Sunday, October 2, 2022

सेनापति : ऋतु वर्णन का अजेय पथिक


संवत सत्रह सौ छ में सेइ सियापति पाय

सेनापति कविता सजी सज्‍जन सजौ सहाय।


ब्रजभाषा जिन कवियों पर गर्व कर सकती है, उनमें से एक सेनापति जी भी है। उन्‍होंने शृंगार, भक्ति, ऋतु वर्णन और श्‍लेष की चतुरंगणी सेना के सहारे कवित्त महल पर विजय प्राप्‍त की है। अंतर्साक्ष्‍यों के आधार पर उनके वंश तो का पता चलता है परंतु नाम व जन्‍म के बारे में स्‍पष्‍ट जानकारी नहीं हो पाती। सेनापति उनका उपनाम था। जन्‍म स्‍थान भी अनूप शहर (वर्तमान बुलंदशहर) अनुमानित है। परंतु स्‍पष्‍ट रूप से कोई प्रमाण नहीं मिलता है।


दीछित परसराम, दादौ है विदित नाम,

जिन कीने यज्ञ जाकी जग में बड़ाई है।

गंगाधर पिता गंगाधर की समान जाकौं,

गंगा तीर बसति अनूप जिन पाई है।।

महा जानि मानि विद्यादान हू कौं चिंतामनि,

हीरामनि दीछित तैं पाई पंडिताई है।

सेनापति सोई सीतापति के प्रसाद जाकी,

सब कवि कान दै सुनत कविताई है।।

सेनापति बहुत स्‍वाभिमानी प्रकृति के थे। यह स्‍वाभिमान उन्‍होंने अपने आराध्‍य के प्रति भी दिखाया है,

अपने करम की करि हौं ही निबहौंगो, 

तब हौं ही करतार, करतार तुम काहे के?


कष्‍ट के क्षणों में भी तुच्‍छ व्‍यक्तियों के सम्‍मुख याचना करना उन्‍हें स्‍वीकार नहीं था। आत्‍मसम्‍मान ही उनकी पूंजी थी। इसे दर्शाता एक पद देखिए, 

आदर के भूखे, रूखे रूख सौं अधिक रूखे,

दूखे दुरजन सौं न डारत बचन हैं।


रामरसायन के एक छंद से यह पुष्टि होती है कि मुसलमान दरबार में भी उनका अच्‍छा मान-सम्‍मान रहा। लेकिन सेनापति जी को वहाँ से भी विरक्ति हो गई। इसे बतलाता एक पद देखिए,

चारि बरदानि तजि पाई कमलेच्‍छन के

पाइक मलेच्‍छन को काहे को कहाइये।।


तत्कालीन समय में भी समाज में कुछ बुराइयाँ व्‍याप्‍त थी। तभी तो सेनापति के लिए अपने कवित्‍त की सुरक्षा एक विशेष चिंता थी। फलस्वरूप उन्‍होंने अपनी कविताएँ किसी राजा को यह कहते हुए सौंप दी,

सुनु महाजन चोरी होति चारि चरन की 

तातैं सेनापति कहै तजि करि ब्‍याज कौं।

लीजियों बचाइ ज्‍यौं चुरावै नाहि कोई सौंपी

वित्‍त की सी थाती मैं कवित्‍तन की राज कौ।।


सेनापति ने उस समय के अमीर और गरीब लोगों के रहन-सहन का वर्णन भी अपने काव्य में किया है। ग्रीष्‍म के प्रचंड प्रहार से बचने हेतु अमीर लोग अपने घरों में तहखाने बनवाते थे। इसका वर्णन निम्‍नानुसार है, 

जेठ नजिकाने सुधरत खसखाने तल

ताख तहखाने के सुधारि झारियत है।


अगहन मास की भीषण ठंड से बचने के उपायों का वर्णन, 

प्रात उठि आइबे कौं तेलहिं लगाइबे के

मलि मलि न्‍हीइबे को गरम हमाम है।

ओढ़िबे को साल, जे हिसाब हैं अनेक रंग

बैठिबे को सभा, जहाँ सूरज को धाम है। 


इसी तरह से गरीबों की दशा का वर्णन भी दृष्‍टव्‍य है,

धूम नैंने बहैं लोग आगि पर गिरे रहैं

हिय सो लगाइ रहैं नेंक सुलगाइ कै।


सेनापति राम के परम भक्‍त थे। परंतु उनकी रचनाओं में शिव, कृष्‍ण और गंगा की भक्ति संबंधी पद भी हैं। यहाँ तक कि राज दरबार से विरक्ति के बाद संपूर्ण संन्‍यासी जीवन उन्होंने वृदांवन में व्‍यतीत किया।

