Tuesday, May 3, 2022

संस्‍मरण, रेखाचित्र एवं साक्षात्‍कार विधा के पुरोधा : बनारसीदास चतुर्वेदी

 बनारसीदास चतुर्वेदी

हमारे देश की सांस्‍कृतिक, सामाजिक और राष्‍ट्रीय चेतना के उन्‍नयन में साहित्‍यकारों की महती भूमिका रही है। साहित्‍यकार अपने ज्ञानप्रद, रोचक, मोहक एवं कालजयी रचना संसार से विश्‍व-समाज को नई दिशा देता रहा है; साथ ही अपने देशवासियों को राजनीतिक, सांस्‍कृतिक, मानवीय-मूल्‍य व राष्‍ट्रीय गौरव से अवगत कराता है। साहित्यकार अपने गहन चिंतन, दूरदर्शी विचार, गहरी संवेदना और अद्भुत सामाजिक सरोकारों से राष्‍ट्र एवं समाज की समस्‍याओं और चुनौतियों के प्रति आम-जन को सचेत एवं सजग कर उनके प्रगतिपथ को आलोकित एवं आभामय बनाते हैं, इसलिए वे राष्‍ट्र-निर्माता एवं समाज-उन्‍नायक कहे जाते हैं। हमारे देश में अनेक ऐसे कवि, साहित्‍यकार एवं पत्रकार हुए हैं, जो इस देश की सांस्‍कृतिक विरासत को समृद्ध करते हुए, राष्‍ट्रीय-एकता एवं राष्‍ट्रीय-प्रगति के प्रति समर्पित रहे हैं; फलतः हमारे देश का गौरव, गरिमा एवं महिमा विश्‍व-भर में फैल रही है। अपने साहित्‍य-संसार के निर्माण और पत्रकारिता कर्म में निरंतर साधनारत रहकर संस्‍मरण, रेखाचित्र एवं साक्षात्कार विधा की श्रीवृद्धि करने वाले प्रतिभाशाली साहित्‍यकारों में बनारसीदास चतुर्वेदी का नाम आदर एवं सम्‍मान के साथ लिया जाता है। उनकी गणना मनीषी, शिक्षा-विद्वानों, पत्रकारों और मर्मज्ञ साहित्‍यकारों में की जाती है। अपने पुरुषार्थ, सारस्‍वत साधना, हिंदी पत्रकारिता, विदेश सेवा, शिक्षा सेवा और महिमा मंडित रचना-संसार के लिए वे सभी साहित्‍य प्रेमियों के जन-मानस में विद्यमान हैं, और अनंत काल तक उनकी स्‍मृति अविस्‍मरणीय रहेगी।
बनारसीदास चतुर्वेदी जी हमारे देश में एक महान शिक्षाविद, साहित्‍यकार एवं पत्रकार के रूप में अवतरित हुए। इन्होंने देश के हिंदी साहित्‍य-संसार का संवर्धन करते हुए अपनी राष्‍ट्रवादी एवं जनवादी पत्रकारिता और रचना-धर्मिता से राष्‍ट्रीय चेतना को जन-मानस तक अनुगूंजित करने हेतु उल्‍लेखनीय कार्य किए हैं। उनके विराट साहित्यिक वैभव से समाज सदैव प्रेरित एवं प्रभावित होता रहा है। वास्‍तविकता यह है कि वे सदैव हिंदी-पत्रकारिता के ध्‍वजवाहक बने रहे। साहित्यिक उन्‍नयन एवं राष्‍ट्रभाषा हिंदी के विकास के लिए संपूर्ण जीवन संघर्षरत रहे। आमजन में राष्‍ट्र-प्रेम एवं राष्‍ट्रीय-भावना की अलख जगाते रहे।
उनके जीवन-दर्शन की खासियत यह है कि वे लेखक और कलाकार की परिकल्‍पना भी एक श्रमिक के रूप में करते हैं। उसकी कला की उपयोगिता एक बेहतर समाज के निर्माण में ही हो सकती है। उनकी लेखनी शिल्‍प के कौशल से नहीं वरन जीवनानुभवों की गहराई और तिक्‍तता से शक्ति पाती है। वे अपनी रचना-धर्मिता से जन-मन में गहरी आत्‍मीयता और तादात्म्य स्‍थापित करते हुए सामाजिक परिर्वतन के उन्‍नायक बने रहे। उनके साहित्यिक अवदान का गहन एवं विस्‍तृत अनुशीलन करने पर हम पाते हैं कि उन्होंने अपने रचना-संसार में उद्घाटित सामाजिक एवं राजनीतिक यथार्थ द्वारा राष्‍ट्रीय आंदोलन को नई गति प्रदान करते हुए जन-मानस में राष्‍ट्रीय-चेतना की ऊर्जा का संचार किया। वे एक कर्मठ राष्‍ट्रवादी, साहसी एवं जनवादी पत्रकार भी थे। वे