Friday, October 28, 2022

संत दरिया महाराज : मरुधरा में ज्ञान, भक्ति और योग की त्रिवेणी

"राम शब्द निर्वाण है, सकल काल को काल। 

   जन दरिया भज लीजिये, पूरण ब्रम्ह नेह काल।।

 दरिया दीपक राम का, गगन मंडल में जोय। 

तीन लोक चौदह भवन, सहज उजाला होय।।"

 

राजस्थान के जन-मानस में बसी उक्त 'वाणी' के प्रणेता 'रामस्नेही संप्रदाय' के प्रवर्तक निर्गुण संत दरिया महाराज का नाम संत प्रवर दादू दयाल, रैदास और कबीर के समान ही राजस्थान में ही नहीं अपितु पूरे भारत में श्रद्धा से लिया जाता है। दरिया महाराज ने भी दादू जैसे अन्य कई संतों की तरह अपनी कर्म-स्थली के लिए संत-भूमि नागौर को चुना। जन सामान्य के लिए कबीर की भाँति लोक-भाषा में आध्यात्म के गूढ़ रहस्यों को सहज ही साखी और दोहों के रूप में कहा, जो कालांतर में दरिया-वाणी के रूप में प्रसिद्ध हुए।

 

मध्यकालीन निर्गुण संत दरिया महाराज का जन्म सन १६७६ में राजस्थान के पाली ज़िले के जैतारण में हुआ था। कबीर और दादू की भाँति ही इनके जन्म और जाति को लेकर भाषाविद और हिंदी साहित्य के इतिहासकार मतैक्य नहीं हैं। एक मतानुसार वे माता गीगा के गर्भ से जन्मे थे। दरिया महाराज की जन्म मरण परची के अनुसार, 

"मुरधर देस भरतखंड मांई, जैतारण एक नाम कहाई।"

 

एक अन्य साक्ष्य के अनुसार-

"पिता मानसा सही, माता गीगा सो कहिये।

बण सुत को घर बुदम जात धुणियाँ जो लहिये।"

 

एक और मान्यता के अनुसार दरिया साहब दरिया की लहरों पर मिले थे इसलिए इनके पिता मानसा ने इनका नाम दरियाव रखा। (ये दरिया और दरियाव दोनों नामों से जाने जाते हैं) रामस्नेही संप्रदाय और अन्य दरिया जीवन आधारित शोध ग्रंथों के आधार पर यह मान्यता प्रचलित हो गई कि वे मानसा और गीगा के पुत्र थे और धुनिया जाति के थे। 

 

संत जय राम और आत्मा राम ने दरिया साहब पर लिखी 'लावणी' में आचार्य क्षितिमोहन, डॉ० राम कुमार वर्मा, पं० परशुराम चतुर्वेदी, मोतीलाल मेनारिया, डॉ० राधिका प्रसाद त्रिपाठी आदि ने दरिया का जन्म सन १६७६ में होने की पुष्टि की है। लेकिन माता-पिता और जाति के संबंध में ये विद्वान एक मत नहीं हैं। रेण संप्रदाय के संत भावनादास, हरि नारायण शास्त्री, राम किशोर शास्त्री, संत आत्मा राम आदि द्वारिका में दरिया में शिशु रूप में तैरते मिलने के दावे करते हैं, जिन्हें आधुनिक विचारक काल्पनिक कहानी बताते हैं। डॉ० राधिका प्रसाद त्रिपाठी इस संबंध में असहमति जताते हुए लिखते हैं, "कहने की आवश्यकता नहीं कि यह कल्पना सांप्रदायिक प्रवृत्ति के अतिवाद से प्रेरित है।"


बचपन में पिता के देहांत के कारण दरिया का पालन-पोषण नाना किशन द्वारा रेण में हुआ। नाना का जबरन धर्मांतरण मुस्लिम धर्म में कर दिया था; उनके बचपन का नाम 'कमीश' था। इसलिए भ्रमवश इनके दोयते दरिया को मुस्लिम माना गया। पुस्तक 'दरिया साहब की बानी' में आचार्य पीतांबर दत्त बडथ्वाल, डॉ० राम कुमार वर्मा, वियोगी हरि, डॉ० पूर्ण दास आदि विद्वानों ने उन्हें धुनिया जाति का मुसलमान बताया है। लेकिन बड़े होकर नमाज़ न पढ़ कर 'राम' नाम सुमिरन से उनके हिंदू होने के संकेत मिले। उनके खत्री हिंदू होने की पुष्टि डॉ० मोतीलाल मेनारिया, डॉ० मदन कुमार जानी, बलराम दास शास्त्री, हरि नारायण शास्त्री आदि ने की है।

 

दरिया महाराज के शिष्यों तथा उनकी प्राप्त रचनाओं के आधार पर उनके हिंदू होने की पुष्टि होती है। उनकी वाणियों में कहीं भी मुस्लिम धर्म-दर्शन के समाहित होने के संकेत नहीं मिलते। दरिया के माता-पिता और पुत्रों के हिंदू नाम थे। जोधपुर के शासक बखत सिंह और विजय सिंह का दरिया के शिष्य होना तथा राज दरबार में उनके सत्संग में होना दरिया के हिंदू होने के प्रमाण हैं। 

 