सेनापति चाहत है सकल जनम भरि

वृन्‍दावन की सीमा ते न बाहर निकसिबो।

राधा मन रंजन की शोभा नैन कंजन की,

माल भरे गुंजन की, कुजन कौं बसिबै।


कवित्‍त रत्‍नाकर में पाँच तरंगे हैं। पुनरावृत्ति वाले छंदों को छोड़कर कुल ३८४ छंद है। सेनापति ने शृंगार, वीर, रौद्र, भयानक और शांत रस में रचनाएँ की हैं। उन्‍होंने खुद लिखा है,

सरस अनूप रस रूप यामैं द्युति है।


सौंदर्य वर्णन में कवि ने बड़ी मौलिकता से काम लिया है। अतः बहुत सजीव वर्णन देखने को मिलता है। नायिका के बालों की सुंदरता का वर्णन करते हुए वे लिखते हैं,

कालिंदी की धार निरधार है अधर, गन

अलि के धरत जा निकाई के न लेस हैं।

जीते अहिराज खंडि डासरे हैं शिखंडि घन,

इंद्रनील कीरति कराई नाहि ए सहैं।।


नायिका के बाल यमुना की धार के समान सुंदर हैं। शेषनाग और मोर का घमंड भी उसके बालों को देखकर टूट जाता है। इंद्रनील मणि की सुंदरता नायिका के बालों के सामने कुछ नहीं हैं। कामदेव भी नायिका पर आकृष्‍ट है। 

सेनापति ने वय स‍ंधि, खंडिता और मुग्‍धा नायिका का वर्णन बड़े मनोयोग से किया है। खंडिता नायिका का वर्णन करते समय शृंगार में बाघिनी तक का प्रसंग ला देते हैं,

करि डारी छाती घोर घाइन से राती-राती

मोहि धौं बतावौ कौंन भॉति छूटि आए हौ।।

कीने कौन हाल! वह बाघिनि है बाल! ताहि

कोसति हौं लाल जिन फारि-फारि खाए हौ।।


अन्‍य रीतिकालीन कवियों की भाँति सेनापति ने भी परकीया का विशेष चित्रण किया है, पर स्‍वकीया का महत्‍व कायम रखा है। 'प्रौढ़ा स्‍वाधीनपतिका' के वर्णन में स्‍वकीया की सुकुमार भावना देखने योग्‍य है, 

फूलन सौं बाल की बनाइ गुही बेनी लाल

भाल दीनी बैंदी मृगमद की असित है।

चूमि हाथ-नाथ के लगाइ रही आँखिन सौं

कही प्रानपति यह अति अनुचित है।


इनका ध्‍यान वियोग शृंगार की ओर अधिक रहा है। विरह वर्णन प्रवास हेतुक और विरह हेतुक है। कहीं-कहीं ईर्ष्‍या हेतुक वर्णन भी मिलता है। कवि ने जिन भावों का समावेश किया है, उन्‍हें सरलता और स्‍वाभाविक रूप से निभाया है। 

इतनी कहत आंसू बहत, फरकि उठी

लहर-लहर दृग बाईं ब्रज बाल की।


बांई आँख फड़कना शुभ माना जाता है, जिसका वर्णन उपरोक्‍त उदाहरण में कवि ने किया है और इसी के साथ हर्ष की व्‍यंजना भी की है। सेनापति ने विरहकाल की साधारण परिस्थितियों का ही वर्णन किया है। इस कारण यह स्‍वाभाविक होते हुए भी अपूर्ण रह गया। अलंकार प्रियता के कारण विरह वर्णन को क्षति पहुँची है। श्‍लेष उनका प्रिय अलंकार है। श्‍लेष का यह उदाहरण हिंदी साहित्‍य में ढू़ँढने से भी न मिलेगा,

नाही नाही करैं थोरी मांगे सब देन कहैं

मंगन को देखि पट देत बार-बार हैं।


उनके श्‍लेष और द्विअर्थी कवित्‍त देखते ही बनते हैं,

देखत नई है गिरि छतियाँ रहे हैं कुच

निरखी निहारि आछे मुख में रहन है।

बरसनि सोरहे नवासी एक आगरी है

मंद ही चलति भरी जीवन मदन है


उपरोक्‍त पंक्तियों का अर्थ दो पक्षों में देखा जा सकता है, 

युवा पक्ष में - देखने में नवीन है। कुच पर्वताकार हैं। मुख में दाँत हैं। निपुण है। यौवन के मद से पूर्ण है। सोलह वर्ष की है।

वृद्धा पक्ष में - देखने में झुकी हुई है। कुच गिर गए है। मुख में दाँत नहीं हैं। नब्‍बे वर्ष की है। धीरे-धीरे चलती है। यौवन का मद नहीं है।


सेनापति के बिंब अनूठे हैं। राम-रावण युद्ध के समय राम का बाण निकालना, साधना और चलाना शीघ्रता से होता है, 

