Tuesday, February 15, 2022

आम-ओ-खास आदमी के शायर बशीर 'बद्र'

 Bashir Badr

उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए
यह उस शायर की बेहतरीन शायरी है, जिसने दुनिया में ख़ुशबू, मुहब्बत और याद किए जाने वाले बेशुमार अशआर जन-सामान्य लोगों के लिए बाँटे हैं। यहाँ अपने अहद का बहुत ही बुलंद शायर, मुशायरों की शान-औ-जान बशीर बद्र की बात हो रही है। यह वह चाँद है, जो अमावस की रात भी निकलता, अपनी चंचल चाँदनी बिखेरता, पर किसी को दिखाई नहीं देता।
जब भी इश्क-मुहब्बत की शायरी की बात होती हैं, तब बशीर बद्र का ज़िक्र ज़रूर होता है। जिन्होंने हमेशा कहा है, "मैं ग़ज़ल का आदमी हूँ और ग़ज़ल का तज़ुरबा मेरा तज़ुरबा हैं"। उनके वालिद सय्यद मुहम्मद नज़ीर पुलिस विभाग में मुलाज़िम थे। बशीर बद्र ने तीसरी जमात तक कानपुर के हलीम मुस्लिम कॉलेज में शिक्षा प्राप्त की, जिसके बाद वालिद का तबादला इटावा हो गया, जहाँ मुहम्मद सिद्दीक़ इस्लामिया कॉलेज से इन्होंने हाईस्कूल का इम्तिहान पास किया। हाईस्कूल के बाद वालिद के देहांत के सबब उनकी शिक्षा का क्रम टूट गया। उनको ८५ रुपये मासिक पर पुलिस की नौकरी करनी पड़ी। वालिद की मौत के बाद घर की ज़िम्मेदारियाँ इन्हीं के सर पर थीं। उनका रिश्ता वालिद की ज़िंदगी में ही अपनी चचाज़ाद बहन कमरज़हाँ से हो गया था। पुलिस की नौकरी के दौरान ही उनकी शादी हो गई। 
बशीर बद्र को शायरी का शौक़ बचपन से ही था। जब वह सातवीं जमात में थे, उनकी ग़ज़ल नियाज़ फ़तहपुरी की पत्रिका 'निगार' में छपी, जिससे इटावा की साहित्यिक मंडलियों में खलबली मच गई। २० साल की उम्र को पहुँचते-पहुँचते उनकी ग़ज़लें हिंदुस्तान और पाकिस्तान की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगी और साहित्य में उनकी शनाख़्त बन गई। शैक्षिक क्रम टूट जाने के कई साल बाद उन्होंने नए सिरे से अपनी शैक्षिक योग्यता बढ़ाने का फ़ैसला किया और जामिया अलीगढ़ से अदीब माहिर और अदीब कामिल परीक्षाएँ पास करने के बाद अलीगढ़ मुस्लिम यूनीवर्सिटी से बी० ए०, एम० ए० और पी० एच० डी०  की डिग्रियाँ हासिल की। बी० ए० के बाद उन्होंने १९६७ में पुलिस की नौकरी छोड़ दी थी। वह यूनिवर्सिटी के वज़ीफ़े और मुशायरों की आमदनी से घर चलाते रहे। 
१९७२ में पी० एच० डी० की डिग्री मिलने के बाद वह कुछ दिन अस्थाई रूप से अलीगढ़ यूनीवर्सिटी में पढ़ाते रहे, फिर उनकी नियुक्ति मेरठ यूनीवर्सिटी में हो गई। इस अर्से मुशायरों में उनकी लोकप्रियता बढ़ती रही। मई १९८४ में जब वह एक मुशायरे के लिए पाकिस्तान गए हुए थे, तब उनकी बीवी का देहांत हो गया। मुहल्लेवालों ने, जिनमें अधिकतर ग़ैरमुस्लिम थे, उनका अंतिम संस्कार किया। १९८७ में बशीर साहब जब मेरठ में पढ़ा रहे थे, उस दौरान वहाँ सांप्रदायिक दंगे भड़के और दंगाइयों ने उनका घर जला डाला। घर के साथ ही उनकी लाइब्रेरी भी जला दी गई। इस घटना को लेकर पूरे देश में बहुत ग़ुस्सा था, मगर बशीर साहब ने अपने घर को लेकर दु:ख जताने की जगह अपनी लाइब्रेरी और जल चुके लॉन के बारे में कहा - 
मकाँ से क्या मुझे लेना, मकाँ तुमको मुबारक हो
मगर ये घास वाला रेशमी कालीन मेरा है
