Monday, May 30, 2022

एक अतरंगी शायर का सफ़रनामा

 

जनाब कृष्ण बिहारी "नूर" का ज़िक्र या फिर उनकी ज़िक्र-ए-शायरी की बातें करने से पहले किसी शायर का उर्दू का एक मिसरा बेसाख़्ता याद आ रहा है और इसी मिसरे से बातों का सिलसिला शुरू हो तो शायद "नूर" की कलम, मुख्तसर सोच और उनसे जुड़े जज़्बातों की पड़ताल आसान हो जाएगी।
"ख़ुदा ने मुझको ग़ज़ल का दयार बख़्शा है
मैं ये सल्तनत ज़माने के नाम करता हूँ।"

मैंने उपरोक्त शेर को बदलने की गुस्ताख़ी की है। मोहब्बत की जगह ज़माने का इस्तेमाल किया है क्योंकि "नूर" सिर्फ़ मोहब्बत के शायर नहीं थे। हकीकत में उन्हें दर्द का शायर कहना ज़्यादा मुनासिब होगा और दर्द तो ज़माने भर के पास होता है, वहीं मोहब्बत किस्मत वालों का शगल होता है। 

बहरहाल, लखनऊ उनका पैदायशी ठिकाना था, तालीम से नवाजे गए यूपी के शहरों में और बैरंग ख़तों के दफ़्तर (डेड लैटर ऑफिस या रिर्टन लैटर ऑफिस) में सेवानिवृत्ति तक ज़िंदगी के रंग तलाशते रहे उर्दू-हिंदी की तर्जुमानी के साथ और बन गए कृष्ण बिहारी श्रीवास्तव से कृष्ण बिहारी "नूर"!

नूर साहब का जन्म लखनऊ के गौस नगर इलाके में मध्य-वर्गीय कुलीन कायस्थ परिवार में हुआ था। कहावत है कि कायस्थ तकरीबन आधा मुसलमान होता है। यही वजह है उर्दू अदब से जुड़ी सारी खूबियों से एक कायस्थ पूरी तरह से लैस होता है। "कायस्थ और वो भी लखनवी कायस्थ"। तहज़ीब, खुलूस, सेल्फ रिस्पेक्ट रगे-जाँ में बसा हुआ था। सो रुकना और झुकना मंजूर नहीं था।

साधारण शिक्षा या काम चलाऊ शिक्षा का आप की रचनात्मकता से कोई लेना-देना नहीं होता है। अदब या साहित्य सिर्फ़ और सिर्फ़ इंसानी ज़िंदगी और उसके सदंर्भों, संघर्षों, मनोभावों को विस्तार देता चलता है। इसमें दस्तूर भी होते हैं, फितूर भी होते हैं, ज़िद भी होती हैं, विद्रोह भी होता हैं, कहीं ख्वाब, कहीं रिएलिटी, लाचारी, गुरबत, हौसला, ख़िलाफ़त, मुखालफ़त, समाज और वतन परस्ती का जज़्बा और न जाने क्या-क्या या कहें सब कुछ समाया होता है। यही वजह है कि यद्यपि कृष्ण बिहारी नूर उच्च शिक्षित तो नहीं थे, लेकिन उनकी शार्गिदी और स्वाध्याय साथ ही जीवन के उतार चढ़ावों ने उनकी बयानी में धार पैदा की। नज़ाकत और नफ़ासत के शहर लखनऊ की पैदाइश होने के बावजूद नूर अपनी तल्ख़ियों और ज़िम्मेदारियों से भरे जीवन से बहुत कुछ सीखते चले गए और उनके हर्फ मानीखेज़ होते चले गए।

पाँच बेटियों और एक बेटे के भरे पूरे परिवार के मुखिया थे, जनाब कृष्ण बिहारी नूर। रही बात लखनवी नज़ाकत और नफ़ासात की तो ये सब आराम तलबी, सुकुन, इत्मीनान की अदा हुआ करती है। नूर तो तल्ख़िए ज़िंदगी की बयानी कुछ अलग हटकर करते है क्योंकि उनकी तालीम का ज़्यादातर हिस्सा ज़िंदगी के मदरसे में हुआ था। 
बकौल नूर,
ज़िंदगी से बड़ी सज़ा ही नहीं,
और क्या जुर्म है पता ही नहीं।