काढ़त निषंग तैं न साधत सरासन मैं,

खैंचत, चलावत, न बान पेखियत है।


क्‍वांर महीने की वर्षा का बिंब देखते ही बनता है। छोटे-छोटे सफेद रंग के बादल फटिक शिला जैसे दिखाई देते है और पूरे दिगमंडल में विस्‍तृत हैं।

खंड-खंड सब दिगमंडल जलद सेत,

सेनापति मानौ सृंग फटिक पहार के।


भाव व्‍यंजना हेतु यह आवश्‍यक है कि जिस भाव का वर्णन किया जा रहा हो उससे कवि अच्‍छी तरह परिचित हो।


सेनापति मानव जीवन की सुकुमार भावनाओं की अपेक्षा उत्‍साह पूर्ण वीरोल्‍लास से अधिक अनुरक्‍त थे। उनकी इस प्रवृत्ति के दर्शन राम-कथा के वर्णन में प्राप्‍त होते है। राम-कथा की विशदता की ओर उनका ध्‍यान गया था, पर उन्होंने कुछ अंशों का ही वर्णन किया है। कवि का ध्‍यान राम, रावण और हनुमान के शौर्य तथा पराक्रम की ओर ही था, इसलिए भरत मिलाप जैसे संवेदनशील प्रसंग और शोक के सभी प्रसंगों को उन्‍होंने छोड़ दिया है। सेनापति ने युद्ध की तैयारियों का वर्णन बड़े मनोयोग से किया है। उन्‍होंने राम और रावण का समान उत्‍कर्ष दिखाकर इस वर्णन को बिलकुल सजीव कर दिया है,

इत बेद बंदी बीर बानी सौं बिरद बोलैं।

उत सिद्ध विद्याधर गाइ रिझावत हैं।

इत सुर राज उत ठाढ़े हैं असुर राज

शीश दिगपाल भुवपाल नवावत हैं।।


सेनापति राम की दानवीरता पर भी लिखते हैं, उन्‍होंने रावण की लंका विभीषण को दे दी है और विभीषण की संका रावण को दे दी है। वे राम नाम का मंत्र लेने हेतु गंगा स्‍नान कर शिव जी की शरण में जाते हैं।

बनारसी जाइ मनिकर्निका अन्‍हाइ मेरौ

संकर तैं राम-नाम पढि़बे को मन है।


सेनापति की भक्ति भावना में हृदय की तल्‍लीनता और अनुभूतियों की सच्‍चाई है। अपनी भक्ति भावना के कारण उन्‍होंने उस स्‍तर को प्राप्‍त कर लिया था, जहाँ संसारिक यातनाएँ मनुष्‍य के लिए कोई महत्‍व नहीं रखती हैं। वे कलिकाल से कहते हैं, "तू मेरा कोई अपकार नहीं कर सकता है। भगवान के दरबार में मेरी पैठ हो गई है। मुझे माता जानकी और लक्ष्‍मण जी अच्‍छी तरह पहचानते हैं। विभीषण और हनुमान मेरे सामने अभिमान त्‍याग देते हैं।" 


मोहि महाराज आप नीके पहिचानैं रानी

जानकीयो जानैं हेतु लछन कुमार को

विभीषण हनुमान तजि अभिमान मेरो

करै सनमान जानि बड़ी सरकार को।


संस्‍कृत साहित्‍य से आती हुई परंपरा "ऋतु वर्णन" का निर्वाह सेनापति ने भी किया है। उन्‍होंने प्रकृति का उद्दीपन रूप में चित्रण किया है। सेनापति का कवित्त वर्णन सिर्फ परंपरा न होकर मौलिक भी है। इनके ऋतु वर्णन में वास्‍वविकता है, जो सामाजिक परिस्थितियों से बहुत प्रभावित है। ग्रीष्‍म ऋतु का इनका स्‍वतंत्र अवलोकन दृष्‍टव्‍य है। जहाँ पवन भी ठंडे स्‍थान को देखकर कुछ समय के लिए विश्राम करने बैठ जाती है, 