इस घटना के बाद बशीर बद्र काफ़ी अकेले रहने लगे थे, लिखना भी छोड़ दिया था; मगर दोस्तों की तवज्जो और लोगों के प्यार की मदद से उन्होंने इस मरहले में भी हिम्मत ढूँढ ली और अपने आप को फिर से समेटना शरू किया। सबसे पहले उन्होंने शहर बदला और मेरठ से भोपाल चले गए। भोपाल में ही वे अपनी होने वाली बीवी, डॉक्टर राहत से मिले। उम्र बढ़ने के साथ उनकी याददाश्त कमज़ोर होने लगी और आख़िरकार वे सब कुछ भूल गए। उनको ये भी याद न रहा कि कभी उनकी शिरकत मुशायरों की कामयाबी की ज़मानत हुआ करती थी। मुशायरों के दिनों में दूसरे बहुत से शायरों की तरह बशीर बद्र की भी अपने समकालीन शायरों के साथ चोटें चलती रहीं। 
कुछ वाकयों का ज़िक्र यहाँ करना चाहता हूँ - 
फ़िराक़ गोरखपुरी के साथ तो एक मुशायरे में नौबत गालम-गलोच तक आ गई थी और फ़िराक़ साहब को ग़ज़ल पढ़े बिना मुशायरे से जाना पड़ा था। बाद में फ़िराक़ साहब ने ऐलान कर दिया कि जिस मुशायरे में बशीर बद्र होंगे, वे उसमें शिरकत नहीं करेंगे और इस वजह से मुशायरों के कुछ आयोजकों को शायरों की सूची से फ़िराक़ साहब का नाम हटाना पड़ा। फ़िराक़ साहब ने पत्रिकाओं के संपादकों को भी लिखा कि अगर उन्होंने बशीर बद्र को छापा तो वे उनके साथ लेखकीय सहयोग नहीं करेंगे। 
एक मुशायरे में सदर-ए-महफ़िल सरदार जाफ़री उनकी ग़ज़ल के दौरान उठकर जाने लगे, तो बशीर बद्र ने उनसे कहा - "आप ज़मीन पर नहीं चल रहे हैं, बल्कि मेरी ग़ज़ल के सीने पर से गुज़र रहे हैं।" 
नैनीताल क्लब में मुशायरा हो रहा था और निज़ामत कर रहे थे जनाब कँवर महिंद्र सिंह बेदी सहर। मुशायरे के इख्तिताम पर जब बशीर बद्र और वसीम बरेलवी पढ़ने के लिए बाक़ी रह गए तो उन्होंने अपनी मुहब्बत का इज़हार किया - "ये मेरी दोनों आँखें हैं। मैं किस को पहले बुलाऊँ और किस को बाद में।" बशीर बद्र ख़ुद ही उठकर माइक के पास आ गए और बोले - "मुझे बेहद अफ़सोस है कि आली जनाब कँवर साहब अब एक आँख से महरूम हो रहे हैं।" 
अमरोहा में मुशायरा बहुत सुकून से चल रहा था। शायर भी मुतमइन और सुनने वाले भी ख़ुश कि बीच मजमे से एक बहुत मा'क़ूल शख़्सियत वाले साहब उठे और खड़े होकर आदिल लखनवी की तरफ़ इशारा करके बोले - "डाक्टर साहब! वे शायर जिनकी सूरत तारा मसीह (जिस जल्लाद ने वज़ीर-ए-आज़म पाकिस्तान ज़ुल्फ़क़ार अली भुट्टो को फांसी दी थी) के हू-ब-हू है, उन्हें पढ़वा दीजिए।" बशीर बद्र ने अपनी मख़सूस मुस्कुराहट के साथ आदिल लखनवी को दावत-ए-सुख़न देते हुए कहा - "मैं शायरी के तारा मसीह से दरख़्वास्त करता हूँ कि तशरीफ़ लाएँ और अमरोहा के ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो का काम तमाम कर दें।" 
राष्ट्रपति से पद्मश्री सम्मान लेने नहीं पहुँचे
बशीर के साथ एक वाक़या और है, जो उनके बारे में गहराई से बताता है। उन्हें पद्म श्री मिलने वाला था, मगर बशीर को उस वक़्त मुल्क के बाहर चल रहे एक मुशायरे में जाना पड़ा। सम्मान को लेने के लिए बशीर बद्र राष्ट्रपति के सामने हाज़िर नहीं हो सके। उनसे इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि मुशायरे का वादा वो पहले ही कर चुके थे और उन्हें इतनी मोहब्बत से बुलाया गया था; पद्मश्री तो घर आ गया, मगर उन लोगों की मोहब्बत घर कैसे आती, जो उनका इतनी दूर इंतज़ार कर रहे थे।