कोलकाता से प्रकाशित 'विशाल भारत' के संपादक भी थे। उनकी धारदार लेखनी से सामाजिक उन्‍नयन का संदेश जन-मानस तक पहुँचता रहा है। उनके रचना-संसार में अतीत, वर्तमान और भविष्‍य का अनुपम एवं अदभुत समन्‍वय समाहित हैं। उनका भाव प्रवाह इतना प्रखर एवं तीव्र है कि वह हर युग में सामाजिक उन्‍नयन की दृष्टि बन जाता है। उनके कथा-साहित्‍य का समीक्षात्‍मक अध्‍ययन करने से ज्ञात होता है, कि उनमें मानवता, सामाजिकता एवं राष्‍ट्रीयता का युग-बोध सर्व व्‍याप्‍त है। 
बनारसीदास चतुर्वेदी जी के रचना-संसार में संवेदना, सृजन एवं चिंतन का पुट केवल युगीन संदर्भों तक ही सीमित नहीं रहता, बल्कि देशकाल का अतिक्रमण करके आगे आने वाले समय में भी सहायक होता है। वे विदेश में रहकर भी हिंदी साहित्‍य की सारस्‍वत साधना करते रहे। वास्‍तव में कलाकृति सिर्फ कलाकार की व्‍यक्तिगत अनुभूति नहीं होती, बल्कि वह कलाकृतियों की परंपरा में सबसे नई रचना होती है। तात्‍पर्य यह है कि एक बड़ी हद तक उसके स्‍वरूप का निर्धारण सामाजिक परंपरा एवं प्रचलित प्रणाली द्वारा किया जाता है। साहित्यिक पटल पर आकर नितांत व्‍यक्तिगत रचना भी अपनी सीमा का अतिक्रमण करती है और बहुत अंशों में सार्वजनिक और सार्वभौमिक बन जाती है। 
बनारसीदास चतुर्वेदी ऐसे प्रतिभा संपन्‍न पत्रकार एवं साहित्‍यकार हैं, जिनके रचना-संसार में भारतीय सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन और फिजीवासी भारतीय प्रवासी का कटु यथार्थ मिलता है। उनके रचना संसार में वस्‍तुतः लोक-जीवन एवं लोक-परंपरा की चेतना से साहित्‍य के विकास में नई दृष्टियों का समाहार होता है, और जीवन की विवेचना अनेक दिशाओं से आती हुई किरणों की भांति संवेदन बिंदुओं पर केंद्रीभूत होकर जीवनगत सत्‍य को प्रमाणित करती है। साहित्‍य समाज के उत्‍थान में युगीन चेतना के संदर्भ के रूप में प्रामाणिक दस्‍तावेज के रूप में स्‍वीकार किया जाता है। बनारसीदास चतुर्वेदी युगबोध एवं युगीन चेतना से संपन्‍न ऐसे ही रचनाकार हैं, जिन्‍होंने राष्‍ट्रीय-चेतना और सामाजिक-चेतना के साथ-साथ लोक-जीवन एवं लोक-परंपरा के जीवंत एवं उपयोगी पक्ष का संपोषण किया है, तथा प्रचलित अंधविश्‍वास एवं अनुपयोगी मान्‍यताओं के प्रति अपनी असह‍मति को प्रकट किया है। वास्‍तव में इनका आग्रह एवं सामाजिक चेतना अखिल मानवता की कल्‍याण कामना है। इनके संपूर्ण साहित्‍य में राष्‍ट्रीय चेतना, लोक-मंगल की भावना तथा उदात्‍त मानव-मूल्‍यों एवं सामाजिक-मूल्‍यों की स्‍थापना का प्रयास है।
पत्रकारिता
बनारसीदास चतुर्वेदी कोलकाता से प्रकाशित होने वाली मासिक पत्रिका 'विशाल भारत' के संपादक थे। उनका संपादन काल इस पत्रिका का स्‍वर्णकाल था। देश भर के मनीषी साहित्‍यकार एवं कवि इस पत्रिका में रचना छपवाकर गौरव की अनुभूति करते थे। इसे उस समय की एक मानक एवं आदर्श पत्रिका का सम्‍मान प्राप्‍त था। 
राष्‍ट्रीय सेवा
बनारसीदास चतुर्वेदी जी हिंदी सम्‍मेलन एवं संगोष्‍ठी और परिसंवाद के आयोजन एवं संयोजन में असीम रुचि रखते थे। उन्‍होंने दिल्‍ली में हिंदी भवन की स्‍थापना की, जो हिंदी कार्यक्रम एवं साहित्यिक गतिविधि का प्रमुख केंद्र बन गया था। महान साहित्‍यकारों एवं देश-भक्‍तों के संयोजन से राष्‍ट्रभाषा हिंदी पर परिसंवाद एवं सम्‍मेलन हुआ करता था। वे हिंदी को राष्‍ट्रभाषा तथा देशहित के लिए उपयोगी एवं राष्‍ट्रीय एकता का सूत्र मानते थे। उनका संपूर्ण जीवन हिंदी पत्रकारिता एवं नई साहित्यिक विधाओं के संपोषण के लिए समर्पित था। उन्होंने शांतिनिकेतन में भी हिंदी भवन की स्‍थापना की थी।
