जब जवाब-तलब किए गए, तो तुरंत इस सानी मिसरे को जोड़ कर शेर पूरा कर दिया-

हुआ है शह का मुसाहिब फिरे है इतराता
वगरना शहर में 'ग़ालिब' की आबरू क्या है

शेर क्या दरबार में खड़े-खड़े पूरी ग़ज़ल कह डाली। इस चुस्त-दिमाग़ी के बाद वे दरबार के हर मुशायरे में बुलाए जाने लगे। ‘ज़ौक़’ की मृत्यु के बाद ‘ग़ालिब’ को राजकवि बनाया गया, जिस पद पर वे १८५७ के संग्राम तक बने रहे। 
पहले स्वतंत्रता संग्राम से पूरे मुल्क की तरह 'ग़ालिब' भी बहुत मुतासिर हुए। वह उनके और दिल्ली के लिए एक नया मोड़ लाया था। उन्होंने उन दिनों की बदहाली और मंज़रे ख़राब का ब्यौरा फ़ारसी में लिखी अपनी डायरी ‘दस्तंबू’ में किया है। यह डायरी उन दिनों का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ मानी जाती है।
‘ग़ालिब’ ने ग्यारह साल की उम्र में पहली शायरी लिखी।  ईरान से आए एक पर्यटक अब्दुस्समाद ने 'ग़ालिब' को फ़ारसी, अरबी, फ़लसफ़े और तर्क-शास्त्र की तालीम दी। उन्नीस का होने तक वे रहस्यवाद और सूफ़ीवाद में डूबे गूढ़ विषयों पर ऐसी शायरी करने लगे थे, जो लोगों की समझ में नहीं आती थी। 'ग़ालिब' से पहले उर्दू शायरी का दायरा काफ़ी संकरा था, उसमें गुल-बुलबुल और हुस्न-ओ-इश्क़ की बातें ही हुआ करती थीं, 'ग़ालिब' उसे शायरी की तंग गली कहते थे। 'ग़ालिब' ने उर्दू -फ़ारसी  शायरी को नए अफ़्कार, बिंब और प्रतीक के रूप में एक नया धरातल देकर उर्दू शायरी को नए आयाम दिए।

बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया मिरे आगे 
होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मिरे आगे 
ईमाँ मुझे रोके है जो खींचे है मुझे कुफ़्र
काबा मिरे पीछे है कलीसा मिरे आगे

ये अशआर इस बात की मिसाल हैं कि उनकी शायरी में संगीतमयता, गूढ़ता, आध्यात्मिकता और सार्वभौमिकता होती है और परत दर परत वे नए मानी खोलते हैं। ‘ग़ालिब’ के साहित्य को समझने और समझाने का काम समय-समय पर उर्दू अदब के माहिरीन करते रहे हैं। उनमें से मुख्य अल्लामा इक़बाल, कैफ़ी आज़मी, ख़ुशवंत सिंह, गुलज़ार, मेहर अफ़शान फ़ारूक़ी, गोपीचंद नारंग, प्रकाश पंडित, टी पी इस्सर हैं। 


तेरे फ़िरदौस-ए-तख़य्युल से है क़ुदरत की बहार

तेरी किश्त-ए-फ़िक्र से उगते हैं आलम सब्ज़ा-वार

-अल्लामा इक़बाल 


इन सभी अदीबों ने ‘ग़ालिब’ और उर्दू ग़ज़ल के बारे में मुतालअः करके अपनी किताबें लिखी हैं। सभी इस बात पर एकमत हैं कि ‘ग़ालिब’ के कामों को समझना और उनका तर्जुमा करना टेढ़ी खीर है। इनमें से कुछ किताबें अंग्रेज़ी में और कुछ उर्दू और हिंदी में हैं। ‘ग़ालिब’ में दिलचस्पी भारतीय महाद्वीप तक महदूद नहीं है, बल्कि उनके चाहने वाले पूरी दुनिया में हैं। पद्म भूषण सम्मानित सोवियत भारतविद और साहित्यविज्ञ येव्गेनी चेलीशेव अपने लेख ‘मिर्ज़ा ग़ालिब और भारतीय साहित्य’ में लिखते हैं- “ग़ालिब कविता और विश्व दृष्टि उर्दू साहित्य के मार्गदर्शक थे। उन्होंने उर्दू साहित्य के क्षितिज का विस्तार किया और सामंती संस्कृति और मुल्लाओं के धार्मिक दर्शन से इसका संबंध विच्छेद कराया। इसमें एक नए मानवतावादी अंश का प्रवेश कराया। भारतीय साहित्य की मुख्य धारा में उर्दू साहित्य को लाने के लिए पृष्ठभूमि तैयार की और उर्दू साहित्य में प्रगतिशील लोकतंत्रीय तत्त्वों के विकास के लिए आधारभूमि बनाई।”