बशीर बद्र ने अँग्रेज़ी लफ़्ज़ों को भी अपनी शायरी में ख़ूब इस्तेमाल किया है, अंग्रेज़ी लफ़्ज़ जो नस्र लिखते हुए भी ज़रा रुकने पर मजबूर कर देते हैं, बशीर की शायरी में एक अलग ही कैफ़ियत रखते हैं, इनका इस्तेमाल इस महारत से हुआ है कि कहीं कोई अजनबिय्यत महसूस नहीं होती -
ये ज़ाफ़रानी पुलओवर उसी का हिस्सा है
कोई जो दूसरा पहने तो दूसरा ही लगे
बशीर 'बद्र' साहब ने जो कहा है, उसकी अहमियत अपनी जगह, उसका मक़ाम अपनी जगह; लेकिन एक और चीज़ जो क़ाबिल-ए-ग़ौर है, वो ये कि इस तरह की नस्र लिखते वक़्त भी उनके क़लम ने कितने फूल बिखेरे हैं और ऐसे इल्मी नुक्ते पर बात करते हुए भी उनका लहज़ा ऐसा है, जैसे सुब्ह के वक़्त फूलों पर शबनम बरस रही हो। ये हैं बशीर 'बद्र', और ये है बशीर 'बद्र' का मिज़ाज; क्यूँ न उनके इस शे'र से मज़मून का इख़्तिताम किया जाए -
लहज़ा कि जैसे सुब्ह की ख़ुश्बू अज़ान दे
जी चाहता है मैं तिरी आवाज़ चूम लूँ
इसमें शक नहीं कि बशीर बद्र ने अपनी ग़ज़लों में नए दौर के नए विषयों, समस्याओं, विचार व राय से अपनी गहरी संवेदी, अंतर्ज्ञान, भावात्मक और बौद्धिक संबद्धता को एक अनोखी और आकर्षक अभिव्यक्ति देकर उर्दू ग़ज़ल में एक नए अध्याय का इज़ाफ़ा किया। बशीर बद्र आम जज़्बात को अवामी ज़बान में पुरफ़रेब सादगी से बयान कर दिए हैं, जिसमें कोई आडंबर या बनावट नज़र नहीं आती। उनके अशआर में गाँव और क़स्बात की सोंधी-सोंधी महक भी है और शहरी ज़िंदगी के तल्ख़ हक़ायक़ की संगीनी भी। बशीर 'बद्र' की शायरी ने तग़ज़्जुल को नया अर्थ प्रदान किया। ये तग़ज़्ज़ुल रूहानी और जिस्मानी मुहब्बत की अर्ज़ीयत और पारगमन का एक संयोजन है। उनकी शायरी वो ख़ुशबू है, जो हमारा रिश्ता आरयाई मिज़ाज से, हमारी धरती से, गंग-ओ-जमन की वादी से और हिंदी, ब्रज, अवधी बल्कि तमाम स्थानीय बोलियों से जोड़ती है -
मुसाफ़िर हैं हम भी मुसाफ़िर हो तुम भी
किसी मोड़ पर फिर मुलाक़ात होगी
बशीर की ग़ज़लों में वो खासियत है, जो हर आमो-ख़ास को पढ़ने-सुनने के लिए आकर्षित करती है। कान, ज़ुबान और दिमाग के लिए सीधी आसान भाषा, दिल के लिए ढेर सारे इमोशन, महफ़िल को जमाने वाली लय और बंदिश और वो सब कुछ जो बिखरे हुए शब्दों को बटोर कर ग़ज़ल बनाता है -
हम भी दरिया हैं, हमें अपना हुनर मालूम है
जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे, रास्ता हो जाएगा
बेहद मज़ाकिया आदमी हैं, बशीर बद्र साहब। शायरी में तो हैं ही, अपने साथ रहने वालों की महफिल में भी अपनी खुशनुमा आदतों के लिए जाने जाते हैं। खेमेबाज़ी, चुगली और लगाई-बुझाई का हुनर भी नहीं है। मोहब्बत के शायर हैं, मोहब्बत बाँटते हैं। टाइमपास का क्या जुगाड़ है उनका। मरहूम शायर निदा फ़ाजली उनकी आदतों पर कह गए हैं -
"जहाँ भी मिलते हैं, ग़ज़लें सुनाते हैं; ये बता कर कि शे’र नए हैं।"
क्या सितम है कि एक ज़माने की यादों में उजाले भरने वाले इस शायर की ज़िंदगी की शाम में यादों के उजाले भी इनका साथ नहीं निभा पा रहे! आज ये शायर अपने ही अशआर याद नहीं कर पा रहा है। डिमेंशिया से जूझ रहे बशीर बद्र साहब को देखकर जाने कितने ख़याल ज़ेहन से गुज़रते हैं, लेकिन बीमारी और डिमेंशिया के बाद भी एक बात जो महसूस होती है, वो ये कि इस शख़्स ने मोहब्बत बे-इंतिहा की है। बशीर बद्र की मोहब्बत महसूस करने के लिए उनकी शायरी पढ़ना ज़रूरी नहीं है, कोई उनकी ज़िंदगी भी देख ले, तो उसे एहसास होगा कि मोहब्बत को जीना क्या होता है?