पिछली सदी के पाँचवें, छठे और सातवें दशक मंचीय कवि सम्मेलनों और मुशायरों के दशक कहे जा सकते है। उर्दू-हिंदी की शेरों-शायरी और कविताओं का स्वर्णिम दौर भी कहा जा सकता है। क्योंकि इन दशकों के बाद जगजीत सिंह, अनूप जलोटा, पंकज उधास, मेंहदी हसन और गुलाम अली सहित और भी गुलुकारों ने अपनी खूबसूरत गलेबाजी से इस परंपरा को नया सौष्ठव दे दिया था। पर उन दशकों में तहत और तरन्नुम की शायरी का लोक-लुभावन दौर था। रात के आखिरी पहर तक चलने वाले मुशायरे और कवि सम्मेलनों ने कव्वाली की रातों को दरकिनार करना शुरू कर दिया था। 

यही कृष्ण बिहारी नूर का भी समय था। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक, सरहद के उस पार और सात समंदर पार भी, चलती भाषा में कहें तो वे मंच लूट लिया करते थे। रूमानी तबियत से लबरेज स्वर हों या जिस्मों-रूह के दर्द की बयानी, हिंदी में कहें तो 'वेदना के स्वर' ज्यादा बेहतर होगा, नूर कहीं भी मिसफिट नहीं थे। उनका एक शेर जो पिछली सदी के साठ और सत्तर के दशक में हवाओं में तैरता था और दशकों तक तैरता रहा। आज भी मोहब्बत के शौकीन, जी हाँ शौकीन लोगों को मुस्कराने पर मजबूर करता है। वैसे भी मोहब्बत को इबादत मानने वाले बहुत कम ही लोग बचे हों शायद।
मैं तो ग़ज़ल सुना के अकेला खड़ा रहा,
सब अपने-अपने चाहने वालों में खो गए।

ताज़िंदगी नूर साहब खुद को लखनऊ के ही फ़ज़ल नक्वीं साहब के शाग़िर्द मानते रहे। संगीत की परंपरा में कहें तो गंडा-ताबीज़ भले ही फ़ज़ल नक्वीं का हो पर खुद उन्होंने खूब पढ़ा, खूब सुना और खुद के नजरिए से जीस्त, दुनिया, खुदा और महबूब की नक्काशी की। नूर साहब ने रघुपति सहाय फिराक गोरखपुरी को अपना आइडिएल और महबूब शायर माना। उन्होंने इश्क़ मिजाजी और इश्क़ हकीकी के बीच का रास्ता चुना तभी उनके शेरों में कभी सूफियाना टच मिलता है तो कभी रूमानियत भरे जज़्बात। इसकी दो बानगी आप भी महसूस करें। 
आग है पानी है मिट्टी है हवा है मुझमें।
और फिर मानना पड़ता है ख़ुदा है मुझमें
आइना ये तो बताता है मैं क्या हूँ लेकिन
आइना इस पे है खामोश क्या है मुझमें।।

और रूमानी इंतहा 
अब तो बस जान देने की है बारी ऐ "नूर"
मैं कहाँ तक साबित करूँ वफा है मुझमें।
मैं कैसे और किस सिम्त मोड़ता खुद को,
किसी की चाह न थी दिल में, तेरी चाह के बाद।।

नूर साहब ने अपने दौर में भले ही शायरी को ताज़ा ख़यालात न दिए हों लेकिन खयालों की अंदाज़े बयानी बिल्कुल ताज़ा थी, आज भी ताज़ा है और शायद रहती दुनिया तक ऐसी ही रहेगी।
तमाम जिस्म ही घायल था, घाव ऐसा था,
कोई न जान सका, रख रखाव ऐसा था।

उर्दू ग़ज़लों के साथ-साथ हिंदी ग़ज़लों की बुनियाद में भी उनकी अहम भूमिका रही है। अंग्रेज़ी डिक्शन के साथ उनका ये शेर आसानी से जुबां पर चढ़ जाता है।
चाहे सोने के फ्रेम में जड़ दो
आइना झूठ बोलता ही नहीं