शिक्षा

बालक दरिया नाना के सान्निध्य में रेण में रह रहा था। जब वह सात वर्ष का था तब उसकी तेजस्विता से प्रभावित होकर काशी के दो पंडित स्वरूपा नंद और शिव प्रसाद उसकी माता गीगा व नाना की अनुमति से उसे अपने साथ काशी ले गए। वहाँ से व्याकरण, दर्शन, वेद, गीता, उपनिषद, संस्कृत, कुरान, फ़ारसी आदि शास्त्रों का अध्ययन करके वह रेण लौटा। इसके प्रमाण रामस्नेही संप्रदाय के साहित्य में मिलते हैं। रामस्नेही संप्रदाय के प्रकाशित साहित्य 'श्री रामस्नेही संत वाणी एवं भजन संग्रह' और 'रामस्नेही अनुभव आलोक' में दरिया साहब को आजीवन अविवाहित माना जबकि पदूम दास, साहेब राम, सुख सारण, उमा राम जी ने इन्हें गृहस्थ बताया। बलदेव वंशी ने अपने शोध ग्रंथ 'भारतीय संत परंपरा' और डॉ० वसुदेव सिंह ने अपने शोध ग्रंथ 'हिंदी संत काव्य समाज शास्त्रीय अध्ययन' में दरिया साहेब के गृहस्थी होने और उनके तीन पुत्र कुसाल, संमन व हंसराज के होने के प्रमाण दिए। दरिया महाराज ने गृहस्थ धर्म का पालन करते हुए भगवद्प्राप्ति के लिए सहज नाम सुमिरन को महत्त्व दिया। वे संसार में रहते हुए एक विरक्त संत थे। आचार्य परशुराम चतुर्वेदी और डॉ० राधिका प्रसाद त्रिपाठी ने उनकी विद्वत्ता की भूरि-भूरि प्रशंसा की है। डॉ० ओमकार नाथ चतुर्वेदी ने उन्हें फ़ारसी, संस्कृत और हिंदी का ज्ञाता माना है। 

 

दीक्षा

काशी से शिक्षा ग्रहण करके रेण आने पर वेद-उपनिषद का अध्ययन करते समय उन्हें गुरु ज्ञान की महिमा का बोध हुआ और वे सच्चे गुरु की तलाश में निकल गए। उनकी भेंट प्रेमदास जी महाराज से हुई; दरिया ने उनसे गुरु बनने के लिए निवेदन किया। डॉ० सतीश कुमार ने अपने शोध ग्रंथ 'रामस्नेही संत- काव्य परंपरा एवं मूल्यांकन' में हस्त लिखित साक्ष्यों के आधार पर यह सिद्ध किया कि प्रेमदास जी ने दरिया को शिष्य मान दीक्षा दी थी। 

 

दरिया की अपने गुरु के प्रति परमात्मा जैसी अगाध श्रद्धा थी। इसका वर्णन दादू पंथी ब्रह्मदास ने भी किया है। युवावस्था में राम-नाम जप और योग साधना करते हुए दरिया ने आध्यात्मिक सिद्धियाँ प्राप्त कीं। इन्होंने आत्मज्ञान के लिए गुरु की संगत को अनिवार्य बताया। 

"दरिया साधू किरपा करे, तो तारे संसार।

तारनहारा राम है, जा में न फेर न सार।।"

 

प्रेमदास जी से दीक्षित होकर दरिया ने रेण गाँव को ही तपोस्थली बनाया, जहाँ नित्य सत्संग में इनके अनुयायी और शिष्य आया करते थे। उनके ७२ शिष्यों में से किसनदास टांकला, सुखराम मेड़ता, पूरणदास रेण, नानकदास कुचेरा, चतुरदास रेण, हरखाराम नागौर, टेमदास डीडवाना, मनसाराम सांजू, ये ८ प्रमुख थे। शिष्य सुखराम मेड़ता से १० मील पैदल चलकर १२ वर्ष तक सत्संग सुनने आता रहा था। इसलिए दरिया साहेब ने शिष्य-प्रेम के कारण रेण और मेड़ता के बीच खेजड़ी वृक्ष को सत्संग हेतु चुना; वहाँ पेड़ के नीचे बैठ प्रवचन देते थे। कालांतर में वह स्थान 'खेजड़ा' के नाम से प्रसिद्ध हुआ। 

 

मारवाड़ नरेश उनके शिष्य सुखराम के अनुरोध से ही दरिया की शरण में आकर रोग मुक्त हुए थे। जोधपुर नरेश विजय सिंह जी भी दरिया की शरण में आए थे। उनकी अलौकिक और दिव्य शक्ति को पहचान कर दरिया साहब को दोनों ने गुरु मान दीक्षा ली थी। 

 

दरिया ने अपने शिष्य राजाओं से जनता के सारे लाग बाग (लगान कर) माफ़ करवा दिए थे। उनके लोक कल्याणकारी चमत्कार से लोगों ने उन्हें ईश्वरीय रूप में मानना शुरू कर दिया था। दरिया के दिव्य रूप और कार्यों का बखान जय राम जी और आत्मा राम जी कृत 'लावणी' में मिलता है। 

 

आत्मज्ञानी संत दरिया सहज ही लोगों के दुख दूर और रोग ठीक कर देते थे। वे मूर्ति पूजा, जीव हत्या, छुआछूत को धार्मिक आडंबर मान इनका विरोध करते थे। उन्होंने परमात्मा के नाम सुमिरन को सर्व सुलभ बताया। उनका 'राम' दशरथ नंदन राम न होकर निर्गुण निराकार ब्रह्म है। उनका 'राम' हिंदू धर्म के राम के 'रा' और मुस्लिम धर्म के मुहम्मद के 'म' से मिलकर बना है, जो सभी द्वंद्वों से परे और सर्व धर्म समन्वयकारी है।

"दरिया सुमिरै राम को, आत्म को आधार। 

काया काची कांच सी, कंचन होत न बार।।"

 

