Friday, May 20, 2022

सय्यद इंशाअल्लाह ख़ान : मसखरी के मसीहा बने उर्दू-व्याकरण के अग्रदूत

दुनिया में तमाम किस्म के शायर हुए मगर सय्यद इंशाअल्लाह ख़ान 'इंशा' की बात ही निराली है।

जिस ने यारों मुझ से दावा शेर के फ़न का किया

मैंने ले कर उस के काग़ज़ और क़लम आगे धरा


इंशा महज़ एक शायर नहीं बल्कि उर्दू ज़बान के विकास में वो मील का पत्थर हैं, जिसकी बुनियाद पर उर्दू के आज का स्वरूप टिका है। अपने ज्ञान और चातुर्य के बूते वे किसी भी परिस्थिति या व्यक्ति पर पल में शेर कह सकते थे। उनकी यही खूबी पहले उनकी लोकप्रियता और बाद में उनकी बर्बादी का सबब बनी। अपने जीवन के अंतिम समय में उन्होंने भले ही बड़े कष्ट सहे हों, किंतु हिंदी और उर्दू को उनकी देन एक तरफ़ जहाँ उन्हें आदर और सम्मान का पात्र बनाती है, वहीं अनेक भाषाओं पर उनकी पकड़ उन्हें अद्वितीय और अनुकरणीय भी बनाती है। आइए, इस हरफ़नमौला बहुभाषाविद को और गहराई से जानने की कोशिश करते हैं।


जन्म और जीवन


इंशाअल्लाह का ख़ानदान समरकंद से दिल्ली आ बसा था और चिकित्साकर्म में असाधारण योग्यताओं के बल पर शाही दरबार की सेवा में लीन था। अठारहवीं शताब्दी के मध्य तक आते-आते दिल्ली के हालात नाज़ुक हो चुके थे। इंशा के वालिद सय्यद माशाअल्लाह ख़ान ने समय की नज़ाकत भाँपते हुए दिल्ली छोड़ दिया और मुर्शिदाबाद (बंगाल) की ओर पलायन कर गए। वहाँ सिराज उद-दौला की शरण में उन्हें ख़ूब मान-सम्मान मिला और वहीं पैदा हुआ उनके ख़ानदान का वारिस इंशाअल्लाह ख़ान। बंगाल के हालात बिगड़ने पर वे अपने बेटे को लेकर फ़ैज़ाबाद आ गए। इंशा की उम्र अभी छोटी थी, मगर अपनी सूझ-बूझ और चतुराई के कारण सबका मन जीत लेते और सबके चहेते बन जाते थे। उनकी शिक्षा-दीक्षा पर उनके वालिद साहब का विशेष ध्यान था और अपने ज्ञान, विद्वता और बेपनाह प्रतिभा के दम पर वे फ़ैज़ाबाद से दिल्ली दरबार पहुँचने में कामयाब रहे। 


कमर बाँधे हुए चलने को यहाँ सब यार बैठे हैं

बहुत आगे गए, बाक़ी जो हैं तैयार बैठे हैं


यह वो समय था जब दिल्ली पर शाह आलम द्वितीय का राज था। १७८० में वे मिर्ज़ा नजफ़ ख़ान के लश्कर में शामिल हुए और अपने पुराने संबंधों के दम पर शाही महल में दाख़िल हो गए। उनके मसखरी भरे अशआर ने शाह आलम का दिल जीत लिया और वे उनके बेहद ख़ास बन बैठे। शाह आलम को इंशा के व्यंग्य से सने शेर इस हद तक पसंद आने लगे थे कि इंशा के बिना रहना उन्हें नागवार था। जैसा कि हर कहानी में होता है - राजा के करीबियों से जलनेवाले कम नहीं होते - इंशाअल्लाह भी ऐसे ही अन्य दरबारियों की आँखों में आ गए और उन्हें नीचा दिखाने का सिलसिला शुरू हुआ, जिसके जवाब में इंशा ने ऐसे-ऐसे शेर पढ़े कि सब ओर उनके चर्चे होने लगे। 


क्या हँसी आती है मुझ को हज़रत-ए-इंसान पर

फ़ेल-ए-बद ख़ुद ही करें लानत करें शैतान पर


यों तो इंशा की हाज़िरजवाबी का जवाब नहीं किंतु हर समय राजा को ख़ुश करने के लिए की जाने वाली मसखरी धीरे-धीरे इनकी आदत में शुमार होती गई और उनसे खार खाए शायरों की तादाद बढ़ने लगी। मिर्ज़ा अज़ीम बेग नामक एक मामूली शैक्षणिक योग्यता वाले शायर उनसे उलझ पड़े, जिसका जवाब इंशा ने बड़ी चतुराई से दिया। मुआमला अब खुलकर जंग होने जैसा हो गया था। प्रतिरोधी दल अपने लाव-लश्कर यानी भाई-बँधुओं के साथ अशआर का सैलाब लेकर मुशायरे में शरीक होते, मगर इंशा भी कम न थे; विरोधियों को भड़काने के लिए अक्सर फ़ख़्रिया अशआर कहते और विजयी मुस्कान से दुश्मनों के दिल जलाते।   