कहते हैं एक मुशायरे में फ़िराक साहब के तंज के चलते उन्होंने तरन्नुम में अपनी ग़ज़लों को पढ़ना छोड़ दिया और फिर सिर्फ उनकी तहत में पढ़ी गई ग़ज़लों ने अपना एक अलग सा मुकाम हासिल किया। उनके तहत की अदायगी किसी कहर से कम नहीं थी।

कहते हैं ग़ज़लों का सैकड़ों साल का इतिहास हैं। पर यदि 'मोमिन' और 'गालिब' से लेकर मुन्नव्वर राणा, मंजर भोपाली और राजेश रेड्डी तक पहुँची इस ग़ज़ल के सफर को देखें तो एक से बढ़कर एक शायर हुए है। सब अपने-अपने फन में माहिर। अपनी सलाहियत, अपनी अदायगी। जीवन के दार्शनिक विजन को अपने-अपने सायकोलाजिकल ट्रीटमेंट के जरिए अलग-अलग तरह से पेश किया। अपने समय को पहचान दी और पहचान हासिल भी की।

एक दौर ऐसा भी आया, ग़ज़लसराओं ने इन शानदार शायरों की ग़ज़लों को म्यूजिकल बना दिया। मंच-महफिल, नशिस्त से ग़ज़लों ने चौराहों की राह पकड़कर लोगों के ड्राइंग-रूम तक पैठ बनाना शुरू कर दिया। पर ग़ज़ल के शौकीन हमेशा मंच और शायर के लाइव परफॉमन्स या जीवंत प्रस्तुति के दीवाने बने रहे। यहाँ तक कि आज भी रतजगे वाले मुशायरों और कवि सम्मेलनों के दीवाने कस्बेनुमा शहर या फिर शहरनुमा कस्बों में अपनी दीवानगी के साथ दिखाई पड़ जाते हैं। जबकि इंटरनेट, सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफार्म, प्रिंट, पॉडकास्ट, ब्राडकास्ट आदि के जरिए सब कुछ बेहद सुलभ और सरलता से उपलब्ध हो गया है। लेकिन ये भी सच है आदमी की दिलचस्पी आदमी में होती है। यही वजह है सिर्फ शायर और शायरी ही नहीं शायरों की भाव-भंगिमाएँ, हाजिर जवाबी, सामयिक टिप्पणी और जुमलों का लुत्फ़ खुले आकाश के नीचे बने मंचों और डॉयस से ही बिखरता है। बेकल उत्साही, कुंवर बेचैन, नीरज, मंजर भोपाली, माया गोविंद, अंजुम रहवर बशीर बद्र, मुन्नवर राणा, वसीम बरेलवी, राहत इंदौरी जैसे और भी कई नामचीन प्रस्तोता इसी वजह से याद रहते है। कृष्ण बिहारी नूर उसी दौर में शायर थे। उनकी आवाज में एक्सप्रेशन थे, अदा थी। उन्होंने आगाज़ भले ही लखनऊ से किया हो पर उनकी आवाज, अंदाज़ और अदायगी ने राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर खूब वाह-वाही बटोरी। लखनऊ से दूर जाकर उन्होंने एक पहचान हासिल की, लेकिन ताज़िंदगी लखनऊ उनसे कभी जुदा नहीं हुआ। कभी मशहूर शायर मुनव्वर राणा ने उनके बारे में कहा था, "नूर चलता फिरता लखनऊ था। नूर जहाँ मौजूद होते थे लखनऊ की हजीब, लखनऊ की नज़ाकत, लखनऊ का प्यार सब मौजूद होता था।"

नूर ने तमाम उम्र लफ्ज़ों को संजीदगी, नज़ाकत और नफ़ासत से तराशकर उन्हें अशआरों में तब्दील किया। उनकी हर अदायगी और हर शेर में लखनवी नूर की रोशनी बरक्स दिखाई पड़ती है। तल्ख बात हो पर उनका लहज़ा हमेशा नरमों-नाज़ुक रहा। तबीयत से नूर एक खुशदिल शख्सियत, मुस्कराहट में खुलुस, पहनावा सादगी से भरा पर पहचान देता हुआ। 