दरिया महाराज को पूर्वाभास हो गया था कि कलयुगी लोगों को उनकी 'वाणियों' पर विश्वास नहीं होगा। इसलिए अपने लिखे १०००० से ज्यादा पदों, साखियों और दोहों के संग्रह को नदी में बहा दिया था। उनके शिष्यों को उनके जितने पद, साखी और दोहे कंठस्थ थे,  बाद में 'दरिया बानी और जीवन-चरित्र' नाम से पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुए। संत महाराज की दूसरी पुस्तक 'गुरु महिमा' नामक ग्रंथ का रचना काल वि० सं० १७९० माना जाता है। 

"संवत १७ साल में वर्ष ९० वे जाण। 

राम सागर के तीर महिमा करी बखान।।"

 

संत दरिया की वाणियाँ - श्री रामस्नेही संत वाणी और भजन संग्रह, रामस्नेही अनुभव आलोक, रामस्नेही अनुभव वाणी, श्री दरियाव दिव्य वाणी आदि पुस्तकों के रूप में प्रकाशित हुईं। डॉ० सतीश कुमार ने अपने शोध ग्रंथ में दरिया रचित दो ग्रंथों 'भगत माल' और 'ब्रह्म ध्यान' के अलावा ७३ अन्य नए पदों और २१ कुंडलियों का उल्लेख किया है। डॉ० सतीश ने साक्ष्यों के आधार पर स्पष्ट किया कि वि० सं० १८०० में दरिया महाराज ने 'भगतमाल' की रचना कुचेरा नामक स्थान पर की थी। उसके बाद 'ब्रह्म ध्यान' की भी रचना की थी। 

 

वर्ष १७५८ में रेण गाँव में ही उनकी मृत्यु हुई। दरिया साहेब के निर्वाण के बाद भी उनकी शिष्य परंपरा व अनुयायियों में वृद्धि होती गई। इसके परिणाम स्वरूप राजस्थान के अंदर और बाहर कई शहरों में रामद्वारे स्थापित किए गए। रेण में हर वर्ष चैत्र सुदी पूर्णिमा को मेला लगता है। उन्हें चाहने वाले बड़ी श्रद्धा और भक्तिभाव से उनके समाधि स्थल पर और मेला देखने जाते हैं।

 

दादू और कबीर  की तरह दरिया महाराज भी समाज सुधारक थे। इसके अलावा उन्होंने ध्यान योग के जरिए लोगों के कष्ट और रोग भी दूर किए, समाज में स्त्रियों को सम्मानजनक स्थान दिलाया, कुरीतियों और धार्मिक पाखंडों का विरोध किया। उन्होंने 'आत्मा राम सकल घट भीतर' कहकर जाति और धर्म भेद को निर्मूल कर दिया। सभी धर्मों और वर्गों के लोग उनके अनुयायी थे। धर्म को सहज स्नेह भाव में अपने घट के भीतर ब्रह्म स्वरूप राम स्थित बताया। वे अहिंसा, ब्रह्मचर्य, अक्रोध, अपरिग्रह, दुष्ट और व्यसन संग त्याग, नाम सुमिरन, आत्मानुसंधान, गुरु भक्ति आदि के उपदेश देकर सर्वहित और जन-कल्याण के लिए आजीवन सत्संग करते रहे, जिससे अनगिनत लोगों का कल्याण हुआ। ऐसे आत्मतत्त्व ज्ञाता संत दरिया को शत शत नमन।


दरिया महाराज : जीवन परिचय

जन्म

सन १६७६  

निधन

सन १७५८ रेण में

जाति 

धुनिया 

माता

गीगा

पिता

मानसा

भाषा 

हिंदी, संस्कृत, फारसी और सधुक्कड़ी

संतान 

तीन पुत्र 

साहित्यिक रचनाएँ

  • भगतमाल

  • ब्रम्ह ध्यान

  • दरिया वाणी

  • गुरु महिमा

सम्मान

  • उपाधि - दरिया साहेब

 

संदर्भ

  • दरिया महाराज- कविता कोश

  • दरिया महाराज -विकिपीड़िया

  • Hindawi

  • दरिया वाणी - biography

  • Indira Gandhi national centre - रामस्नेही संप्रदाय के संत दरिया महाराज

  • भारतकोश

  • पृथ्वीराज रासो - यूट्यूब

 

लेखक परिचय

 मीनाक्षी कुमावत मीरा


रोहिडा, सिरोही, राजस्थान 

शिक्षा - एम०ए०, बी०एड०, नेट (हिंदी साहित्य) 

राजकीय विद्यालय में अध्यापन कार्य

कृतियाँ - गुरु आराधनावली (भजन संग्रह), हाइकु कोश, आगाज़ (ग़ज़ल संग्रह) व १५ अन्य साझा संकलन, देश के कई पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित; साहित्यकार तिथिवार समूह व कविता की पाठशाला के ग़ज़ल समूह के लेखन कार्य में साझेदारी और अन्य साहित्यिक समूहों में लेखन कार्य।

Thursday, October 27, 2022

मोहन राकेश : मानवीय संबंधों में संपूर्णता की तलाश

जो लोग ज़िंदगी से बहुत कुछ चाहते हैं उनकी तृप्ति अधूरी ही रहती है- इस अधूरेपन की बेचैनी को उपन्यास, कहानी, नाटक आदि विधाओं में संप्रेषणीयता प्रदान करने वाले मोहन राकेश हिंदी साहित्य के एक सशक्त हस्ताक्षर हैं। आधुनिक जीवन के असंतोष और अधूरेपन की संवेदना को कभी पीछे मुड़कर 'आषाढ़ का एक दिन' के कालिदास और मल्लिका के माध्यम से, कभी 'लहरों के राजहंस' की सुंदरी, गौतम बुद्ध और नंद के प्रवृत्तिवाद और निवृत्तिवाद के चिरंतन द्वंद्व से, कभी 'अंधेरे बंद कमरे' के हरबंस और नीलिमा के दमघोटू जीवन तो कभी 'आधे-अधूरे' के महेंद्रनाथ और सावित्री के स्त्री-पुरुष के लगाव और तनाव के साथ विवाह संस्था और पारिवारिक जीवन के विघटन को अपने जीवन के अनुभवों की प्रामाणिकता और प्रांजल अभिव्यंजना शक्ति से समृद्ध करके मोहन राकेश साठ-सत्तर के दशक के वरिष्ठ लेखकों में प्रमुख रूप से प्रतिष्ठित हुए। 