अजीब लुत्फ़ कुछ आपस की छेड़-छाड़ में है

कहाँ मिलाप में वो बात जो बिगाड़ में है


हर पल विरोधियों का सामना करते-करते उनका मन उचाट होने लगा था और दिल्ली के हालात भी बद से बदतर हो रहे थे। क़िस्मत आज़माने के लिए उन्होंने लखनऊ का रुख़ किया और यहाँ एक बार फिर उनके नाम की धूम मच गई। यहाँ से फ़ैज़ाबाद में कुछ दिन फ़र्मा अल्मास ख़ान के पास रहकर वे शाह आलम के बेटे सुलेमान शिकोह के मुलाज़िम हो गए। यहाँ उनकी अभी भी थोड़ी पूछ थी। मगर वक्त अब करवट लेने वाला था जिसकी भनक तक इंशा को न लग सकी।


लखनऊ में आसिफ़-उद-दौला, जिनकी उदारता के किस्सों ने इंशा को लखनऊ बुलाया था, के बाद सआदत अली ख़ान ने गद्दी संभाली और यहाँ से इंशा के जीवन की नई कहानी शुरू हुई। सआदत के दरबार तक पहुँचने में इंशा को काफ़ी वक्त लगा, मगर यहाँ आकर उन्हें वह इज़्ज़त नहीं मिली जो अन्य दरबारों में नसीब हुई थी। उनकी छवि एक मसखरे तक सीमित थी, जिसे नवाब साहब कभी भी किसी भी हाल में हाज़िर होने का बुलावा भेज देते थे। नवाब को जब किसी की पगड़ी उछालनी होती इंशा को उसके पीछे लगा देते। ऐसा एक वाक़या बयाँ करते हुए इंशा कहते हैं, "क्या कहूं! लोग जानते हैं कि मैं शायरी कर के नौकरी बजा लाता हूँ, मगर ख़ुद नहीं जानता कि क्या कर रहा हूँ। देखो! सुबह का गया शाम को आया था - कमर खोल रहा था कि चोबदार आया - जनाब-ए-आली फिर याद फ़रमाते हैं। गया तो देखा कि कोठे पर फ़र्श है, चाँदनी-रात है, पाएदार छप़्पर कट में आप बैठे हैं, फूलों का गहना सामने धरा है, एक गजरा हाथ में है - उसे उछालते हैं और पाँव के इशारे से छप्पर खट आगे बढ़ता जाता है। मैंने सलाम किया; हुक्म हुआ - इंशा कोई शे’र तो पढ़ो! अब फ़रमाइए, ऐसी हालत में, जब  अपना ही क़ाफ़िया तंग हो, शे’र क्या ख़ाक याद आए! ख़ैर! उस वक़्त यही समझ में आया, वहीं कह कर पढ़ दिया - 

लगा छप्पर खट में चार पहिए, उछाला तूने जो ले के गजरा

तो मौज दरयाए चाँदनी में वो ऐसा चलता था जैसे बजरा।

यही मतला सुनकर ख़ुश हुए। बतलाइए शायरी इसे कहते हैं!"    


इंशाअल्लाह का यह हाल अधिक दिनों तक नहीं रह पाया क्योंकि उनकी किसी बात से नवाब साहब नाराज़ हो गए और उनके कोप का कुछ यों असर हुआ कि इंशा की बाक़ी ज़िंदगी मुफ़लिसी और बेचारगी में गुज़री। जिस मसखरी ने उन्हें राजाओं की आँखों पर सजाए रखा था, उसी ठिठोली ने उन्हें गरीबी और गुमनामी का अँधेरा दिया। मगर यहाँ भी फ़क्र करने को कुछ है इंशा के पास - और वह है 'दरया-ए-लताफ़त' (१८०७)। 