वृष को तरनि तजे सहसौं किरन करि

ज्‍वालन के जाल विकराल बरसत है।

तचति धरनि जग जरत झरनि सीरी

छाँह को पकरि पंछी पंथी बिरमत हैं।

सेनापति नैक दुपहरी के ढरत होत

धमका विषम जो न पात खरकत हैं।

मेरे जान पौनैं सीरी ठौर को पकरि कौनौं

घरी एक बैठि कहूँ घामे वितवत है।


सेनापति का अन्‍य ग्रंथ 'काव्‍य कल्‍पद्रुम' अप्राप्‍त है। हो सकता है उसमें विशिष्‍ट पद रचना रीति का निर्वाह किया गया हो। 'कवित्त रत्‍नाकर' की फुटकर रचनाएँ भक्‍त और शृंगारी कवियों की रचनाओं के साथ रखी जा सकती हैं। किंतु काव्‍य की बहिरंग दृष्टि से उन्हें रीति ग्रंथकारों की कोटि में रखा जा सकता है। उनकी भाषा उनके हृदय से निकले हुए उद्गारों से ओत-प्रोत है। उनकी भाषा का सौंदर्य भावों की तन्‍मयता के फलस्‍वरूप न होकर अलंकारों की तड़क-भड़क के कारण भी है। सेनापति बहुत भावुक कवि थे। ब्रजभाषा में दक्ष होने के कारण उन्होंने साधारण से साधारण शब्‍दों में भी बहुत सुंदर रचना की है और श्लिष्‍ट काव्‍य लिखने में अपूर्व सफलता प्राप्‍त की है। कम मात्रा में संस्‍कृत के तत्‍सम शब्‍दों का कुछ फारसी शब्‍दों (पाइपोश, ज्‍यारी, रुख) और कुछ अरबी शब्‍दों (अरस, लिबास, इतबार) का प्रयोग किया है। प्रादेशिकता और उच्‍चरण की दृष्टि से इनकी भाषा खड़ी बोली के नजदीक है। प्रसाद गुण में भी कुछ छंद मिल जाते है। ओज गुण में तो निपुण ही हैं। इसके अतिरिक्त उनकी सुव्‍यवस्थित और परिमार्जित भाषा में अभिधा शब्‍द शक्ति प्रधान है। 


आचार्य रामचंद्र शुक्‍ल जी के अनुसार, "भाषा पर ऐसा अधिकार कम कवियों का देखा जाता है। अनुप्रास और यमक की प्रचुरता होते हुए भी कहीं भी भद्दी कृत्रिमता नहीं आने पाई है।"  


शुक्‍लजी के अनुसार, "इनकी कविता बहुत मर्मस्‍पर्शी और रचना बहुत ही प्रौढ़ एवं प्रांजल है। जैसे एक ओर इनमें पूरी भावुकता थी वैसे दूसरी ओर चमत्‍कार लाने की बड़ी निपुणता थी।"


सेनापति : जीवन परिचय

जन्‍म 

१५८४-८८  ई०,  अनुमानित

निधन

१६४९ ई०,  अनुमानित

दादा

परशुराम दीक्षित

पिता

गंगाधर दीक्षित

गुरु

हीरामणि दीक्षित

साहित्यिक रचनाएँ

  • कवित्‍त रत्‍नाकर (संवत १७०६)

  • काव्‍य कल्‍पद्रुम (अप्राप्‍त)


संदर्भ

  • कवित्त रत्‍नाकर

लेखक परिचय

रत्‍नेश कुमार द्विवेदी

मध्‍यप्रदेश भारत के उच्‍चतर माध्‍यमिक विद्यालयों में १६ वर्षों से हिंदी भाषा अध्‍यापक के रूप में कार्यरत।

ईमेल - ratnesh2016satna@gmail.com
व्हाट्सएप - +91 8878197950

Saturday, October 1, 2022

विद्यासागर नौटियाल : पहाड़ों की साहित्यिक सैर


पहाड़ की सुंदरता पर्यटकों के लिए जितनी रोमांचक होती है, उतना ही दुष्कर होता है वहाँ का जन-जीवन। इस जन-जीवन को करीब से देखने-समझने की जिज्ञासा रखने वालों के लिए रचा गया है, विद्यासागर नौटियाल का साहित्य। पहाड़ की गोद में मोद भरे बालक की तरह बैठे रहने वाले नौटियाल जी कहते हैं, "पहाड़ दरअसल वैसा नहीं है, जैसा वह दो घड़ियों के अपने जीवन को पहाड़ पर बिताने वाले सैलानियों को दिखाई देता है। पूर्णमासी का, शरद का चाँद घने जंगल में अपनी रौशनी डालता है तो उसकी झलक मात्र से जीवन धन्य लगता है। सूरज, नदियाँ, घाटियाँ और इन पहाड़ों में बसने वाले लोग, ये सब शक्ति देते हैं। उच्च शिखरों पर बुग्यालों के रंगीन कालीन के ऊपर बैठकर एक क्षण के लिए सूर्य की किरणों के दर्शन जीवन को सार्थक करने लगते हैं। लेकिन इन पहाड़ों के भीतर जीवन विकट है। याद रखना चाहिए कि इस हिमालय में पांडव भी गलने आए थे। मैं इस विकट पहाड़ में रम-बस गया। इसे छोड़कर कहीं बाहर भाग जाने की बात नहीं सोची। अपनी रचनाओं में मैं इस पहाड़ की सीमाओं के अंदर घिरा रहा। टिहरी के बाहर नहीं निकला। निकलूँगा भी नहीं।"