मोहन राकेश का जन्म ८ जनवरी सन १९२५ को अमृतसर में हुआ था। पिता पेशे से वकील और रुचि से साहित्य तथा संगीत प्रेमी थे। पिता की साहित्यिक रुचि का प्रभाव मोहन राकेश पर भी पड़ा। लाहौर के ओरियंटल कॉलेज से 'शास्त्री' की परीक्षा पास की। पिता की असमय मृत्यु के उपरांत पारिवारिक दायित्व का निर्वहन करते हुए पंजाब विश्वविद्यालय से हिंदी, अँग्रेज़ी और संस्कृत में एमए किया और तदुपरांत अध्यापन और लेखन शुरू किया। 

स्वतंत्र प्रकृति के मोहन राकेश अध्यापन कार्य के साथ अधिक समय तक नहीं जुड़ सके। वहाँ से मुक्त होकर एक वर्ष 'सारिका' पत्रिका का संपादन किया। पर संपादन के अनुशासन को अपनी रचनात्मकता में बाधक जानकर स्वतंत्र लेखन को चुना। व्यक्ति और समाज के संवेदनशील सरोकारों को केंद्रित करके अलग-अलग पात्रों और परिस्थितियों के संदर्भ में उनका सार्थक संबंध अन्वेषित करना उनकी समस्त रचनाओं की पहचान है। नई कहानी के मूर्धन्य प्रवर्तक, मोहन राकेश की 'मिस पाल', 'आद्रा', 'ग्लास टैंक', 'मलबे का मालिक', आदि कहानियों ने हिंदी कहानी का परिदृश्य ही बदल दिया। उनकी कहानियाँ आधुनिक मनुष्य की नियति को प्रतिबिंबित करती हैं। कथाशिल्प की परिपक्वता, भाषागत सधाव तथा अभिव्यंजना की संप्रेषणीयता उन्हें विशिष्ट बनाती हैं। 

सन १९५८ में प्रकाशित आधुनिक युग के प्रथम नाटक माने जाने वाले, 'आषाढ़ का एक दिन' ने हिंदी नाट्य साहित्य को एक नवीन आयाम दिया। सन १९५९ में संगीत नाटक अकादमी से इसे वर्ष के सर्वश्रेष्ठ नाटक पुरस्कार से सम्मानित किया गया। सन १९७९ में मणि कौल ने इस पर आधारित फिल्म बनाई जिसे फिल्मफेयर ने वर्ष की सर्वश्रेष्ठ फिल्म का पुरस्कार दिया। महाकवि कालिदास के निजी जीवन पर केंद्रित 'आषाढ़ का एक दिन' का आरंभ 'मेघदूतम्' की प्रारंभिक पंक्तियों से किया गया है। आषाढ़ का महीना उत्तर भारत में वर्षा ऋतु का शुरुआती महीना होता है। नाटक में मेघ के बदलते रंग रंगमंच पर एक पूरी कविता रच डालते हैं। वे सच्चे अर्थों में रंगमंच के कवि दिखाई देते हैं। यह काव्य भाषा से नहीं वरन स्थितियों से निर्मित है, जो शब्दों पर आश्रित तो है, पर उसके साथ-साथ पात्रों की स्थितियों, मनस्थितियों, मंचीय उपकरणों और बिंबों पर भी आश्रित है। कालिदास, मल्लिका और विलोम की नाट्य स्थिति एक ओर प्रेम की रसासिक्ति तो दूसरी ओर संघर्ष अथवा विवशता की पीड़ा में प्रेक्षक के लिए समसामयिक आस्वाद प्रदान करने वाली है। नाटक की भूमिका में राकेश का कथन, "हिंदी रंगमंच को हिंदी भाषी प्रदेश की सांस्कृतिक पूर्तियों और आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्त्व करना होगा और राशियों के विवेक को व्यक्त करना होगा। हमारे दैनंदिन जीवन के रागरंग को प्रस्तुत करने के लिए हमारे संवेदों और स्पंदनों को अभिव्यक्त करने के लिए जिस रंगमंच की आवश्यकता है वह पाश्चात्य रंगमंच से कहीं भिन्न होगा।" नाट्यकार के दायित्व का वहन करना एक नई रंगदृष्टि की तलाश करना है। राकेश ने इस नाटक में साहित्यिक तत्त्व अक्षुण्ण रखते हुए रंगमंचीय क्रिया व्यापार द्वारा नए प्राण स्पंदित किए। संस्कृत आचार्यों ने नाटक की गणना एक दृश्य काव्य में की है। उसकी प्रभावांविति का निकष मंच पर जीवंतता प्रदान करने में होना चाहिए। हिंदी रंगमंच की अपनी परिकल्पना को साकार करने के लिए राकेश ने एक के बाद एक उत्कृष्ट नाटक लिखे जिनका भारत के श्रेष्ठ नाट्य निर्देशकों ने मंचीकरण किया।