'इंशा' ख़ुदा के फ़ज़्ल पे रखिए निगाह और

दिन हँस के काट डालिए हिम्मत न हारिए


इंशाअल्लाह के अशआर और अन्य कारनामें


जज़्बा-ए-इश्क़ सलामत है तो इंशा-अल्लाह

कच्चे धागे से चले आएँगे सरकार बंधे


इंशाअल्लाह ख़ान का जीवन सुख और दुख के सागर से होता हुआ १ मई १८१७ को परमगति को पा गया, किंतु जाते-जाते कुछ ऐसे काम कर गया कि लोग आज भी उन्हें याद करते हैं; उनके शेर पढ़ते हैं और उनके दिलचस्प क़िस्सों से अपना मन बहलाते हैं। एक तरफ़ मुहम्मद हुसैन आज़ाद उन्हें उर्दू का अमीर ख़ुसरो बताते हैं, तो दूसरी तरफ़ बेताब का ये क़ौल भी मशहूर है कि "इंशा के फ़ज़ल-ओ-कमाल को उनकी शायरी ने खोया और उनकी शायरी को सआदत अली ख़ां की मुसाहिबत ने डुबोया।"


इंशा मुगलकालीन भारत के एक ऐसे बहुभाषी शायर हैं जिन्होंने उर्दू, अरबी, फ़ारसी, तुर्की और पंजाबी में लिखा। ख़ासकर उर्दू के लिए उनका योगदान क़ाबिल-ए-तारीफ़ और क़ाबिल-ए-गौर है। उनकी किताब 'दरया-ए-लताफ़त' को उर्दू-व्याकरण की पहली किताब माना जाता है। इसकी ख़ासियत यह है कि यह अन्य व्याकरण की किताबों के समान बेरँग न होकर किसी उपन्यास की तरह दिलचस्प है, जिसमें विभिन्न पात्र अपनी-अपनी बोलियाँ बोलते सुनाई देते हैं। उनकी दूसरी महत्वपूर्ण किताब 'रानी केतकी की कहानी' है, जो उर्दू लिपि में लिखी हिंदी कहानी है। यह संभवतः खड़ी बोली की पहली कहानी है, जिसका रचनाकाल १८०३ के आसपास माना जाता है। इसमें उर्दू-फ़ारसी का एक भी लफ़्ज़ प्रयोग नहीं हुआ है। ऐसा लगता है मानो वे ख़ुद को आप ही चुनौती देते थे और फिर उसे पूरा करके ही दम लेते थे। रानी केतकी की कहानी का नाट्य रूपांतर दूरदर्शन पर प्रसारित भी हुआ था।


एक उद्धरण रानी केतकी की कहानी  से, 


दोहरा


हम नहीं हँसने से रुकते, जिसका जी चाहे हँसे।

है वही अपनी कहावत आ फँसे जी आ फँसे।।

अब तो सारा अपने पीछे झगड़ा झाँटा लग गया।

पाँव का क्या ढूँढती हो जी में काँटा लग गया।।


चौचुक्का


जब छाँड़ि करील को कुंजन को हरी द्वारिका जीउ माँ जाय बसे।

कलधौत के धाम बनाये घने महाराजन के महाराज भये।

तज मोर मुकुट अरु कामरिया कछु औरहि नाते जोड़ लिए।

धरे रूप नए किए नेह नए और गइया चरावन भूल गए।


इंशाअल्लाह ख़ान ने कभी किसी परंपरा या समकालीन ढ़र्रे का अनुकरण नहीं किया, उल्टा हमेशा कुछ ऐसा करने की कोशिश में रहते थे, जिसे पहले कभी किसी ने न किया हो। उन्होंने उर्दू में 'सिलक गौहर' लिखी जिसमें एक भी नुक़्ता नहीं है; ऐसा क़सीदा लिखा जिसमें पूरे-के-पूरे मिसरे अरबी, फ़ारसी, तुर्की, पुश्तो, पंजाबी, अंग्रेज़ी, फ़्रांसीसी और उस ज़माने की तमाम क़ाबिल-ए-ज़िक्र ज़बानों में हैं। उनके अशआर प्रतिद्वंदियों के छक्के छुड़ाने वाले होते थे। उन्होंने ऐसे शेर कहे जिन्हें मायनी के मतभेद के बिना, उर्दू के अलावा, महज़ नुक़्तों की तबदीली के बाद अरबी, फ़ारसी और हिंदी में पढ़ा जा सकता है; ऐसे शेर भी जिनका एक मिसरा बिना नुक्ते और दूसरे मिसरे के तमाम अल्फ़ाज़ नुक्ते वाले हैं। 


साँवले तन पे ग़ज़ब धज है बसंती शाल की

जी में है कह बैठिए अब जय कनहय्या लाल की


इंशा ने ग़ज़लें लिखीं, रुबाईयत लिखीं, फ़ारसी मसनविस, व्यंग्य, गुणगान के साथ-साथ पहेलियों और जादुई मंत्रों जैसी अपरंपरागत शैलियों पर भी कलम चलाई। हिंदी और उर्दू में उनका योगदान अविस्मरणीय है।


