Monday, May 9, 2022

आधुनिक ब्रजभाषा के प्रमुख कवि एवं समाज-सेवी संत - वियोगी हरि

"राम सो बड़ो है कौन मोसो कौन छोटो

राम सो खरो है कौन मोसो कौन खोटो"

हिंदी जगत में तुलसी कृत विनयपत्रिका और उसमें अंकित इन पंक्तियों को कौन नहीं जानता? विनय पत्रिका की हरितोशिणी टीका से भी साहित्य मर्मज्ञ भली-भाँति परिचित हैं। साहित्य सेवा सदन वाराणसी से प्रकाशित काव्यग्रंथ रत्नमाला के छठे रत्न के रूप में १९२३ में प्रकाशित हरितोशिणी टीका का परिचय रामचंद्र शुक्ल ने लिखा है। इस सुगम-सुबोध टीका की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए शुक्ल जी ने लिखा - "टीका वास्तव में जैसी होनी चाहिए वैसी ही हुई है।" 


इस लोकप्रिय कृति के टीकाकार हैं - श्री वियोगी हरि। वे प्रसिद्ध गाँधीवादी और हिंदी के अनुपम साहित्यकार हैं। 

वियोगी हरि आधुनिक ब्रजभाषा के प्रमुख कवि, हिंदी के सफल गद्यकार तथा समाज-सेवी संत भी हैं। उनकी महत्वपूर्ण मौलिक रचना 'वीर-सतसई' है, जिस पर १९२८ में इन्हें मंगलाप्रसाद पारितोषिक प्रदान किया गया। मंगलाप्रसाद पुरस्कार काशी के प्रसिद्ध मंगला प्रसाद परिवार द्वारा साहित्य के क्षेत्र में विशेष योगदान देने वाले व्यक्ति को प्रदान किया जाता था। अपनी इस रचना में 'वीर रस' की अनन्यता का बखान वियोगी हरि ने कुछ इस प्रकार किया है -

"छांडि वीर रसु अब हमें नहीं भावतु रसु आन

ध्यावतु सावन आंधरों हरो हरो हि जहान।"

अर्थात जैसे सावन के अंधे को हरा-हरा ही दिखाई देता है, वैसे ही हमें वीर रस को छोड़ कर अब कोई और रस नहीं सुहाता।

वियोगी हरि ने अनेक ग्रंथों का संपादन किया, प्राचीन कविताओं का संग्रह किया तथा संतों की वाणी भी संकलित की। उन्होंने कविता, नाटक, गद्यगीत, निबंध तथा बालोपयोगी पुस्तकें भी लिखी हैं। 


वियोगी हरि का जन्म छतरपुर, मध्य प्रदेश में सन १८९६ ई० में हुआ था। उनका मूल नाम हरिहर था। बचपन में ही पिता की मृत्यु हो जाने के कारण इनका पालन पोषण और शिक्षा ननिहाल में हुई। इन्होंने हिंदी और संस्कृत का प्रारंभिक अध्ययन घर पर ही किया। स्वाध्याय के बल पर इन्होंने विविध विषयों में ज्ञानार्जन किया। दर्शन शास्त्र में इनकी विशेष अभिरुचि हुई। इनका हृदय भक्ति भाव और उदात्त प्रेम से आप्लावित रहा। साहित्यानुराग उनमें जीवन के आरंभिक वर्षों से ही विद्यमान था। दस वर्ष की उम्र में ही इन्होंने कुंडलिया एवं सवैया में सृजन कर दिया था। कालांतर में वे आधुनिक काल में ब्रजभाषा काव्य के रचयिता विख्यात हुए। छतरपुर की महारानी कमलकुमारी 'युगलप्रिया' से उन्हें भरपूर स्नेह मिला। उनके साथ भारत के कई तीर्थ स्थानों पर जाने का अवसर भी मिला। महारानी की मृत्यु के बाद वे परित्यागी हो गए और आजन्म वैसे ही रहे।