नाटक और रंगमंच की पारस्परिकता को स्थापित करने के लिए राकेश ने अपने नाटकों के मंचीकरण के समय नाट्यनिर्देशकों के साथ सक्रिय रूप से काम किया। 'लहरों के राजहंस' के कोलकाता में हुए सर्वप्रथम मंचीकरण के समय कोलकाता की प्रसिद्ध नाट्यसंस्था अनामिका से जुड़ी होने के कारण मुझे उनकी रचना प्रक्रिया से परिचित होने का अवसर मिला। राकेश एक ऐसे नाटककार थे जो निर्देशक के साथ काम करते समय अपने लेखकीय स्वायत्त (अहम) को दरकिनार रखने की उदात्तता रखते थे। अनामिका के प्रसिद्ध नाट्यनिर्देशक, स्वर्गीय श्यामानंद जालान 'लहरों के राजहंस' के अंतिम दृश्य से बहुत संतुष्ट नहीं थे। उन्होंने जब राकेश को इस बारे में लिखा तो राकेश ने न केवल उनकी बात को ध्यान से सुना बल्कि पूर्वाभ्यास के दौरान स्वयं कोलकाता आए। पूर्वाभ्यास के समय वे हिंदी हाई स्कूल के सभागार में पीछे की सीट पर बैठकर पात्रों के अभिनय और कथोपकथन के प्रभाव का आकलन करते थे। नाटक के अभिनेता विमल लाठ ने अपने संस्मरण में लिखा, "राकेश आए और रिहर्सलों में उपस्थित हुए। उन्होंने हम सब को अलग-अलग बुलाकर हमारे चरित्रों के विषय में संवाद किए। वे टाइपराइटर पर संवाद लिखते थे। एक संवाद टाइप किया और पसंद नहीं आया तो कागज़ निकाल कर मोड़-तोड़ कर ज़मीन में फेंक दिया।" प्रश्न था नाटक के त्रिभुज – भोग-वासना की प्रतीक सुंदरी, त्यागमय जीवन दर्शन के प्रतीक बुद्ध और इन दो परस्पर विरोधी जीवन दर्शन के बीच दुविधाग्रस्त गौतम बुद्ध के सौतेले भाई नंद के परस्पर संबंध का। नाटक का केंद्रीय भाव इस बिंदु पर टिका है कि बुद्ध और सुंदरी के परस्पर विरोधी जीवन दर्शन का संघात नंद को किस तरह प्रभावित करेगा। आसक्ति और वैराग्य की पड़ताल सुंदरी और बुद्ध के चरित्रों के माध्यम से की गई है। निर्देशक और लेखक इस विषय पर घंटों विचार-विमर्श करते और रात भर के विचार विनिमय के बाद राकेश सुबह सात बजे उठकर कमरा बंद करके नाटक का अंत लिखने बैठते। इस बीच नाटक का पूर्वाभ्यास चलता रहा और अंत निश्चित न कर पाने के कारण मंचीकरण की तारीख़ आने पर उसकी प्रथम प्रस्तुति उसके अपरिवर्तित रूप में ही हुई। सन २००८ में श्यामानंद ने उसके संशोधित संस्करण को फिर से प्रस्तुत किया। डॉ० प्रतिभा अग्रवाल के शब्दों में, "लहरों के राजहंस की पहली प्रस्तुति के सिलसिले में मोहन राकेश के साथ हुए दीर्घ विचार-विमर्श नाटकीय आलेख में संशोधन लेखक और निर्देशक के सहयोग से प्रस्तुति की अच्छी मिसाल प्रस्तुत करता है।" 

सुंदरी का विश्वास है, "नारी का आकर्षण पुरुष को पुरुष बनाता है तो उसका अपकर्षण उसे गौतम बुद्ध बना देता है।" अपने सौंदर्य और यौवन के आकर्षण के प्रति आश्वस्त सुंदरी जो गौतम बुद्ध की साधना को यशोधरा की आकर्षण शक्ति की विफलता मानती है, नंद को बुद्ध के प्रभाव से विमुख करने का विश्वास भंग होने का आभास होने पर अपने अहम की तुष्टि के लिए स्वयं उसे मुक्त करती है। जब नंद अपने मुंडित सिर से उसके पास लौटता है तो उसके नारीत्व को ठेस पहुँचती है पर वह नंद को इस रूप में देखकर उसका सामना करती है। प्रश्न था कि नाटक का अंत कैसे हो जो सहज हो और विश्वसनीय भी। उस समय राकेश दार्जिलिंग में थे, उनके बुलाने पर श्यामानंद वहाँ गए, राकेश अत्यंत अशांत और अस्थिर थे – कारण वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे थे कि अंत में सुंदरी को मरना होगा। सुंदरी का यह अंत उन्हें बुरी तरह से झकझोर रहा था। अपने पात्र के साथ लेखक के भावनात्मक तादात्म्य का यह अद्भुत उदाहरण था। 