'इंशा' से शैख़ पूछता है क्या सलाह है

तर्ग़ीब-ए-बादा दी है मुझे ऐ जवाँ बसंत

इंशाअल्लाह ख़ान : जीवन परिचय

पूरा नाम

सय्यद इंशाअल्लाह ख़ान

उपनाम

इंशा

पिता

सय्यद माशा अल्लाह ख़ान

जन्म

१७५२, मुर्शिदाबाद, बंगाल

मृत्यु

१ मई १८१७, लखनऊ, उत्तर प्रदेश

पेशा

शायर, कहानीकार

भाषाज्ञान

उर्दू, फ़ारसी, तुर्की, अरबी, पंजाबी, अंग्रेज़ी, खड़ीबोली

महत्वपूर्ण रचनाए

 

          दरया-ए-लताफत (उर्दू की पहली व्याकरण पुस्तक)

रानी केतकी की कहानी (बाबू श्यामसुन्दर दास इसे हिन्दी की पहली कहानी मानते हैं)

उदयभान चरित

उर्दू ग़ज़लों का दीवाना

दीवान रेख्ती,

कसायद उर्दू-फ़ारसी,  

दीवाने फ़ारसी

मसनवी शिकारनामा,  

कमर बांधे हुएं चलने को,

झूठा निकला करार तेरा

अच्छा जो ख़फ़ा हम से हो तुम ऐ सनम



संदर्भ


लेखक परिचय


दीपा लाभ 

१३ वर्षों से अध्यापन कार्य से जुड़ी दीपा लाभ हिंदी से प्यार करती हैं और हिंदी सेवा के लिए प्रतिबद्ध हैं। हिंदी व अँग्रेज़ी भाषा में रोजगारपरक पाठ्यक्रम तैयार कर सफलतापूर्वक चला रही हैं। दीपा लाभ 'हिंदी से प्यार है' समूह की सक्रिय सदस्या हैं तथा 'साहित्यकार तिथिवार' परियोजना की प्रबंध-संपादक हैं। 

ईमेल- journalistdeepa@gmail.com
व्हाट्सएप- +91 8095809095

7 comments:

  1. आज एक बार फिर इस पटल पर ऐसी मुलाक़ात हुई जिसकी ज़िन्दगी और कामों ने विस्मित करके छोड़ दिया। क्या बेहतरीन जवाहर सँजोए रखे हैं हमारे साहित्य ने! इंशाअल्लाह ख़ान के बारे में लेख बहुत अच्छा है। खड़ी बोली की पहली कहानी और उपन्यास सरीखी व्याकरण किताब लिखने वाली इस हस्ती को नमन। दीपा, इस त्वरित परन्तु अद्भुत लेखन की बधाई और तहे दिल से शुक्रिया।

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  2. दीपा जी नमस्ते। वाह! एक और जानकारी भरा लेख। रानी केतकी की कहानी के बारे में कक्षा नौवीं में एक लघु प्रश्न होता था तो इस लेख से पुनः स्मरण हो आया। लेख बहुत शोधपूर्ण है अनके नई बातें पता चली। आपको इस महत्वपूर्ण लेख के लिए हार्दिक बधाई।

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  3. बहुत ही सुंदर और शोधपरक आलेख के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई।

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  4. बड़ा रोचक व्यक्तित्व था इंशा अल्लाह खान का। जितना मज़ेदार उनका जीवन, उतना ही मज़ेदार आपका आलेख, दीपा जी। मज़ा आया पढ़ने में। धन्यवाद।
    टिप्पणियों में हिंदी के पहले गद्य पर इतनी चर्चा हुई है कि यह सब रचनाएँ खोज कर पढ़नी होंगी। 😊💐💐

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  5. वाह बधाई हो दीपा मेम, अब तक सामान्य जानकारी थी।उनके जीवन और साहित्यिक यात्रा के बारे में आज ही पढ़ा। सार्थक और सटीक लेखन। आभार आपको

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  6. दीपा मुस्कुराता हुआ सा आलेख है। इतना जल्दी में, तुमने इतना समग्र परन्तु मस्ताना सा आलेख कैसे लिखा, यह सोच कर हैरान हूँ! बहुत शुक्रिया 🙏🏻 कितनी सारी नई बातें पता चली! एक बात पक्की हो गई, लेखन के इतने करामाती दाँवपेंच दिखाने वाले को कोई झुका नहीं सकता!

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  7. दीपा जी, इंशाअल्लाह ख़ान जी के बारे में, आपके इस आलेख के माध्यम से ही जाना है। आप द्वारा रचित इस जानकारी पूर्ण आलेख के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई।

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