योगदान
बनारसीदास चतुर्वेदी जी ने रूस में विदेश सेवा की, जो काफी महत्त्वपूर्ण साबित हुई। वे बहुत लंबे समय तक फीजी में रहे। उनके संस्‍मरण 'फिजी द्वीप में मेरे २१ वर्ष' में फिजी द्वीप में रहने वाले भारतीयों के कष्‍ट, वेदना और संघर्षों का यथार्थ चित्रण मिलता है। उन्‍होंने सन १९१४ से १९३६ तक पूरी निष्‍ठा के साथ प्रवासी भारतीयों की सेवा की। सी० एफ० एंड्रूज के साथ मिलकर प्रवासी भारतीयों की अनेक समस्‍याओं के समाधान किए। छायावाद के संबंध में उनकी समीक्षा बहुत ही चर्चित रही है, जिसमें सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' की रचना पर काफी विवाद भी हुआ था। उन्होंने निडर एवं निष्‍पक्ष हिंदी पत्रकारिता के धर्म को निभाया। महात्‍मा गांधी के अनुयायी बनकर राष्‍ट्रीय आंदोलन में बढ-चढकर योगदान दिया। सबसे महत्‍वपूर्ण कार्य के रूप में शहीदों की स्‍मृति में ग्रंथमाला प्रकाशित करना है। सही मायने में स्‍वतंत्रता आंदोलन के शहीदों के जीवन-मूल्‍य को स्‍थापित कर राष्‍ट्रीय-चेतना को संपूर्ण देशवासियों के सामने उजागर कर महती भूमिका निभाई।
बनारसीदास चतुर्वेदी भाषा-साहित्य के अध्ययन और अध्‍यापन तथा अनुशीलन के लिए साधना करते रहे। उन्होंने 'विशाल भारत' छोड़ने के बाद टीकमगढ़ से 'मधुकर' का संपादन शुरू किया। ओरछा नरेश इनकी साहित्यिक रुचि  एवं समाजसेवा से काफी प्रभावित थे, और इन्‍हें विशेष आदर एवं सम्‍मान देते थे; कारण कि वे हिंदी प्रेमी थे। बनारसीदास ने वास्तव में जीवन भर अध्‍ययन-अध्‍यापन एवं प‍त्रकारिता का धर्म निभाया। उनका अध्ययन भारतीय संस्‍कृति, हिंदी, संस्‍कृत और भारतीय साहित्य तक ही सीमित नहीं था; अँग्रेज़ी के माध्यम से उन्होंने पाश्चात्य साहित्य का भी गहन अध्ययन और अनुशीलन किया था। उनकी अपनी सरल एवं सुबोध भाषा शैली थी, जो बातचीत की भाषा के निकट होते हुए भी ओजपूर्ण तथा प्रांजल और आकर्षक है। निबंध, रेखाचित्र, वर्णन आदि के लिए उनके लेख-शैली विशेष रूप से उपयुक्त हैं। उनकी रचनाओं में 'रेखाचित्र'(१९५२), 'साहित्य और जीवन'(१९५४), 'सत्यनारायण कविरत्न', 'भारत-भक्त एंड्रूज', 'संस्मरण' आदि अधिक प्रसिद्ध हैं। इन कृतियों ने इन्‍हें लोकप्रियता के शिखर पर पहुँचा दिया।
वे प्रवासी भारतीयों के दुख-दर्द के समाधान के लिए सदैव प्रयत्‍नशील रहे। तोताराम सनाढ्य से उनके फीजी द्वीप के अनुभव सुनकर बनारसीदास ने तोताराम जी के नाम से 'फिजी में मेरे २१ वर्ष' नामक जो पुस्तक तैयार की, उससे प्रवासी भारतीयों की दशा की ओर देश भर का ध्यान आकृष्ट हुआ। बनारसीदास चतुर्वेदी ने स्वयं भी 'प्रवासी भारतवासी' नामक पुस्तक की रचना की। वर्ष १९२४ में कांग्रेस ने उन्हें अपना प्रतिनिधि बनाकर पूर्वी अफ्रीका भेजा था। अपने लेखों और सहानुभूतिपूर्ण आलोचना द्वारा उन्होंने अनेक तरुण लेखकों को प्रोत्साहित किया था। बनारसीदास जी ने जीवन को निकट से देखा था, इसीलिए उनके रेखाचित्र