जीवन के एक गहन अनुभव खंड को मूर्त करने वाले नाटक 'आधे-अधूरे' में राकेश की प्रयोगधर्मिता का एक और आयाम दर्शनीय है। एक ही अभिनेता द्वारा पाँच पृथक भूमिकाएँ निभाए जाने की दिलचस्प रंगयुक्ति के प्रयोग को तत्कालीन आलोचकों ने मिश्रित प्रतिक्रिया दी। नाटककार के इस प्रयोग को केवल चमत्कृत करने वाली और एक आरोपित व अनावश्यक रंग युक्ति मात्र मानने वाले निर्देशकों ने अपनी प्रस्तुतियों में जब पाँच अलग-अलग अभिनेताओं का प्रयोग किया तो उनमें से एक प्रदर्शन भी पूरी तरह से कामयाब नहीं हो सका। आधुनिक युग विराट घटनाओं और महान नायकों का नहीं है। यह मानसिक संघर्ष और आम आदमी की लघुता और तुच्छता का युग है। 'आधे-अधूरे' में राकेश ने बाह्य घटनाओं के बजाय पात्रों की मनःस्थितियों और संवेदनाओं की टकराहट को आंतरिक विस्फोट की तीव्रता एवं सघनता से प्रस्तुत किया है। महेंद्रनाथ, सावित्री, बिन्नी, किन्नी, अशोक, सिंहानिया जगमोहन सभी मध्यवर्ग के सामान्य व्यक्ति हैं– महत्त्वाकांक्षी, अतृप्त, असंतुष्ट, कुंठित, आतंकित, क्रुद्ध और अंतर्द्वंद्वग्रस्त। वे रिश्तों में एक दूसरे से कटे-बँधे और सतत तनावग्रस्त हैं। राकेश ने उन्हें व्यक्ति विशेष के बजाय जातिगत रूपों में उकेरा है। वस्तुतः नाटक के पाँच पुरुष एक ही व्यक्ति के विविध रूप या पहलू हैं। सावित्री कहती है, "सब के सब एक-से! बिलकुल एक से हैं आप लोग। अलग-अलग मुखौटे, पर चेहरा? चेहरा सब एक ही!" नाटक जीवन के अधूरेपन को पारिवारिक संबंधों के विघटन, दम घोटने वाली मनहूसियत और छटपटाहट के द्वारा जीवंत करता है। महेंद्रनाथ में ज़िंदगी से अपनी लड़ाई हार चुकने की छटपटाहट है। बड़ी बेटी बिन्नी में संघर्ष का अवसाद और उसके व्यक्तित्व में बिखराव है। छोटी लड़की किन्नी के भाव, स्वर और चाल सब में विद्रोह है। अशोक के चेहरे से झलकती है ख़ास तरह की कड़वाहट। भाई बहन में संवाद केवल अपना आक्रोश और असंतोष व्यक्त करने के लिए होता है। सावित्री के चरित्र में मध्यवर्गीय स्त्री के जीवन की विडंबना देखने को मिलती है। नाटक में उसकी चार भूमिकाएँ हैं वह एक स्त्री, पत्नी, माँ, और प्रेमिका है। वह इन चारों भूमिकाओं में सामंजस्य स्थापित नहीं कर पाती है। आर्थिक समस्याओं से जूझती हुई सावित्री न तो एक सफल पत्नी और न ही एक सफल प्रेमिका बन पाई, सफल माँ तो वह है ही नहीं। महेंद्रनाथ को एक पूरे पुरुष का एक चौथाई तक न मानकर एक पूर्ण पुरुष की तलाश में भटकती सावित्री स्वयं एक अधूरी स्त्री है। पात्रों के माध्यम से राकेश ने मानवीय संतोष के अधूरेपन को रेखांकित किया है- जो लोग जीवन से बहुत कुछ अपेक्षा रखते हैं, उनकी तृप्ति अधूरी ही रहती है। 'आधे-अधूरे' के अंत में थका हारा पराजित महेंद्रनाथ, 'आषाढ़ का एक दिन में' वर्षा में मल्लिका के घर से निकलता कालिदास और बाँह छुड़ाती पत्नी की उपेक्षा से 'लहरों के राजहंस' का नंद रगमंच पर एक करुण रागिनी छोड़ जाते हैं जिसका प्रभाव देर तक मन को उद्वेलित करता है। 