लखनवी तहज़ीब उनके गोशे-गोशे में थी। बातों का सुकून भरा अंदाज़ उनकी समूची शख्सियत का रिफ्लेक्शन बन जाया करता था और प्रस्तुति ऐसी मानो चाशनी में घुली हुई, जोश और हिज्जे की फीलिंग्स और मंद-मंद मुस्कान या संक्षेप में कहें तो नूर से मंच रोशन हो जाता था।
मैं एक कतरा हूँ मेरा अलग वजूद तो है
हुआ करे जो समंदर मेरी तलाश में है।

या फिर 
मैं जिस हुनर में पोशीदा हूँ अपनी ग़ज़लों में
उसी तरह वो छुपा सारी कायनात में है।

जनाब कृष्ण बिहारी नूर खुद अपनी शायरी के बारे में कहते है, "हर बात को खूबसूरत ढंग से कहने का हुनर ही शायरी है फिर चाहे वो जज़्बात, हों ख़यालात हों या महसूसात और तर्जुबात हों।"
जिंदगी!. मौत तेरी मंजिल है
दूसरा कोई रास्ता ही नहीं
इतने हिस्सों में बँट गया हूँ मैं
मेरे हिस्से में कुछ बचा ही नहीं।

हिंदी साहित्य के तमाम वाद चाहे वो छायावाद हो या फिर रहस्य, प्रगति, आदर्श या फिर यर्थाथवाद हो नूर उन्हें सिर्फ दो मिसरों में ढाल देते थे। शायरी की ऐसी टकसाल थे नूर साहब :- मुलाहिजा फर्माइए

छायावाद- 
शाम जब रात की महफिल में कदम रखती है
भरती हैं माँग में सिंदूर सुहागन की तरह।
रहस्यवाद-
मैं तुम को जीत कर भी कहाँ जीत पाऊँगा
लेकिन मोहब्बतों का हुनर छोड़ जाऊँगा।
प्रगतिवाद-
कोई इंसान न मिला सारे अदाकार मिले
चैन मिल जाए जो थोड़ा भी कहीं प्यार मिले।
आदर्शवाद-
"नूर" का मज़हब है क्या सब देखकर हैरान हैं
हकपरस्ती, बुतपरस्ती, मयपरस्ती साथ-साथ
यर्थाथवाद -
सच बोलना अच्छा मगर ध्यान रहे "नूर"
कहते है ज़माने की हवा भी है कोई चीज।

"नूर" का हर शेर एक तस्वीर बनकर आँखों में उभरता है और रंगों की रोशनाई मजाज़ी और हक़ीक़ी दोनों सच एक साथ बेनकाब हो जाते है।
मैं तो अपने कमरे में तेरे ध्यान में गुम था।
घर के लोग कहते है सारा घर महकता था
या फिर
ये किस मुकाम पर ले आई जुस्तज़ू तेरी
कोई चराग नहीं और रोशनी है बहुत

उर्दू के और भी शायरों के कलाम और शेरों को नया कलेवर देने में उन्हें महारत हासिल थी। "नूर" ने जीते-जी ख़ूब दाद और इरशाद बटोरी वहीं ३० मई २००३ को दुनिया से रूखसत होने के बाद भी ये सिलसिला रुका नहीं है।
एक शख्सियत सिर्फ अपने कारनामों की बदौलत लोगों के दिलों में जीवित रह सकता है इसकी जीवंत मिसाल हैं, मरहूम कृष्ण बिहारी नूर। एक गंगा-जमुनी शायर जो हिंदी शब्दों और उर्दू लफ्ज़ों का कुशल चितेरा या कहें बाजीगर था। इंसानी जज़्बातों की गहरी पड़ताल में ताज़िंदगी मशरूफ रहा।
हीरे जवाहरात की महफिल को हो गुमान।
चुन चुन के लफ़्ज़ उसने यूँ मिसरे सजाए थे।।

बहरहाल, दुनिया से जाने कितने शायर विदा ले चुके है। जाने कितने शायर अपने शेरों से रोशनी बिखेर रहे है और न जाने कितने शायर आने वाले वक्त के गवाह बनेंगे। पर नूर की अपनी एक अलग सी रोशनी बरकरार रहेगी। उनके ख़यालों का अक्स उनकी याद दिलाता रहेगा। सदियाँ अपना सफर तय करती रहेंगी। पर लम्हें अपना वक्त दोहराते रहेंगे उनमें कुछ लम्हात कृष्ण बिहारी नूर के भी होंगे ।
अपनी रचनाओं में वो जिंदा है
"नूर" संसार से गया ही नहीं।