वियोगी हरि के जीवन की दो महत्वपूर्ण घटनाएँ हैं - सन १९१७ में राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन से भेंट और कालांतर में महात्मा गाँधी से निकट संपर्क। पुरुषोत्तम दास टंडन जी के सौजन्य से ये लेखन और साहित्य सृजन की और प्रवृत्त हुए। १९२५ में पुरुषोत्तम दास टंडन जी के साथ मिलकर प्रयागराज में 'हिंदी विद्यापीठ' की स्थापना की और वहीं रहकर सम्मेलन पत्रिका का संपादन किया। कालांतर में 'हरिजन सेवक' और 'ब्रज माधुरी-सार' के संपादन का भार भी वहन किया। वे हरिजन सेवक संघ, गाँधी स्मारक निधि तथा भूदान आंदोलन से भी जुड़े। गाँधीजी द्वारा प्रवर्तित 'हरिजनसेवक' (हिंदी संस्करण) के संपादन का भार हरि जी ने संभाला। उन्होंने १९२० में अस्पृश्यता निवारण पर प्रताप पत्रिका में अनवरत लेखमाला लिखी, यह पत्रिका कानपुर से प्रकाशित होती थी। १९३२ में वे हरिजन सेवक संघ से घनिष्ठता से जुड़े। १९३८ में उन्हें हरिजन उद्योगशाला के व्यवस्थापक का दायित्व दिया गया, जिसे उन्होंने जीवन पर्यंत निभाया। हरिजन सेवक संघ अखिल भारतीय संस्था है, जिसकी शाखाएँ देश के कई भागों में हैं। यहाँ इन्होंने ठक्कर बापा और देवदास गांधी के निकट सहयोग में कार्य किया। मई १९८८ को दिल्ली में आपका देहावसान हो गया।


४० से भी अधिक वर्षों तक वियोगी हरि हिंदी साहित्य जगत में सक्रिय रहे। वियोगी हरि जी ने अनेक रचनाएँ हिंदी जगत को दीं। गद्य और पद्य में आत्माभिव्यक्ति का उनका अपना ही तरीका था। उनका लेखन सुधार की भावना से प्रेरित रहा। उनके निबंध देशोद्धार की भावना से अनुप्राणित हैं। इनका वैचारिक उन्मेष देखते ही बनता है। वे एक सहृदय कवि, आलोचक और निबंधकार के रूप में जाने गए। धर्म, दर्शन, भक्ति, हरिजन कार्य, सामाजिक सुधार तथा अनेक साहित्यिक विषयों को लेकर वियोगी हरि ने चालीस से अधिक पुस्तकें लिखी हैं। यह सृजन दो श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है - मौलिक और संपादित। उनकी मौलिक काव्य रचनाओं में प्रमुख हैं - 'प्रेम पथिक', 'प्रेम शतक', 'प्रेमांजलि', 'अनुराग वाटिका' और 'वीर सतसई'। नाटक के क्षेत्र में चर्चित हैं - 'वीर हरदौल', 'देश भक्त', 'छद्म योगिनी' और 'हरिजन सेवा'। उनके गद्य काव्य को 'तरंगिनी', 'अंतर्नाद', 'भावना', 'पगली' और 'श्रद्धा कण' जैसे शीर्षकों में पाया जा सकता है। 'साहित्य विहार' संकलन में इनके भावनात्मक निबंध संकलित हुए। 


१९४८ में वियोगी हरि की आत्मकथा 'मेरा जीवन प्रवाह' का प्रकाशन हुआ। इस आत्मकथा में वे अपने जीवन में संपर्क में आए समाज के निम्न वर्ग के साथ का मर्मस्पर्शी अंकन करते हैं। पुस्तक के 'दो शब्द' शीर्षक में वे लिखते हैं , "अपने कुछ संस्मरणों या जीवन प्रवाह के कुछ बहे-बिखरे जल कणों को बाँधने का मैंने इन पृष्ठों में प्रयास किया है। जिन असंख्य जलकणों ने मेरे प्रवाह को बनाया उनमें से किसे तो सामान्य कहा जाए, और किसे विशेष?"