राकेश के उपन्यास भी इसी विषण्ण मनःस्थिति को उजागर करते हैं। पात्र और परिस्थितियाँ बदल जाते हैं पर उनके भीतर की कुंठा और टूटन यथावत बने ही रहते हैं। 'अंधेरे बंद कमरे' में मानवीय रिश्तों के केंद्र में स्त्री-पुरुष संबंध को यथार्थ के संदर्भ में रखकर टटोला गया है। उपन्यास की पृष्ठभूमि स्वतंत्रता के बाद की दिल्ली के एक पत्रकार, मधुसूदन की दृष्टि से देखा गया जीवन है। दिल्ली के सांस्कृतिक, राजनीतिक और पारिवारिक जीवन के खोखलेपन के चित्रण और मधुसूदन के रूप में निम्नमध्यवर्गीय व्यक्ति की मानसिकता को उकेरते हुए राकेश ने स्त्री-पुरुष के निर्बंध संबंधों की विसंगति चित्रित की है। राकेश के शब्दों में, "यथार्थ एक गतिरोध है – मध्यवर्ग के संबंधों में आया गतिरोध। हरबंस और नीलिमा इस गतिरोध में रहकर छटपटाते हैं पर इससे उबर नहीं पाते ...सारी कोशिशों के बाद जहाँ के तहाँ बने रहना उनकी अनिवार्य स्थिति है।" हरबंस और नीलिमा के कुसमंजन का एक प्रमुख कारण आधुनिक व्यक्ति की चेतना में अंतर्विरोध है। मध्यवर्गीय व्यक्ति हरबंस नीलिमा को स्वतंत्र व्यक्तित्व के विकास के अवसर देकर अपने आधुनिकता के दंभ को पोषित करता है, पर जब नीलिमा कला के क्षेत्र में प्रतिष्ठित होने का संकल्प करती है तब हरबंस को अपने अधिकार छीने जाने की अनुभूति हीन-भावना से ग्रस्त कर लेती है। वह नीलिमा के सहयोगी पति के स्थान पर उसका विरोधी बन जाता है। नीलिमा का प्रत्यक्ष विरोध न करके वह उसके दोषों को रेखांकित करता है। वह स्त्री को स्वतंत्रता का आश्वासन भर देना चाहता है, वास्तविक स्वतंत्रता नहीं। हरबंस आधुनिक व्यक्ति की आंतरिक उलझनों की पोटली है। वह नौकरी करता है, पर उससे संतुष्ट नहीं। कभी थीसिस लिखने का निश्चय करता है तो कभी उपन्यास लिखने का। कभी पत्नी के रूप में एक बौद्धिक संगी की आकांक्षा करता है तो कभी घर-गृहस्थी संभालने में दक्ष शुक्ला की स्पृहा! नीलिमा हरबंस की अपेक्षा कम भावुक अधिक उन्मुक्त और निभ्रांत है। उसकी आकांक्षा की दिशा शुक्ला से भिन्न है, इसलिए वह शुक्ला जैसी बनने का यत्न भी नहीं करती है। हरबंस और नीलिमा में कोई समान भूमि नहीं है। नीलिमा हरबंस की प्रत्यक्ष उदारता न देख कर उसकी तह में छिपी संकीर्णता ही देखती है। हरबंस को नीलिमा का अपनी योग्यता के प्रति आत्मविश्वास अतिरंजित लगता है। उनके आरोप-प्रत्यारोप संकुल जीवन में शुक्ला की उपस्थिति उनके साझे जीवन की दरारों को निरंतर गहरी करती हैं। जीवन की ऊब, घुटन और एकरसता से ऊबकर हरबंस लंदन चला जाता है। लेकिन ऊब, घुटन और अकेलापन किसी स्थान की विशेषता नहीं, व्यक्ति की मनःस्थिति है। श्रीकांत वर्मा के शब्दों में, "जहाँ तक उसकी घुटन ऊब और एकरसता का संबंध है, यह पहला उपन्यास है जिसने इतनी तीव्रता के साथ इसे प्रतिष्ठित किया है। हरबंस कहता है, "तुम्हारे साथ और तुम्हारे बिना, दोनों ही तरह ज़िंदगी मुझे असंभव प्रतीत होती है।" हरबंस और नीलिमा आधुनिक व्यक्ति की असमर्थता को द्योतित करते हैं – वह प्रेम करने की अपनी असमर्थता को स्वीकार करने में असमर्थ है। बार-बार हरबंस से दूर जाने के बाद नीलिमा अंत में वापस आती है, संभवतः फिर से  दूर जाने के लिए! राकेश के अनुसार, अंधेरे बंद कमरे में घुटते रहना मध्यवर्गीय बौद्धिक व्यक्ति की नियति है। उपन्यास के प्रारंभ में लेखक ने तीन प्रश्न किए हैं, "क्या यह उपन्यास दिल्ली के जीवन का रेखाचित्र है? क्या यह पत्रकार मधुसूदन की आत्मकथा है? क्या यह पति-पत्नी के आंतरिक द्वंद्व की कहानी है?" ये तीनों संवेदनाएँ उपन्यास में इस तरह से घुली-मिली हैं कि उन्हें अलग नहीं किया जा सकता। वस्तुतः यह उपन्यास विसंगतिपूर्ण महानगरीय परिवेश में मध्यवर्गीय व्यक्ति के जीवन-संघर्ष का सटीक दस्तावेज है।

'न आने वाला कल' भारतीय क्रिश्चियन स्कूल की पृष्ठभूमि में आत्मकथात्मक शैली में लिखा गया उपन्यास है। उपन्यास के सभी पात्र अपने जीवन की लक्ष्यहीनता से संत्रस्त हैं। वे अपने आने वाले कल को पहचानना चाहते हैं, लेकिन उस 'कल' की कोई रूपरेखा उनके समक्ष नहीं है। नुरूला और शोभा नहीं जानते कि वे क्या चाहते हैं, किंतु अपने अतीत और वर्तमान में रहते हुए अपने अहम को चोट पहुँचाते हुए जूझते रहते हैं। अपने तीसरे उपन्यास, 'अंतराल' में राकेश ने वैवाहिक संबंधों के बनने-बिगड़ने के पीछे सामाजिक और आर्थिक कारणों को ढूँढना चाहा है। कुमार को स्त्री और पुरुष का एक घुटन भरे वातावरण में दमित होते रहना अपनी स्वाभाविक प्रकृति के साथ विश्वासघात करना लगता है। दूसरी ओर श्यामा द्वंद्वों और छलनाओं के बीच ऊभ-चूभ होती हुई स्त्री है जो कुमार के प्रति समर्पित होने पर अपने भीतर ही भीतर कुछ कट-कटा अनुभव करती है। 'कई एक अकेले', 'काँपता हुआ दरिया', 'स्याह और सफेद', 'गुंझल' और 'नीली रोशनी की बाँहें' में राकेश ने भिन्न-भिन्न कोणों से मानवीय संबंधों की उलझन भरी गाँठों को सुलझाने के सफल प्रयास करके अपनी सशक्त भाषा में एक से एक उत्कृष्ट कृतियाँ रची हैं। मोहन राकेश की भाषा में वह सामर्थ्य है जो समकालीन जीवन के तनाव को पकड़ सके। शब्दों का चयन, उनका क्रम, संयोजन- सब कुछ बहुत ही संपूर्णता से लेखक के अभिप्रेत को व्यक्त करता है। लेखक का मानना है कि जीवन में संपूर्णता की आशा करना व्यर्थ है और जो ऐसा करते हैं उनके हाथ निराशा ही लगती है। 