कृष्ण बिहारी नूर : जीवन परिचय

जन्म 

८ नवंबर १९२६, ग़ौस नगर, लख़नऊ, उत्तर प्रदेश

निधन

३० मई २००३, गाज़ियाबाद, उत्तर प्रदेश

पिता 

कुंज बिहारी लाल श्रीवास्तव

शिक्षा

हाई स्कूल

अमीनाबाद (उत्तर प्रदेश)

स्नातक

लखनऊ विश्वविद्यालय

व्यवसाय

सहायक प्रबंधक, आर० एल० ओ० डिपार्टमेंट लखनऊ

साहित्यिक रचनाएँ

  • दुख-सुख (उर्दू)

  • तपस्या (उर्दू)  

  • समंदर मेरी तलाश में (हिंदी) 

  • हुसैनियत की छांव 

  • तजल्ली-ए-"नूर"

  • आज के प्रसिद्ध शायर "नूर" (संपादक कन्हैयालाल नंदन)

संदर्भ

  • कन्हैया लाल नंदन की पुस्तक 

  • प्रोफ़ाइल एंड बायोग्राफी रेख़्ता (www.rekhta.org ) 

  • फेसबुक कृष्ण बिहारी नूर "लखनवी" वेबपेज 

  • विकिपीडिया

लेखक परिचय

रविकांत वर्मा
एम०ए० (सोशियोलॉजी), एल०एल०बी०, बैचलर ऑफ़ जर्नलिज़्म एंड मास कम्युनिकेशन में उपाधि 
आकाशवाणी छिंदवाड़ा से सेवानिवृत्त  
मो०  9589972355
जबलपुर (मध्यप्रदेश )

8 comments:

  1. वाह, बहुत ही ख़ूबसूरत आलेख

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  2. कन्हैया लाल नंदन जी की पुस्तक का नाम क्या है?

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  3. रविकांत जी, नमस्ते! कृष्णबिहारी जी की शख़्सियत पर जो नूर आपने बिखेरा है, निश्चित ही यह दिखाता है कि आप उनसे कितना मुतअस्सिर रहे हैं। 'नूर' साहब ने लखनऊ के अदब-ओ-तहज़ीब के रंगों में अपनी शायरी को ढाल कर न जाने कितनों के चेहरों पर मुस्कानें बिखेरी हैं। आपका आलेख भी मुस्कान बिखेर रहा है। आपको इस आलेख के लिए बधाई और आभार

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  4. उम्दा लेख।अभिनंदन।

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  5. शायर का एक अलग और बेहतरीन तरीके से दिया गया परिचय....अमर शर्मा

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  6. मरहूम शायर को आज उनकी पुण्य तिथि पर विनम्र श्रद्धा सुमन

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  7. रविकांत जी नमस्ते। आपने मशहूर शायर कृष्ण बिहारी नूर साहब पर उम्दा लेख लिखा है। उनके चुनिंदा अशआर लेख को चार चाँद लगा रहे हैं। नूर साहब कुँवर बेचैन जी के भी उस्ताद रहे हैं। आपको इस बेहतरीन लेख के लिए बहुत बहुत बधाई।

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  8. तमाम जिस्म ही घायल था, घाव ऐसा था,
    कोई न जान सका रख रखाव ऐसा था।
    लाखों करोड़ों ज़िंदादिल लोगों की नुमाइन्दगी करने वाले और उनकी ज़िन्दगी से जुड़ जाने वाले ऐसे तमाम अशआर कहने वाले मशहूर शायर कृष्ण बिहारी नूर साहब पर रविकांत जी आपने बेहद सुरुचिपूर्ण और जानकारी से भरा आलेख प्रस्तुत किया है। लेख पढ़कर आनंद आया औए नूर साहब के रचना संसार को विस्तार से जानने का अवसर मिला। आपको बहुत बहुत बधाई और धन्यवाद।

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"समाजवाद का सवाल केवल रोटी का सवाल नहीं है। समाजवाद मानव स्वतंत्रता की कुंजी है। समाजवाद ही एक सुखी समाज में संपूर्ण स्वतंत्र मनुष्यत्व...