आपने अरविंद की दिव्य वाणी, गाँधी के आदर्शों और बुद्ध वाणी पर भी अपने विचार समायोजित किए। बुद्ध वाणी सूक्ति संग्रह की प्रस्तुति में वे लिखते हैं, "भगवान बुद्ध का हमारे ऊपर बहुत बड़ा ऋण है। हमारे राष्ट्र पर, हमारे जीवन पर आज भी उस महान मानव धर्म की अमिट छाप लगी हुई है।" उन्होंने 'सूर पदावली', 'बिहारी संग्रह', 'संतवाणी', 'ब्रजमाधुरी सार', 'तुलसी सूक्ति सुधा' जैसे ग्रंथ संपादित किए। सभी रचनाओं के प्रकाशन वर्ष १९२२ से लेकर १९२९ तक प्रसरित हैं।


वियोगी हरि शुक्ल युग के गद्यकार हैं। वे सहृदय भावुक गद्यकार के रूप में अपनी पहचान रखते हैं। इनका गद्य काव्य इनकी सहृदयता का परिचायक है, जिसमें इनकी भावात्मक शैली के दर्शन होते है। गंभीर विषयों पर वैचारिक शैली का प्रवाह दिखाई देता है। इनके निबंधों का विषय विस्तार समाज, साहित्य, दर्शन से जीवनादर्शों तक हुआ है। उनके अधिकांश निबंध अपने समय की महत्वपूर्ण पत्रिकाओं - सरस्वती, प्रभा और सम्मलेन पत्रिका में प्रकाशित हुए। उनके सरस गद्यकाव्य से एक उदाहरण - शीर्षक है प्रतीक्षा - "यह प्रतीक्षा है या परीक्षा? प्रतीक्षा ही है, परीक्षा किस बात की होगी? तुम अनंत, तुम्हारी प्रतीक्षा भी अनंत! ठीक है ना? कुछ तो कहो। किससे बात कर रही हूँ? क्या तुम सुनते हो? यदि हाँ, तो अपनी मोहिनी झलक क्यों नहीं दिखाते मोहन?"


खड़ीबोली और ब्रज भाषा में साहित्य सृजन रत वियोगी हरि ने कमनीय संस्कृत निष्ठ हिंदी, बोलचाल की हिंदी और उर्दू मिश्रित हिंदी को अपनाया। उनकी शैली में भावों और विचारों का गुंफन हुआ है। सहज संवादमयता भी इनकी शैली का गुण है। सहज, सरल, रंजक साहित्यिक के रूप में उनकी पहचान अमिट है। उनकी रचनाओं में मुख्यतः वीर और शांत भावना की व्यंजना हुई है। उनके गद्य गीत चिंतन प्रधान एवं व्यंग्यात्मक हैं। गद्य भाषा अलंकृत, काव्यात्मक, लाक्षणिक है तथा समग्रतः काव्य-भाषा सरल, कोमल शब्दावली से युक्त खड़ीबोली है, जिसमें अँग्रेज़ी, अरबी, फ़ारसी आदि के शब्दों का प्रयोग भी हुआ है। प्रस्तुत हैं वीर रस और समाज सेवा के प्रति प्रतिबद्ध कवि वियोगी हरि की रचनाओं के कुछ अंश -

"भूलेहुँ कबहुँ न जाइए, देस-बिमुखजन पास।
देश-विरोधी-संग तें, भलो नरक कौ बास॥"

कवि के देश प्रेम की उदात्त भावना की एक और बानगी देखिए -

"सुख सों करि लीजै सहन, कोटिन कठिन कलेस।
विधना, वै न मिलाइयो, जे नासत निज देस॥"

वियोगी हरि की चिंतन धारा में सर्वधर्म समभाव प्रमुख है। उनका धर्म समन्वयवादी विश्वधर्म है, जिसका आदर्श गाँधीवाद है। वे गाँधी जी के रचनात्मक कार्यकर्ता के रूप में भी जाने जाते हैं। वे अहिंसा के विश्वासी सामाजिक परिवर्तन के आकांक्षी व्यक्तित्व का साकार रूप कहे जा सकते हैं।

उन पर सूरदास, तुलसीदास, कबीर तथा सूफ़ी कवियों की विचारधारा का प्रभाव पड़ा। उनके सामाजिक विचार सुधारवादी और कबीर आदि संतों की भाँति खंडनात्मक है। उनके द्वारा संपादित 'संत वाणी' की भूमिका में काका कालेलकर लिखते हैं, "भिन्न भिन्न संतों के वचनों का ऐसा संग्रह करना दीर्घकाल के संकल्प और प्रयत्नों का फल होता है। उसके पीछे जो परिश्रम किया जाता है, उसके साथ जो अपूर्व आनंद मिलता है, वही उस परिश्रम का मधुर फल है।" 