सजीव, रोचक एवं मोहक लगते हैं। वे चलते-फिरते दिखाई देते हैं और बोलते से सुनाई पड़ते हैं। रेखाचित्रों के क्षेत्र में उनका कार्य बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। रेखाचित्र लेखन को नई दिशा प्रदान कर उनके पुरोधा सिद्ध हुए। उन्‍होंने विदेश-सेवा में भी उल्‍लेखनीय योगदान दिया। बनारसीदास जी का एक प्रमुख कार्य शहीदों की स्मृति में ग्रंथमाला प्रकाशित कराना रहा है। कई साहित्यकारों के अभिनंदन ग्रंथ प्रकाशित कराने का श्रेय भी उनको है। बनारसीदास जी कभी-कभी अपनी डायरी भी लिखा करते थे, जिसका संपूर्ण प्रकाशन हिंदी-साहित्य में अवश्य ही महत्त्वपूर्ण होगा। वे रूसी लेखक संघ के आमंत्रण पर रूस की सैर दो बार कर चुके थे। वहाँ से लौटकर उन्होंने सुंदर लेखमाला लिखी थी। देश की अनेक साहित्यिक संस्थाओं से वे हमेशा संबद्ध रहे। हिंदी के उन्‍नयन के लिए जीवन भर संघर्ष करते रहे। बनारसीदास चतुर्वेदी बारह वर्ष तक राज्यसभा के सदस्य भी रहे। यह सम्मान उन्हें अपनी हिंदी-सेवा के कारण ही मिला था। संसद सदस्य के रूप में दिल्ली निवास की अवधि में वे सभी साहित्यिक हलचलों के प्रमुख सूत्रधारों में रहे। 'संसदीय हिंदी परिषद', 'हिंदी पत्रकार संघ' आदि संस्थाओं के संचालन में रुचि लेने के साथ-साथ बनारसीदास जी को दिल्ली में 'हिंदी भवन' स्‍थापित करने का श्रेय भी प्राप्त है।
एक पत्रकार एवं साहित्‍यकार के रूप में श्री बनारसीदास चतुर्वेदी जी विशिष्‍ट हैं। समकालीन साहित्‍यकारों के संदर्भ में यदि हम इन कृतियों का अध्‍ययन करते हैं तो हमें ऐसा प्रतीत होता है कि इनकी कृतियों में मानवीय-मूल्‍यों एवं सामाजिक-नैतिकता पर विशेष प्रकाश डाला गया, जो समाज के लिए एक नए प्रकाश स्‍तंभ का कार्य करता है। इस प्रकार बनारसीदास के कथा-साहित्‍य में मानवीय-मूल्‍य का समावेश स्‍वतः ही स्‍वाभाविक जान पड़ता है। मानवीय सोच एवं सामाजिकता और राष्‍ट्रीयता उनके लेखन की विशेष अवधारणा है, जिसके माध्‍यम से वे साहित्‍य-संसार में सामाजिक सरोकार को प्रथम स्‍थान देते हैं। उनके कथा-साहित्‍य में मानवीय मूल्‍यों के साथ-साथ सामाजिक परिवर्तन का उद्घोष सुनाई पड़ता है। मानवीय मूल्‍य एवं राष्‍ट्रीय चेतना उनकी कृतियों का मुख्‍य संदेश होता है। उनका साहित्‍य सामाजिक परिवर्तन एवं सामाजिक विकास के विशेष अभियान के रूप में देखने को मिलता है। परिवर्तन का दृष्टिकोण काफी व्‍यापक है और सामाजिक बदलाव की संभावनाएँ भी आपार दिखती है। उनकी साहित्यिक चेतना, दूर-दृष्टि और हिंदीसेवी-धर्मिता ने उनके रचना संसार को जीवंत और जीवनोपयोगी बना दिया है, जो समाज के नैतिक विकास की आचार संहिता के रूप में प्रामाणित हुआ है। इस प्रकार बनारसीदास चतुर्वेदी ने अपने रचना-संसार के माध्‍यम से मानवीय-जीवन में काफी सक्रिय प्रेरक-शक्ति का काम किया है, जिससे आमलोगों को वर्तमान राष्‍ट्रीय चेतना एवं राजनीतिक यथार्थ की व्‍यापक झलक मिलती है। राष्‍ट्रीय चेतना एवं सामाजिक सरोकार उनके साहित्‍य-संसार का प्राणतत्‍व होता है। उनके संस्‍मरण-रेखाचित्र एवं साक्षात्‍कार के ज्ञानप्रद एवं  प्रेरणादायी विचार से मानव का जीवन आलोकित एवं ऊर्जावान हुआ है। उनका साहित्‍य-संसार मानव के लिए ज्ञानपुंज एवं प्ररेणा-स्रोत सिद्ध हुआ है।