डॉ० बशीर 'बद्र' : जीवन परिचय

जन्म

१५ फरवरी १९३५

मूल नाम

सय्यद मुहम्मद बशीर 'बद्र'

जन्मभूमि

कानपुर, उत्तर प्रदेश

कर्मभूमि

भोपाल, मध्य प्रदेश

पिता

सय्यद मुहम्मद नज़ीर

माता 

आलिया बेगम

पत्नियाँ

कमरज़हाँडॉ० राहत बद्र

पुत्र

नुसरत बद्र

शिक्षा

  • एम० ए०   १९९, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय

  • पी० एच० डी०  १९७२, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय

साहित्यिक रचनाएँ

ग़ज़ल संग्रह


हिंदी

  • आस

  • उजाले अपनी यादों के

  • उजालों की परियाँ

  • रोशनी के घरौंदे

  • सात ज़मीनें एक सितारा 

  • फूलों की छतरियाँ 

  • मुहब्बत खुशबू है  

उर्दू 

  • इकाई

  • छवि

  • आमद

  • आहट

  • कुल्लियाते बशीर बद्र

आलोचना

  • आज़ाद के बुरे उर्दू  ग़ज़ल  का तानकीदी मुतला

  • बिसविन सादी में  ग़ज़ल

सम्मान और पुरस्कार

  • उ० प्र० उर्दू अकादमी पुरस्कार १९९, १९७

  • जोश-ए-उर्दू पुरस्कार २१८

  • यश भारती सम्मान २

  • पोएट ऑफ़ द ईयर न्यूयॉर्क १९८९

  • मीर एकेडमी अवार्ड १९९७

  • साहित्य अकादमी पुरस्कार( उर्दू ) १९९९ (आस)

  • पद्म श्री १९९९ (साहित्य और नाटक) 