प्रसिद्ध साहित्यकार हंसराज रहबर ने अपनी किताब ‘ग़ालिब बेनक़ाब’ में उर्दू और ‘ग़ालिब’ के प्रसिद्ध आलोचक रशीद अहमद सिद्दीक़ी के इस वाक्य को उद्धृत करते हुए  लिखा है -"मुग़लिया सल्तनत की तीन सबसे बड़ी देन हैं -ग़ालिब, उर्दू और ताजमहल।"


जहाँ उनकी ग़ज़लों और शेरों को समझने का काम लगातार चलता रहता है, वहीं उनके अशआर लोगों की ज़ुबाँ पर बैठे रहते हैं और बात को निशाने तक पहुँचाने के लिए उनका अक्सर सहारा लिया जाता है।   

हमको मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन 

दिल के ख़ुश रखने को 'ग़ालिब' ये ख़याल अच्छा है 


धनी घरानों से तअल्लुक़ात होने और ख़ुद बादशाह के दरबार का राजकवि रहने के बावजूद भी 'ग़ालिब' की माली हालत ताउम्र तंग रही। उनकी अधिकतर ज़िंदगी क़र्ज़ में डूबी रही। क़र्ज़ और शराब पीने के बारे में उनका रवैया हमेशा कुछ यूँ रहा-


क़र्ज़ की पीते थे मय लेकिन समझते थे की हाँ 

रंग लावेगी हमारी फ़ाक़ा-मस्ती एक दिन 


मुश्किली के दिनों में उनकी आमदनी का ज़रिया उन्हें मिलने वाली पेंशन थी। जब दिल्ली में तमाम अपीलों के बावजूद उनकी पेंशन में इज़ाफ़ा नहीं किया गया, तो ब्रिटिश गवर्नर जनरल के सामने अपना मुक़दमा रखने के लिए उन्होंने कलकत्ता का रुख़ किया। पेंशन के मामले में कोई कामयाबी हासिल नहीं हुई, लेकिन कलकत्ता से उन्होंने कई नई चीज़ें सीखीं, जानी और उनकी ज़िंदगी में एक नया मोड़ आया। यहाँ आने के बाद ही उन्होंने उर्दू के बजाय मुख्यतः फ़ारसी में लिखने का फ़ैसला किया। साथ ही पहली बार उन्होंने जाना कि दरबारों में होने वाली वाह-वाही के अलावा ख़यालात की आज़ादी भी कोई चीज़ होती है और उसका महत्त्व क्या होता है। वहीं पर उन्होंने प्रेस की ताक़त को भी पहचाना। 


कलकत्ता में ही 'ग़ालिब' ने अपनी उर्दू और फ़ारसी शायरी का इंतिख़ाब अपने दीवान के लिए किया। कलकत्ते के सफ़र के दौरान बीमारी की वजह से उन्हें लखनऊ और बनारस में रुकना पड़ा था। बनारस से वे बहुत प्रभावित हुए थे और उन्होंने बनारस पर मसनवी ‘चिराग़-ए-दैर’ लिखी, जो उनकी सबसे लंबी नज़्म है और इस शहर की महिमा में अब तक की सबसे बेहतरीन कविता मानी जाती है। 

कलकत्ते से वे अपने दिल में एक मज़बूत मक़सद लेकर दिल्ली लौटे - हिंदुस्तान में फ़ारसी का चिराग़ बनना। 