पं० बनारसीदास चतुर्वेदी : जीवन परिचय

जन्म

२४ दिसंबर, १८९२

निधन

२ मई १९८५

जन्मभूमि

फ़िरोजाबाद

पिता

पं० गणेशीलाल चौबे

गुरु

पंडित लक्ष्मीधर वाजपेयी

शिक्षा

इंटरमीडिएट

१९१३

डी० लिट

आगरा विश्वविद्यालय १९८०

कर्म-भूमि

भारत और फिजी 

कर्म-क्षेत्र

पत्रकारिता, स्वतंत्र लेखन, शिक्षण और विशिष्‍ट हिंदी सम्‍मेलनों का आयोजन

साहित्यिक रचनाएँ

  • कविरत्न सत्यनारायण जी की जीवनी (१९०६)

  • फिजी द्वीप में मेरे २१ वर्ष (१९१८)

  • राष्ट्रभाषा (१९१९)

  • प्रवासी भारतवासी (१९२८)

  • संस्मरण (१९५२) 

  • रेखाचित्र (१९५२) 

  • हमारे आराध्य

  • साहित्य और जीवन

  • भारतभक्त एंड्रूज़

  • फिज़ी में भारतीय

  • फिज़ी की समस्या

  • केशवचन्द्र सेन

  • अमर शहीद अशफाक उल्ला खाँ

  • विश्व की विभूतियाँ

  • यहाँ पुरुषों की खोज में 

  • साहित्य सौरभ

  • आत्मकथा : रामप्रसाद बिस्मिल

  • रूस की साहित्यिक यात्रा

  • सेतु बांध

  • हृदय तरंग


संपादन

  • अभ्युदय

  • विशाल भारत

  • मधुकर

  • विंध्यवाणी

संस्मरण

  • प्रेमचंदजी के साथ दो दिन

भाषा ज्ञान

हिंदी, संस्‍कृत एवं अँग्रेज़ी

प्रेरक व्‍यक्तित्‍व 

महात्‍मा गांधी, सी० एफ० एंड्रूज और गणेश शंकर विद्यार्थी

सम्मान व पुरस्कार

  • पद्मभूषण (१९७३)


संदर्भ

  • कटरा बी आर्ज़ू, डॉ० राही मासूम रज़ा, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली

  • हिंदी साहित्‍य और संवेदना का विकास - रामस्‍वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद

  • हिंदी उपन्‍यास का नया दौर - सं० डॉ० राजेंद्र तिवारी, लोकगीत प्रकाशन, चंडीगढ़

  • हिंदी गद्य साहित्‍य - डॉ० रामचंद्र तिवारी, विश्‍वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी

  • आधुनिक साहित्‍य - नंददुलारे वाजपेयी, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्‍ली