भागीरथी के तट पर बसे मालीदेवल गाँव में जन्मे विद्यासागर नौटियाल साहित्य जगत को अपना कहानी संग्रह सौंपते हुए कहते हैं, "पाठकों और पात्रों के जनतंत्र में निर्वाचित होकर आई ये कहानियाँ आपकी सेवा में पेश हैं।"

टिहरी गढ़वाल के पुत्र नौटियाल जी के साहित्य में कितना गढ़वाल है, कितना वहाँ का समाज और कितनी राजनीति, इसका सही-सही प्रतिशत बता पाना बहुत मुश्किल है। स्वतंत्रता के बाद भी टिहरी रियासत सामंती शासन के अंतर्गत आती थी। उसके खिलाफ हुए जन संघर्ष में नौटियाल जी की सक्रिय भूमिका रही और इस तरह छात्र जीवन से ही उनकी राजनीतिक यात्रा भी शुरू हो गई। इसके बाद तो सामंती शासन के विरुद्ध चलाए जाने वाले आंदोलनों और फिर आम जनता के दैनंदिन सवालों पर कम्युनिस्ट पार्टी की ओर से किए जाने वाले संघर्षों में भाग लेने के कारण जेल यात्राएँ भी हिस्से में आई। 

जैसा कि अमूमन प्रत्येक रचनाकार के साथ होता है, नौटियाल जी के लेखन की शुरुआत तुकबंदी से हुई। लेकिन कविता लेखन के तकनीकी पहलुओं से वे खुद को अनजान बताते रहे।

१९५२ में काशी हिंदू विश्वविद्यालय आने पर इनकी मित्रता केदारनाथ सिंह से हुई जो हिंदी साहित्य के एक सुपरिचित कवि थे। केदारनाथ की कविताओं को सुनने के बाद उन्हें लगा कि कविता लेखन की प्रतिभा उनसे कहीं दूर निवास करती है और वे अपना ध्यान केवल कहानियों पर ही केंद्रित करने लगे। 

प्रेमचंद और जयशंकर प्रसाद की कहानियाँ पढ़ते-पढ़ते नौटियाल जी अपने आसपास होती घटनाओं से विचलित होने लगे। और जब वे घटनाएँ हृदय को झकझोरने लगतीं तो नौटियाल जी की लेखनी से शब्दों का आकार लेकर साहित्यिक पृष्ठों पर आ उतरती।

१९५० के आसपास नौटियाल जी ने अपनी पहली कहानी 'मूक बलिदान' लिखी। इस बारे में पूछने पर वे कहते हैं, "कहानी के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। कहानी के तकनीकी पहलुओं के बारे में आज भी शून्य हूँ। इसलिए कहानी लिख देता हूँ पर कहानी के बारे में कहीं लिखने से डरता हूँ। अपने अज्ञान को ढ़क कर रखना ठीक होता है।"

अपनी रचनाओं की भूमिका लिखने में नौटियाल जी असहजता महसूस करते हैं। वे कहते हैं, "मेरा मानना है कि लेखक को अपनी पूरी बात रचना में दे देने की कोशिश करनी चाहिए। उसके नुक्स निकालने या भाष्य करने का भार विद्वान समीक्षकों-आलोचकों पर छोड़ देना चाहिए। पाठकों के सामने सही बातों का खुलासा कर देने में मुझे कोई हर्ज़ नहीं मालूम होता।" साहित्य में ऐसी सहजता नौटियाल जी को जनप्रिय बनाती है। 

काशी हिंदू विश्वविद्यालय में नौटियाल जी को डॉ० नामवर सिंह, डॉ० बच्चन सिंह, शिवप्रसाद सिंह और रामदरश मिश्र जैसे गुरुओं का सानिध्य मिला तो वहीं त्रिलोचन शास्त्री, विष्णुचंद्र शर्मा, केदारनाथ सिंह, विश्वनाथ त्रिपाठी जैसे साहित्यकारों की मित्रता इनके लेखन को गति देने लगी। यहाँ वे प्रगतिशील लेखक संघ की बैठकों में सम्मिलित होने लगे। १९५४ में जब नौटियाल जी की कहानी 'भैंस का कट्या' हिंदी साहित्य की प्रतिष्ठित पत्रिका 'कल्पना' में छपी तो एक कथाकार के रूप में उनका परिचय काशी से बाहर भी हो गया।