मोहन राकेश : जीवन परिचय

जन्म

८ जनवरी १९२५ जंडीवाली गली, अमृतसर 

निधन 

३ दिसंबर १९७२ दिल्ली 

शिक्षा

संस्कृत में शास्त्री, अँग्रेज़ी, हिंदी और संस्कृत में एमए

व्यवसाय

अध्यापन, संपादन(सारिका) और आजीवन स्वतंत्र लेखन

साहित्यिक रचनाएँ

उपन्यास

  • अंधेरे बंद कमरे

  • अंतराल

  • न आने वाला कल

  • कई एक अकेले

  • काँपता हुआ दरिया

  • स्याह और सफेद

  • गुंझल

नाटक

  • आषाढ़ का एक दिन

  • लहरों के राजहंस

  • आधे-अधूरे

  • पैर तले ज़मीन

  • रात बीतने तक

अनूदित
  • शाकुंतल

  • मृच्छकटिक

एकांकी

  • अंडे के छिलके

  • अन्य एकांकी

  • बीज नाटक

कहानी संग्रह

  • क्वार्टर

  • पहचान

  • वारिस

  • एक घटना

निबंध

  • बकलम ख़ुद

  • परिवेश

यात्रावृत्त

  • आखिरी चट्टान तक

अन्य रचनाएँ

  • एकत्र 

  • बिना हाड़-मांस के आदमी

  • बालोपयोगी कहानी संग्रह

  • मोहन राकेश रचनावली (तेरह खंडों में)

पुरस्कार व सम्मान

  • सर्वश्रेष्ठ नाटक और नाटककार – संगीत नाटक अकादमी

  • नेहरू फैलोशिप

  • फ़िल्म वित्त निगम का निदेशकत्व

  • फ़िल्म सेंसर बोर्ड के सदस्य


संदर्भ

  • विकिपीडिया

  • आषाढ़ का एक दिन लहरों के राजहंस, आधे-अधूरे, अंधेरे बंद कमरे – मोहन राकेश

  • हिंदी उपन्यास का इतिहास - गोपाल राय

  • हिंदी रंगमंच के अग्रदूत - डॉ० गिरीश सोलंकी

  • स्वातंत्र्य युग के हिंदी उपन्यास - डॉ० अरुणा अजितसरिया एम बी ई 

  • Shyamanand Jalan, A pictorial Tribute - Dr Madhuchhanda Chatterjee

लेखक परिचय

डॉ० अरुणा अजितसरिया

एम बी ई, देश-विदेश के हिंदी, अँग्रेज़ी और फ्रेंच साहित्य के अध्ययन और समीक्षा में रुचि रखती हैं।

संप्रति केम्ब्रिज विश्वविद्यालय की अंतरराष्ट्रीय शाखा में हिंदी की मुख्य परीक्षक और प्रशिक्षक के रूप में कार्यरत हैं।

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कलेंडर जनवरी

Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat
            1वह आदमी उतर गया हृदय में मनुष्य की तरह - विनोद कुमार शुक्ल
2अंतः जगत के शब्द-शिल्पी : जैनेंद्र कुमार 3हिंदी साहित्य के सूर्य - सूरदास 4“कल जिस राह चलेगा जग मैं उसका पहला प्रात हूँ” - गोपालदास नीरज 5काशीनाथ सिंह : काशी का अस्सी या अस्सी का काशी 6पौराणिकता के आधुनिक चितेरे : नरेंद्र कोहली 7समाज की विडंबनाओं का साहित्यकार : उदय प्रकाश 8भारतीय कथा साहित्य का जगमगाता नक्षत्र : आशापूर्णा देवी
9ऐतिहासिक कथाओं के चितेरे लेखक - श्री वृंदावनलाल वर्मा 10आलोचना के लोचन – मधुरेश 11आधुनिक खड़ीबोली के प्रथम कवि और प्रवर्तक : पं० श्रीधर पाठक 12यथार्थवाद के अविस्मरणीय हस्ताक्षर : दूधनाथ सिंह 13बहुत नाम हैं, एक शमशेर भी है 14एक लहर, एक चट्टान, एक आंदोलन : महाश्वेता देवी 15सामाजिक सरोकारों का शायर - कैफ़ी आज़मी
16अभी मृत्यु से दाँव लगाकर समय जीत जाने का क्षण है - अशोक वाजपेयी 17लेखन सम्राट : रांगेय राघव 18हिंदी बालसाहित्य के लोकप्रिय कवि निरंकार देव सेवक 19कोश कला के आचार्य - रामचंद्र वर्मा 20अल्फ़ाज़ के तानों-बानों से ख़्वाब बुनने वाला फ़नकार: जावेद अख़्तर 21हिंदी साहित्य के पितामह - आचार्य शिवपूजन सहाय 22आदि गुरु शंकराचार्य - केरल की कलाड़ी से केदार तक
23हिंदी साहित्य के गौरव स्तंभ : पं० लोचन प्रसाद पांडेय 24हिंदी के देवव्रत - आचार्य चंद्रबलि पांडेय 25काल चिंतन के चिंतक - राजेंद्र अवस्थी 26डाकू से कविवर बनने की अद्भुत गाथा : आदिकवि वाल्मीकि 27कमलेश्वर : हिंदी  साहित्य के दमकते सितारे  28डॉ० विद्यानिवास मिश्र-एक साहित्यिक युग पुरुष 29ममता कालिया : एक साँस में लिखने की आदत!
30साहित्य के अमर दीपस्तंभ : श्री जयशंकर प्रसाद 31ग्रामीण संस्कृति के चितेरे अद्भुत कहानीकार : मिथिलेश्वर          

आचार्य नरेंद्रदेव : भारत में समाजवाद के पितामह

"समाजवाद का सवाल केवल रोटी का सवाल नहीं है। समाजवाद मानव स्वतंत्रता की कुंजी है। समाजवाद ही एक सुखी समाज में संपूर्ण स्वतंत्र मनुष्यत्व...