  • हिंदी भाषा साहित्‍य - किरण बाला, वी० के० पब्लिशिंग हाउस, बरेली, उत्‍तर प्रदेश

  • हिंदी विकीपीडिया वेबसाइट

  • हिंदी साहित्‍य का इतिहास - डॉ० नगेंद्र

लेखक परिचय

डॉ० रंजीत कुमार 
शिक्षा - पी०एच०डी०, एमफिल, कला निष्‍णात (हिंदी, अँग्रेज़ी, लोकप्रशासन) विज्ञान निष्‍णात, बी०एड, बी०एल०आई एससी, पी०जी०डी०सी०ए०, पी०जी०डी० मनोविज्ञानिक प्रमार्शण, इलेक्‍ट्रॉनिक्‍स एवं दूरसंचार में डिप्‍लोमा इत्‍यादि

संप्रति - अध्‍यक्ष हिंदी साहित्‍य परिषद कर्णाटक, हिंदी सेवी, शिक्षाविद और प्रसिद्ध वैज्ञानिक एवं तकनीकी अनुवाद विशेषज्ञ

2 comments:

  1. उम्दा आलेख के लिए आदरणीय डॉ. रंजीत जी को साधुवाद!

    ReplyDelete
  2. डॉ. रंजीत जी नमस्ते। आपके इस लेख के माध्यम से आदरणीय बनारसी दास चतुर्वेदी जी के बारे में विस्तृत जानकारी मिली। आपने उनकी जीवन यात्रा एवं साहित्यिक योगदान को बखूबी लेख में उतारा है। आपको इस शोध सम्पन्न लेख के लिये हार्दिक बधाई।

    ReplyDelete

आलेख पढ़ने के लिए चित्र पर क्लिक करें।

कलेंडर जनवरी

Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat
            1वह आदमी उतर गया हृदय में मनुष्य की तरह - विनोद कुमार शुक्ल
2अंतः जगत के शब्द-शिल्पी : जैनेंद्र कुमार 3हिंदी साहित्य के सूर्य - सूरदास 4“कल जिस राह चलेगा जग मैं उसका पहला प्रात हूँ” - गोपालदास नीरज 5काशीनाथ सिंह : काशी का अस्सी या अस्सी का काशी 6पौराणिकता के आधुनिक चितेरे : नरेंद्र कोहली 7समाज की विडंबनाओं का साहित्यकार : उदय प्रकाश 8भारतीय कथा साहित्य का जगमगाता नक्षत्र : आशापूर्णा देवी
9ऐतिहासिक कथाओं के चितेरे लेखक - श्री वृंदावनलाल वर्मा 10आलोचना के लोचन – मधुरेश 11आधुनिक खड़ीबोली के प्रथम कवि और प्रवर्तक : पं० श्रीधर पाठक 12यथार्थवाद के अविस्मरणीय हस्ताक्षर : दूधनाथ सिंह 13बहुत नाम हैं, एक शमशेर भी है 14एक लहर, एक चट्टान, एक आंदोलन : महाश्वेता देवी 15सामाजिक सरोकारों का शायर - कैफ़ी आज़मी
16अभी मृत्यु से दाँव लगाकर समय जीत जाने का क्षण है - अशोक वाजपेयी 17लेखन सम्राट : रांगेय राघव 18हिंदी बालसाहित्य के लोकप्रिय कवि निरंकार देव सेवक 19कोश कला के आचार्य - रामचंद्र वर्मा 20अल्फ़ाज़ के तानों-बानों से ख़्वाब बुनने वाला फ़नकार: जावेद अख़्तर 21हिंदी साहित्य के पितामह - आचार्य शिवपूजन सहाय 22आदि गुरु शंकराचार्य - केरल की कलाड़ी से केदार तक
23हिंदी साहित्य के गौरव स्तंभ : पं० लोचन प्रसाद पांडेय 24हिंदी के देवव्रत - आचार्य चंद्रबलि पांडेय 25काल चिंतन के चिंतक - राजेंद्र अवस्थी 26डाकू से कविवर बनने की अद्भुत गाथा : आदिकवि वाल्मीकि 27कमलेश्वर : हिंदी  साहित्य के दमकते सितारे  28डॉ० विद्यानिवास मिश्र-एक साहित्यिक युग पुरुष 29ममता कालिया : एक साँस में लिखने की आदत!
30साहित्य के अमर दीपस्तंभ : श्री जयशंकर प्रसाद 31ग्रामीण संस्कृति के चितेरे अद्भुत कहानीकार : मिथिलेश्वर          

आचार्य नरेंद्रदेव : भारत में समाजवाद के पितामह

"समाजवाद का सवाल केवल रोटी का सवाल नहीं है। समाजवाद मानव स्वतंत्रता की कुंजी है। समाजवाद ही एक सुखी समाज में संपूर्ण स्वतंत्र मनुष्यत्व...