१९५९ में टिहरी लौटने पर नौटियाल जी साहित्य से पूरी तरह से दूरी बनाते हुए पूर्णकालिक राजनीतिक जीवन की शुरुआत करते हैं। इस दौरान उनकी लेखनी भले ही शांत रही हो, लेकिन वास्तव में वे अनुभवों की स्याही जमा कर रहे थे। टिहरी से राजशाही का अंत और भारत-चीन युद्ध की घटनाओं के बीच वे निरंतर पदयात्राएँ कर रहे थे। इस तरह आम जन की समस्याओं को करीब से देखते हुए समझा। उन्होंने कई चुनाव लड़े और १९८० में देवप्रयाग से उत्तर प्रदेश विधानसभा के सदस्य चुने गए। राजनीतिक क्षेत्र में सक्रिय रहते हुए भी उन्होंने आम जनता का प्रतिनिधित्व किया। वन आंदोलन, चिपको आंदोलन और टिहरी बांध विरोधी आंदोलन में वे जनता के पक्ष में खड़े दिखाई दिए। उत्तराखंड के दस साल पूरे होने पर स्थितियों का आकलन करते हुए उन्होंने कहा, "राज्य बनने से इतना ही फर्क पड़ा कि बड़े माफ़िया की जगह छोटे माफिया ने ले ली।"

एक ओर जहाँ वे राजनीतिज्ञों के साहित्यिक अज्ञान को स्पष्ट रेखांकित करते हैं तो वहीं लोकतंत्र की परिभाषा को साहित्य से जोड़ते हुए भी दिखाई देते हैं। जैसे राजनीति में कोई प्रत्याशी निज को कितना ही योग्य क्यों न समझे, निर्वाचित तभी हो पाएगा जब मतदाता भी उसे योग्य समझे इसलिए अपनी पसंद को गौण मानकर लोकतंत्र के अनुशासन का पालन करते हुए वे अपनी रचनाओं में पात्रों के दबाव और पाठकों की पसंद का ध्यान रखते हैं।

टिहरी बांध परियोजना में अपनी ज़मीन से बिछड़े नौटियाल जी साहित्य के जरिए फिर टिहरी लौटे और अपनी लेखनी में वही अनुभवों की स्याही भरी जो उन्होंने अपनी राजनीतिक सक्रियता के समय सहेजी थी। इस स्याही का रंग यथार्थ की कड़ी धूप में खूब पका हुआ था। 

स्मृति की ऊर्जा और आत्मीयता में आकार लेता नेत्र सिंह रावत का यात्रा वृतांत 'पत्थर और पानी' नौटियाल जी की प्रेरणा बना और स्मृतियों के अद्भुत दस्तावेज़ 'भीम अकेला' की रचना हुई जो नैनीताल से प्रकाशित होने वाली पत्रिका 'पहाड़' के तीसरे अंक में छपा। यह दो दिनों की यात्रा का वर्णन है जो उन्होंने उत्तर प्रदेश विधानसभा का सदस्य रहते हुए टिहरी स्वतंत्रता संग्राम में शहीद हुए मोलाराम भरदार और तेज सिंह भरदार के क्षेत्र में की थी। इस संस्मरण के बाद शासन ने शहीद मोलाराम की विधवा के साथ दुर्व्यवहार करते हुए उनकी पेंशन रोक ली, जिन्होंने सरकार से मिला दो हजार रुपए का अनुदान भी जुनियर हाई स्कूल की स्थापना हेतु दान कर दिया। करीब चार वर्ष बाद यह संस्मरण पुस्तक रूप में निकला जिसकी भूमिका में नौटियाल जी ने सूरमा देवी को जीवित शहीद मानते हुए लिखा, "यह अंधी वीरांगना समाज के कुल जहर को घोल-घोल कर पी गई है। महाशिवरात्रि के दिन मैं उसकी गाथा लिखने बैठा हूँ। गरल पीकर शिव नीलकंठ हो गए, सतूरी अंधी। सतूरी देवी की यह कथा भीम अकेला का उपसंहार है।" 'सूरज सबका है' ऐतिहासिक कलेवर में रची गई लोक मानस की रचना है, तो 'झुंड के बीच' मिथकों, किवदंतियों, रूढ़ियों और अंधविश्वासों की बेड़ियों में लिपटे पर्वतीय जन-जीवन की त्रासदी है। 'उत्तर बयाँ है' की शैली में पर्वतीय क्षेत्र की प्रकृति समाई है तो 'यमुना के बागी बेटे' १९३० के आसपास घटी कुछ ऐसी ऐतिहासिक घटनाओं को संजोए है जिन्हें कभी इतिहास ने दर्ज ही नहीं किया। अपने जन्म के तीन साल पहले घटित तिलाड़ी कांड की दारुण कथाएँ उन्हें विचलित करती थी। इस छोटे से उपन्यास की सामग्री वे १९६४ से ही एकत्रित करने लगे थे। इसके लिए उन्होंने कुछ भुक्तभोगी रंवाल्टों सैनिक कार्यवाहियों में शामिल एक सिपाही और कुछ अन्य प्रत्यक्ष दर्शियों से भेंट कर उनके साक्षात्कार भी दर्ज किए। नौटियाल जी अपनी कहानियों के माध्यम से जब आम जन मानस की संवेदनाओं के चित्र उकेरते हैं, तो लगता है जैसे वे पात्रों के मन-मस्तिष्क का पूर्ण निरीक्षण कर आए हों। उनकी कहानियों के विचार पात्रों के कद से बड़े होकर अपना निजी अस्तित्व तय करते हैं। नौटियाल जी कहते हैं, "अपने लोगों की यह कथा जिसे अनेक वर्षों तक मैंने अपने भीतर जिया है, अपने को अपने समाज का ऋणी मानते हुए उससे उऋण होने की छटपटाहट में लिखता हूँ, साहित्य मेरे लिए मौज-मस्ती का साधन नहीं, जिंदगी की ज़रुरत है। लेखन के काम को मैं एक फ़र्ज़ की तरह अंजाम देता हूँ। किसी प्रकार की हड़बड़ी के बगैर लिखता हूँ और किसी की फ़रमाइश पर नहीं लिखता। जो मन में आए वह लिखता हूँ। सिर्फ़ वही लिखता हूँ।"