कुल मिलाकर १८२८-२९ की इस यात्रा ने ज़िंदगी के प्रति उनके नज़रिये को बदल दिया था। 


दिल्ली और दोस्तों से दूर जाने पर ख़तों के ज़रिये उन्होंने उनसे राब्ता बनाए रखा। लंबे सफ़र के दौरान भी 'ग़ालिब' अपने जज़्बात ख़तों में उडे़लते रहे थे। उनके ख़तों की ज़बान दिलकश फ़ारसी है और वे एक ख़ूबसूरत सफ़रनामा पेश करते हैं। ग़ालिब के ख़ुतूत भी उर्दू अदब के ऊँचे पायदान पर वाक़े हैं। उनके ख़त उन्नीसवीं सदी की पहली चौथाई में उत्तरी भारत की अदबी तहज़ीब पर रौशनी डालते हैं। ख़त के सिलसिले में ज़रा उनका नज़रिया देखिए-


सौ कोस से ज़बाने-क़लम बातें किया करो 

और हिज्र में वस्ल के मज़े लिया करो 


'ग़ालिब' ने दिल्ली लौटने पर अपने ही अंदाज़ में अपने काम जारी रखे और नतीजतन ताउम्र क़र्ज़ से दबे रहे। वह इंसान जिसका बहुतेरा वक़्त लिखने-पढ़ने में गुज़रता था, उसके पास कोई किताबें नहीं थीं। दिल्ली में अला माशल्लाह नाम का एक शख़्स दुकानों से किताबें किराए पर लेकर उन्हें घरों तक पहुँचाया करता था। 'ग़ालिब' भी उसके ग्राहक थे।

'ग़ालिब' को यक़ीनन दिल्ली दरबार में बहुत शोहरत मिली थी, लेकिन वह दूर टिमटिमाते सितारे से आ रही रौशनी की तरह थी। लेकिन आज उर्दू अदब में वे आफ़ताब की तरह चमकते हैं। यह मक़्बूल शायर बाख़ूबी इस बात को जानता था, तभी तो कह गया है-


हुई मुद्दत कि 'ग़ालिब' मर गया, पर याद आता है 

वो हर एक बात पे कहना कि यूँ होता तो क्या होता 


‘ग़ालिब’ भारतीय साहित्य के वैसे ही चमकते सितारे हैं, जैसे सूर, कबीर और तुलसी। उनकी  बची हुई दो निशानियाँ हैं, उनकी हवेली और मज़ार। गुलज़ार साहिब की कोशिशों और अटल बिहारी वाजपेयी की पहल से 'ग़ालिब' की कोयला गोदाम में तब्दील हो गयी हवेली को स्मारक का रूप और संग्रहालय का दर्जा मिल सका। निज़ामुद्दीन बस्ती में ‘ग़ालिब’ की मज़ार है, उससे कुछ दूरी पर सूफ़ी संत निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह है, जहाँ लोगों का आना-जाना लगा रहता है। उर्दू के अज़ीम शायर को हमारी छोटी सी श्रद्धांजलि यह हो सकती है कि उनकी मज़ार पर फूल चढ़ा और एक चिराग़ जला हम उसे खँडहर होने से बचा लें और उनके इस शेर को सच न होने दें-

हमने माना कि तग़ाफ़ुल न करोगे लेकिन 

ख़ाक हो जाएँगे हम तुमको ख़बर होने तक 


मिर्ज़ा ग़ालिब : जीवन परिचय

नाम

मिर्ज़ा असदउल्लाह बेग ख़ान

जन्म

२७ दिसंबर १७९७, आगरा, उत्तर प्रदेश 

कर्मभूमि

दिल्ली

मृत्यु   

१५ फरवरी १८६९, दिल्ली 

माता

इज़्ज़त-उन-निसा बेग़म

पिता

अब्दुल्ला बेग ख़ान 

पत्नी

उमराव बेग़म

कृतित्व

  • दीवान-ए-'ग़ालिब'

  • दस्तंबू, चिराग़-ए-दैर 

  • क़ादिर नामा-ए-'ग़ालिब'

  • मेह्र-ए-नीमरोज़ 

  • ख़ुतूत-ए-'ग़ालिब'