वियोगी हरि की समस्त साहित्य साधना को कालेलकर जी की इन पंक्तियों के आलोक में ठीक पहचाना जा सकता है।

वियोगी हरि : जीवन परिचय

जन्म

१८९६, छतरपुर मध्यप्रदेश

निधन

१९८८, दिल्ली

आरंभिक शिक्षा

हिंदी, संस्कृत घर पर

अभिरुचि

दर्शन

कार्यक्षेत्र

  • सुप्रसिद्ध गांधीवादी हरिजन सेवक संघ के अध्यक्ष विनोबा भावे, ठक्कर बापा के सहयोगी गांधी स्मारक निधि भूदान आंदोलन में सक्रिय 

  • विचारक, गद्यकार, संपादक, कवि

साहित्यिक रचनाएँ

  • साहित्य विहार (१९२२)

  • छद्मयोगिनी नाटिका (१९२२)

  • ब्रज माधुरी सार (१९२३)

  • अंतर्नाद (१९२६)

  • भावना (१९२८)

  • प्रार्थना (१९२९)

  • विनय-पत्रिका  टीका (१९२३)

  • वीर-सतसई (१९२७)

  • विश्वधर्म (१९३०)

  • योगी अरविंद की दिव्यवाणी

  • छत्रसाल ग्रंथावली

  • मंदिर प्रवेश

  • प्रबुद्ध यामुन अथवा यामुनाचार्य-चरित (१९२९)

  • अनुरागवाटिका

  • मेवाड़ केशरी

  • चरखा स्तोत्र

  • मेरा जीवन प्रवाह

  • तरंगिणी

  • चरखे की गूँज 

  • गाँधी जी का आदर्श

  • प्रेमशतक

  • प्रेमपथिक

  • प्रेमांजलि

  • प्रेमपरिषद्

  • वीर बिरुदावली

  • गुरु पुष्पांजलि

  • संतवाणी

  • संत-सुधासार

  • श्रद्धाकण

  • जपुजी

  • संक्षिप्त सूरसागर

  • संत सुधासार

  • दादू

पुरस्कार व सम्मान

  • वीर सतसई पर मंगलाप्रसाद पारितोषिक

  • विनयपत्रिका की हरितोषिणी टीका विख्यात


संदर्भ

  • विकीपीडिया 

  • हिंदी साहित्य का वृहद् इतिहास संपादक डॉ० नगेंद्र

लेखक परिचय

डॉ० विजया सती

पूर्व एसोसिएट प्रोफ़ेसर, हिंदू कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय
पूर्व विजिटिंग प्रोफ़ेसर, ऐलते विश्वविद्यालय, बुदापैश्त, हंगरी
पूर्व प्रोफ़ेसर हान्कुक यूनिवर्सिटी ऑफ़ फ़ॉरन स्टडीज़, सिओल, दक्षिण कोरिया

प्रकाशनादि - राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय गोष्ठियों में आलेख प्रस्तुति और उनका प्रकाशन

संप्रति - स्वांतः सुखाय, लिखना-पढ़ना

ई-मेल- vijayasatijuly१@gmail.com

3 comments:

  1. डॉ विजया मैडम नमस्ते। साहित्यकार, समाजसेवी, सन्त और भी बहुत कुछ, ऐसे बहुमुखी व्यक्तित्व के धनी वियोगी हरि जी पर आपका यह लेख बहुत शोध सम्पन्न एवं ज्ञानवर्धक है।
    "सुख सों करि लीजै सहन, कोटिन कठिन कलेस।
    विधना, वै न मिलाइयो, जे नासत निज देस॥"
    कवि की इस तरह के उत्कृष्ट पंक्तियों को लेख में सम्मिलित कर आपने लेख को सरस एवं रोचक बना दिया। आपको इस अच्छे लेख के लिये बहुत बहुत बधाई।

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  2. विजया जी, वियोगी हरि जी के साहित्य,कर्मों और विचारधारा के बारे में आपके आलेख से ही जाना। आपने उनके सृजन के सुन्दर नमूने पेश करके उन्हें समझना और आसान बना दिया। हर बार की भाँति आपका आलेख बहुत जानकारीपूर्ण है। सुन्दर लेखन के लिए आपको बधाई और शुक्रिया।

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