नौटियाल जी का साहित्य कोरी कल्पनाओं का साहित्य कतई नहीं है। इसकी जड़ें पहाड़ की ज़मीन से पोषण पाती हैं। पहाड़ी जीवन की वास्तविकता को परिभाषित करते इनके साहित्य में पीड़ा और संवेदना के वास्तविक दर्शन होते हैं। उनकी राजनीति में भी झुठी नारेबाजी नहीं बल्कि आम जन मानस के सुख-दुख में उनकी भागीदारी दिखाई देती है। उनकी सरलता उनकी समृद्धता की परिभाषा है।

साहित्यिक जगत को उत्कृष्ट सृजन की सौगात देने वाले विद्यासागर नौटियाल हिंदी भाषा की प्रगति को लेकर चिंतित रहे। उनका कहना था कि "हिंदी बोलने वाले लोग करोड़ों की संख्या में हैं, तो हैं। साहित्य से उनका कोई लगाव नहीं रहता। पुस्तकों के पाठक लाखों में भी नहीं। इस संबंध में प्रकाशकों की आलोचना हम सभी लोग करते रहते हैं। ज्यादातर सही आलोचना। लेकिन पूरे हिंदी समाज में पढ़े-लिखे, संपन्न लोगों के ऐसे कितने घर होंगे जहाँ हिंदी के दो-चार लेखकों की रचनाएँ भी मौजूद हों। चंद साहित्यकारों के अलावा ऐसे कितने सामान्य घर होंगे जिनमें अतिथियों, रिश्तेदारों के सामान्य मिलन के अवसरों पर साहित्य की और लेखकों की चर्चा होती हो। हिंदी में ऐसी कोई संस्कृति अभी जन्म नहीं ले पाई।"

पर्वतीय सरोकारों के सफल साहित्यकार विद्यासागर नौटियाल ने भले ही एक से बढ़ कर एक कहनियों से हिंदी साहित्य को समृद्ध किया हो लेकिन उनका कहना था कि ज़िंदगी की कहानी से बढ़ कर कोई कहानी नहीं हो सकती। बेंगलुरु में १८ फरवरी २०१२ को उनकी यह कहानी भी अनंत आकाश में प्रकाशित हो गई।

मशहूर साहित्यकार लीलाधर जगूड़ी शोकाकुल हो कहते है, "वे काफी ऊर्जावान साहित्यकार थे। उनका जाना इसलिए भी दुर्भाग्यपूर्ण है कि काफी कुछ अधूरा रह गया। वे अभी भी लिख ही रहे थे और उनके पास लिखने के लिए काफी कुछ था। उनसे काफी उम्मीदें थी। पहाड़ के जीवन और समाज का जैसा चित्रण उन्होंने किया वह दुर्लभ है।"

सुपरिचित कवि मंगलेश डबराल ने उनके निधन पर गहरा शोक प्रकट करते हुए कहा, "उनके दो बड़े योगदान हैं वामपंथी आंदोलन की स्थापना और सामंतवाद विरोधी आंदोलन। उनकी रचनाओं में प्रेमचंद की यथार्थवादी परंपरा का सार्थक विस्तार मिलता है। वे पहाड़ के प्रेमचंद थे।"