सम्मान

  • दाबिर-उल-मुल्क

  • मिर्ज़ा नौशा

  • नज़्म-उद-दौला


संदर्भ


लेखक परिचय

प्रगति टिपणीस
पिछले तीन दशकों से मास्को, रूस में रह रही हैं। इन्होंने अभियांत्रिकी में  शिक्षा प्राप्त की है। ये रूसी भाषा से हिंदी और अंग्रेज़ी में अनुवाद करती हैं। आजकल  एक पाँच सदस्यीय दल के साथ हिंदी-रूसी मुहावरा कोश और हिंदी मुहावरा कोश पर काम कर रही हैं। हिंदी से प्यार करती हैं और मास्को में यथा संभव हिंदी के प्रचार-प्रसार का काम करती हैं।




नीरजा आप्टे

पिछले २५ वर्षों से रंगमंच पर सक्रिय सूत्रसंचालन, संहितालेखन, वॉइसओवर, कलाकार। अभिनय के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित। कार्यक्रम 'सहर होने तक' और 'कवि कलम और हम' की निर्माता। 

ईमेल- dhireneerja@hotmail.com
फ़ोन- + ९१ ९९२२१३८२४३

5 comments:

  1. उर्दू-फ़ारसी के प्रख्यात कवि तथा महान शायर मिर्ज़ा ग़ालिब को उर्दू भाषा का सर्वकालिक महान शायर माना जाता है। ग़ालिब को ही फ़ारसी कविता के प्रवाह को हिन्दुस्तान में लोकप्रिय करवाने का श्रेय भी जाता है। मिर्ज़ा ग़ालिब पर प्रगति जी एवं नीरजा जी का यह महत्वपूर्ण लेख बहुत ही रोचक एवं पठनीय बना है। दोनों लेखकों को बहुत बहुत बधाई।

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  2. वाह ! बहुत शानदार लेख है प्रगति जी , नीरजा जी । ग़ालिब का पूरा जीवन चित्र खींचा है आपने । बधाई ! यह भी सही है कि दुनिया उन्हें ऐबी- शराबी मानती रही और लोग नास्तिक - काफिर का लेबल भी लगाते रहे लेकिन उनकी शायरी में सूफियाना चिंतन और दर्शन की छाप मिलती है । अनेक कवियों- लेखकों की भाँति यदि जीते - जी धन सम्मान मिल जाता तो क़र्ज़दार की ज़िंदगी ना जीनी पड़ती । हम सबके लिए नसीहत भी है : आप कितने भी बड़े अदीब हों , कलाकार हों , अगर आदतें बुरी हैं तो अदब और इज़्ज़त की ज़िन्दगी बड़ी मुश्किल है । 😊🙏💐

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  3. ग़ालिब'साहब -मिर्ज़ा असदुल्लाह बेग खान के लिए शायरी एक इबादत की तरह थी जिसमें ।महज रूहानी और अपने एहसासात को बयां करने की चाहत थी। उनकी शायरी में कमाल की गहराई और रूहानी तड़प का असर दिखाई पड़ता था। 'ग़ालिब' साहब की पूरी जिंदगी उनके पारिवारिक पेंशन के इर्द गिर्द घूमती रही। उन्हें समझने के लिए उनके बारे में जितना पढ़ा जाए उतना कम हैं।आदरणीय प्रगति जी और नीरजा जी ने बड़े शोध के साथ 'ग़ालिब' की जिंदगी के छोटे छोटे पहलुओं को शब्दों में पिरोकर हमें पेश किया हैं।इतने बड़े साहित्यिक सितारे की चमक आप दोनों के लेख से सारे जग में जगमगा रही हैं। यह वाकई में काबिल-ए-तारीफ़ है इसके लिए आप दोनों को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं।

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  4. बहुत रोचक और सुन्दर विवरणात्मक लेख। पुरानी दिल्ली में बीते उन दिनों की यादें ताजा हो आईं जहां वल्लीमारां से लेकर चितली कबर तक मिर्जा ग़ालिब के शेर हर नशिस्त में गूंजा करते थे. नीरजा जी और और प्रगति जी को सादर नमन.

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  5. बहुत शानदार लेख प्रगति जी और नीरजा जी । ग़ालिब का पूरा जीवन चित्र आपने समक्ष रख दिया है आपने । बधाई

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