  • डी० लिट० (आनरेरी) सी० सी० विश्वविद्यालय मेरठ

संदर्भ

  • मुसाफिर- संकलन एवम संपादन : सचिन चौधरी (मंजुल पब्लिसिंग हाउस, भोपाल)
  • आमद : बशीर बद्र (पृष्ठ ३६)
  • विकीपीडिया
  • www.rekhta.org
  • www.kavitakosh.org

लेखक परिचय


सूर्यकांत सुतार 'सूर्या' 

मुंबई (भारत)
पिछले १५+ सालों से दार-ए-सलाम, तंजानिया, दक्षिण अफ्रीका।
कई पत्र-पत्रिकाओं, पुस्तकों में लेख, कविता, ग़ज़ल, कहानियाँ प्रकाशित।
विभिन्न राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से सम्मानित। 
चलभाष : +२५५ ७१२ ४९१ ७७७
ई-मेल : surya.४७५@gmail.com

9 comments:

  1. Bahut hi Umdaa aur achhe Tareek se Paishkash ki hai Bhai... Appko Mubarakbaad aur Badhaaiyaan....

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  2. बशीर बद्र वो शायर हैं जिन्हें आम से ख़ास तक हर कोई पसंद करता है। सभी को उनका कोई न कोई शेर जरूर पसंद होगा। सूर्यकांत जी आपने इस लेख के माध्यम से बशीर बद्र जी को फिर से पढ़ने का मौका दिया। आपको इस उम्दा लेख के लिये बहुत बहुत बधाई।

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  3. सूर्यकांत जी, आसान शब्दों में बड़ी बात कहने वाले शायर बशीर बद्र पर आपने भी सहज भाषा में उनके बारे में लिखा है। जीवन की कठिनाइयों समेत उनके जीवन के सारे पन्ने खोलकर रख दिए आपने। आलेख बहुत अच्छा लगा, इसके लिए आपको बधाई और धन्यवाद।

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  4. 'जिस तरफ भी चल पढ़ेंगे,रास्ता हो जाएगा।',क्या बात है आदरणीय सूर्या जी,कमाल का आलेख प्रस्तुत किया है शायर बशीर बद्र पर। बहित सहजता से उनके जीवन के प्रमुख पहलुओं पर रोशनी डाली है। आपका आभार व हार्दिक बधाई।

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  5. उजाले अपनी यादों के...कहने वाला शायर खुद अपनी याददाश्त भूल जाए, इससे त्रासद और क्या होगा...सूर्यकांत जी आपने बहुत सही शब्दों में उनका पूरा जीवन समेटा है, साधुवाद

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  6. सुंदर आलेख है, सूर्य कांत जी। आपने बशीर बद्र जी के जीवन पर और शायरी पर काफ़ी जानकारी दी है। बधाई। जीवंत मंच से सुना है इन्हें ।बशीर बद्र और वसीम बरेलवी मंच से अपनी अपनी विशिष्ट अदायगी के साथ ग़ज़ल कहते रहे।सुनने वाले के लिये वाह कहना स्वाभाविक था। बशीर बद्र हमेशा सरल शब्दों के बा-कमाल शायर के रूप में याद किये जाएँगे। 💐💐

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  7. सूर्यकांत जी, आपका आलेख पढ़कर, बशीर बद्र की शायरी के बगल से फिर गुज़रकर, उसकी दिलकशी से फिर बँध कर बहुत सुकून मिला, लेकिन बशीर बद्र जी की मौजूदा हालत के बारे में जानकर दिल ग़मगीन भी हो उठा। सबके ज़हन में अपनी शायरी की मधुर यादें छोड़ने वाला मक़बूल शायर आज अपनी ही याददाश्त खो बैठा है। बहरहाल वे, उनकी यादें और उनके कमाल हमें हमेशा याद रहेंगे। आपको इस सुन्दर लेख के लिए बहुत-बहुत बधाई।

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  8. यह आलेख मशहूर शायर बशीर बद्र के व्यक्तित्व एवं कृतित्व में झाँकने का अवसर देता है| उनकी शायरी से तो हम वाकिफ़ थे लेकिन उनके जीवन के बहुत से अनछुए पहलुयों के बारे में इस आलेख द्वारा ही जाना| सुन्दर और सहज शब्दों में लिखे इस आलेख के लिए सूर्या जी को बधाई|

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