विद्यासागर नौटियाल : जीवन परिचय

जन्म

२९ सितंबर १९३३, मालीदेवल गाँव, टिहरी गढ़वाल, उत्तराखंड

निधन

१८ फरवरी २०१२, बैंगलोर, कर्नाटक

पिता

नारायण दत्त, वन अधिकारी

माता

रत्ना नौटियाल

शिक्षा

  • दसवीं - प्रताप इंटर कॉलेज, टिहरी

  • बारहवीं - डीएवी कॉलेज, देहरादून

  • एमए (अंग्रेज़ी साहित्य) - काशी हिंदू विश्वविद्यालय

कार्यक्षेत्र

  • लेखन कार्य १९४९-१९६०
  • राजनीति १९६०-१९९०
  • पुनः लेखन

साहित्यिक रचनाएँ

उपन्यास

  • उलझे रिश्ते

  • भीम अकेला

  • सूरज सबका है

  • उत्तर बायां है

  • यमुना के बागी बेटे

  • झुंड से बिछुड़ा

  • सुच्ची डोर

  • मेरा जामक वापस दो

  • सरग दद्दा! पाणि पाणि

कहानी संग्रह

  • टिहरी की कहानियाँ

  • मेरी कथा यात्रा

ललित लेख

  • मोहन गाता जाएगा

  • कुदरत की गोद में

  • बागी टिहरी! गाए जा

संपादन

  • वर्सिटि बॉयज (पत्रिका)

  • वीरेंद्र सकलानी (जीवनी)

सम्मान व पुरस्कार

  • पहल साहित्यिक सम्मान, २०००

  • इफ्को साहित्य सम्मान

  • पहाड़ सम्मान

  • वीर सिंह देव सम्मान, मध्यप्रदेश सरकार

संदर्भ

  • विद्यासागर नौटियाल की कहानियाँ
  • कविता कोश

लेखक परिचय

सृष्टि भार्गव

हिंदी विद्यार्थी
कुछ उलझनें सुलझाता
एक प्रयास छोटा-सा

प्रयासों के बीच
अवकाश छोटा-सा

....और इस अवकाश में भी बस साहित्य का दुलार है!
ईमेल - kavyasrishtibhargava@gmail.com 

आलेख पढ़ने के लिए चित्र पर क्लिक करें।

कलेंडर जनवरी

Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat
            1वह आदमी उतर गया हृदय में मनुष्य की तरह - विनोद कुमार शुक्ल
2अंतः जगत के शब्द-शिल्पी : जैनेंद्र कुमार 3हिंदी साहित्य के सूर्य - सूरदास 4“कल जिस राह चलेगा जग मैं उसका पहला प्रात हूँ” - गोपालदास नीरज 5काशीनाथ सिंह : काशी का अस्सी या अस्सी का काशी 6पौराणिकता के आधुनिक चितेरे : नरेंद्र कोहली 7समाज की विडंबनाओं का साहित्यकार : उदय प्रकाश 8भारतीय कथा साहित्य का जगमगाता नक्षत्र : आशापूर्णा देवी
9ऐतिहासिक कथाओं के चितेरे लेखक - श्री वृंदावनलाल वर्मा 10आलोचना के लोचन – मधुरेश 11आधुनिक खड़ीबोली के प्रथम कवि और प्रवर्तक : पं० श्रीधर पाठक 12यथार्थवाद के अविस्मरणीय हस्ताक्षर : दूधनाथ सिंह 13बहुत नाम हैं, एक शमशेर भी है 14एक लहर, एक चट्टान, एक आंदोलन : महाश्वेता देवी 15सामाजिक सरोकारों का शायर - कैफ़ी आज़मी
16अभी मृत्यु से दाँव लगाकर समय जीत जाने का क्षण है - अशोक वाजपेयी 17लेखन सम्राट : रांगेय राघव 18हिंदी बालसाहित्य के लोकप्रिय कवि निरंकार देव सेवक 19कोश कला के आचार्य - रामचंद्र वर्मा 20अल्फ़ाज़ के तानों-बानों से ख़्वाब बुनने वाला फ़नकार: जावेद अख़्तर 21हिंदी साहित्य के पितामह - आचार्य शिवपूजन सहाय 22आदि गुरु शंकराचार्य - केरल की कलाड़ी से केदार तक
23हिंदी साहित्य के गौरव स्तंभ : पं० लोचन प्रसाद पांडेय 24हिंदी के देवव्रत - आचार्य चंद्रबलि पांडेय 25काल चिंतन के चिंतक - राजेंद्र अवस्थी 26डाकू से कविवर बनने की अद्भुत गाथा : आदिकवि वाल्मीकि 27कमलेश्वर : हिंदी  साहित्य के दमकते सितारे  28डॉ० विद्यानिवास मिश्र-एक साहित्यिक युग पुरुष 29ममता कालिया : एक साँस में लिखने की आदत!
30साहित्य के अमर दीपस्तंभ : श्री जयशंकर प्रसाद 31ग्रामीण संस्कृति के चितेरे अद्भुत कहानीकार : मिथिलेश्वर          

आचार्य नरेंद्रदेव : भारत में समाजवाद के पितामह

"समाजवाद का सवाल केवल रोटी का सवाल नहीं है। समाजवाद मानव स्वतंत्रता की कुंजी है। समाजवाद ही एक सुखी समाज में संपूर्ण स्वतंत्र मनुष्यत्व...